priyanka

no defeat is final until you stop trying.......

36 Posts

521 comments

priyasingh


Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.

Sort by:

आंटी मत कहो ना………

Posted On: 24 May, 2012  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

23 Comments

दुखद आश्चर्य …कैसे कैसे विचार……

Posted On: 5 May, 2012  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (2 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

25 Comments

ज़िन्दगी कट ही जाती है …!!!

Posted On: 18 Oct, 2011  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (2 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

32 Comments

बचपन के दिन भी क्या दिन थे…

Posted On: 24 May, 2011  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (3 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

37 Comments

“एक वाकया”

Posted On: 13 May, 2011  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading ... Loading ...

Others में

13 Comments

ऐ भाई जरा देख के चलो…!!!

Posted On: 28 Apr, 2011  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (2 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

26 Comments

प्रेस वाले की बच्ची ….

Posted On: 14 Apr, 2011  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (18 votes, average: 4.56 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

79 Comments

शब्दों का ये संसार….

Posted On: 9 Apr, 2011  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

13 Comments

क्या हमें प्रकृति से प्यार है …

Posted On: 31 Mar, 2011  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 4.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

9 Comments

आज चाँद कुछ उदास है …

Posted On: 21 Feb, 2011  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (3 votes, average: 4.33 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

28 Comments

Page 1 of 41234»

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

प्रिया जी सादर नमस्कार,चलिए मै आपको आंटी नहीं कहता, शायद इस नाम के साथ कुछ मुश्किल मुझे भी होगी. मगर मुझे लगता है कभी कभी अंकल या आंटी कहलाना भी अच्छा लगता है.हाँ अवश्य ही अंकल के मुंह से कतई नहीं. शुक्र है महिलाओं को गंजेपन का सामना नहीं करना पड़ता. मेरे एक मित्र जो की अभी पचास भी पार नहीं कर पाया है मोटापे और गंजेपन का शिकार एक दिन रेलवे रिजर्वेशन की कतार में किसी बच्चे ने उसे कह ही दिया " अंकल सीनियर सिटिजन की लाइन में लगीये ना." और जब उन्होंने उस बालक को समझाने का प्रयास किया तो वह मानने को तैयार भी नहीं हुआ. चलिए होते होते आपको भी हो ही जायेगी ---- सुनने की आदत. एरोबिक्स का प्रयोग कुछ दिन शायद राहत दे. आपने बहुत सुन्दर मगर करुण हास्य प्रस्तुत किया है. बधाई.

के द्वारा: akraktale akraktale

गलाेूआदरणीय प्रियांका जी ..... सादर अभिवादन ! जीवन की जमीनी हकीकतों को ब्यान करता हुआ आप का यह मजेदार लेख पढ़ रहा था तो मन में दो ख्याल आ रहे थे *काफी समय पहले डाई की एक मशहूरी में जब एक महिला को आंटी कहा जाता है तो घर में आकर आईना देखती है ..... *आजकल बिग बी की बहु का हाल भी कुछ कुछ ऐसा ही है अब तो यही देखन होगा की उनको कांस फिल्म समारोह में रेड कारपेट के उपर वाक करने का सुनहरा अवसर मिलता है की नहीं कोई चाहे कुछ भी कहे लेकिन इस बात से तो यही साबित होता है की ससुराल वाले अपनी बहुओं के खाने पीने का अच्छा ख़ासा ध्यान रखते है बल्कि जरूरत से ज्यादा मुबारकबाद :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-? :-x :-) :-? :-x :-) :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-P :-? :-x :-) :evil: ;-) :-D :-o :-( :-D :evil: ;-) :-D :mrgreen: :-? :-x :-) : :roll: :oops: :-D :-o :-( :-? :-x :-) :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-)

के द्वारा:

प्रिय जी...बधाई...बहुत सुन्दर लेख के लिए...आपका लेख पढ़कर मैं कब आपने बचपन में पहुँच गयी मुज्झे पता ही नहीं चला.... आपका एक-एक शब्द जसे मेरे मन के भावो की व्याख्या कर रहा है..मेरा बचपन भी ऐसा ही था... पिता के जॉब के कारन, पूरे मध्य प्रदेश का भ्रमण....वो नानी का गाँव ...गर्मियों की छुट्टिय.... वही आँगन, वही मकान, वही कहानिया, वही आँगन में चारपाई... सब कुछ वैसा ही...सच ये बचपन..... ऐसा मन करता है, की काश वो दिन कुछ दिनों के लिए ही सही, लौट आते.... मै अम्रेरिका में रहती हूँ...फिर भी, जब कभी भी इंडिया आती हूँ,. एक हफ्ते के लिए, नानी गॉव ज़रूर जाती हूँ... सच , जिसने गॉव नहीं देखे ..उसने बचपन नहीं देखा....आपका लेख पढ़कर साड़ी यादे ताज़ा हो गयी..धन्यवाद..

के द्वारा: abhilasha shivhare gupta abhilasha shivhare gupta

आदरणीय प्रियांका जी ....सादर अभिवादन ! क्या हुआ जो हमारे जीवन में तुमने उसे छिपा दिया अपने मन में हमने उसे छुपा लिया बहुत ही ज्यादा दिल कि गहराइयों में कहीं यह लाइन भीतर तक उतर गई ..... अब आप यह मत कहना कि आपको ज्यादा इज्जत वाला सम्बोधन नहीं चाहिए आपके जाने के बाद हमने इस मंच का माहौल कुछ इस तरह का बना दिया है कि अब आपको ज्यादातर ब्लागरों से "ज्यादा इज्जत" ही मिलेगी ..... अभी आपने एक लंबे गैप के बाद दुबारा लिखा है यह भी कबीले तारीफ है लेकिन जब आप अपनी पूरी रवानी में आकर लिखेंगी तो फिर से कोई प्रैस वाली बच्ची सरीखी रचना का जन्म होगा ..... आपको + आपके शरारती बच्चे + सपरिवार दीपावली कि मुबारकबाद

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

के द्वारा: वाहिद काशीवासी वाहिद काशीवासी

प्रिया जी बहुत दिनों बाद आपकी कलम से निकला कुछ पढ़ने को मिल रहा है जो हमेशा की तरह ही लाजवाब है। जीवन के यथार्थ को कितनी सुगमता से चित्रित कर दिया है आपने। आपने सही कहा कि गुज़रा हुआ वक़्त लौट कर नहीं आता (एक शेर याद आ गया कि - झूट है सब तारीख़ हमेशा अपने को दोहराती है, अच्छा मेरा ख़्वाबे जवानी थोड़ा सा दोहराए तो;) फिर भी मेरा मानना है कि अगर हम सबकुछ होने पर भी अपनी सोच को सकारात्मक बनाये रखने की कोशिश करें तो सब ठीक हो जाता है। दुःख-सुख, हानि-लाभ तो जीवन पर्यंत लगा रहता है मगर हम अपने विचारों से अपने भविष्य का निर्माण कर सकते हैं। अगर हम नकारात्मकता को सीने से लगाये बैठे रहेंगे तो आगे भी वैसा ही होगा। तो यह हम पर भी निर्भर है कि अपने जीवन में हम क्या चाहते हैं और कैसे चाहते हैं। इस विषय पर एक लेख पर कार्य कर रहा हूँ जब पूरा हुआ तो आपको अवश्य उसका ड्राफ़्ट भेजूंगा। आभार सहित,

के द्वारा: वाहिद काशीवासी वाहिद काशीवासी

प्रिया जी, जड़ों से जोड़ती आपकी ये रचना सोचने पर मजबूर कर देती है| जिस अंदाज़ में आपने पेशगी की है और ठेठ शब्दों को वाक्यों की लड़ियों में पिरोया है वो सचमुच बहुत पसंद आया| एक बात जो मुझे सबसे ज़्यादा पसंद आई वो ये कि हम सब बचपन में सोचते थे कि क्यूँ पापा हर छुट्टियों में हमें कहीं और न ले जाकर गाँव क्यूँ ले जाते हैं| आज सोचता हूँ तो समझ आता है कि अगर ऐसा न हुआ होता तो अपनी मिट्टी की सौंधी खुशबू मैं कभी महसूस ही नहीं कर पाता|आज जिस तरह से हम अपने मूल से ही कटते चले जा रहे हैं जो हमारी परम्पराएँ हमें सिखाती हैं| अत्यधिक व्यस्त हूँ पर आपके लेख का शीर्षक देख कर फिर उसे पढ़ कर कमेन्ट किये बिना नहीं रह पाया| वो बचपन जो कहीं पीछे छूट गया है मगर सीने में आज भी उसी ताज़गी के साथ ज़िंदा है उस पर चढ़ी धूल की परतें उतारने के लिए हार्दिक आभार आपको,

के द्वारा:

प्रिया जी , मध्य प्रदेश के जिलों सागर , टीकमगढ़ , दमोह , शिवपुरी, आदि से मैं भी बहुत परिचित रहा हूँ खुद उत्तर प्रदेश के गाँव से दादाजी के समय निकल आने पर उस समय के हिसाब से बड़ी छोटी फॅमिली होने कारन गाँव तो छुट गया पर आपकी तरह ही सर्विसे वाले परिवार का हिस्सा होने कारण दर्जनों उत्तर प्रदेश व् मध्य प्रदेशों में रहा और शिक्षा भी हर दो साल बाद नए नए छोटे मझोले शहरों से लेकर लखनऊ आगरा सब जगह हुई बचपन की यादें बड़ी मीठी होती है और जो ग़ज़ल आपने रचना के अंत में शामिल की वह दिल को जाने कैसा कर देती है | मैं अपनी टूटी फूटी रचनाओं में अक्सर अपना पुराना समय ढूंढता रहता हूँ | श्रेष्ठ रचना के लिए बधाई

के द्वारा: RaJ RaJ

के द्वारा: priyasingh priyasingh

आप ने स्वयं ही कहा की आपके परिवार में दो सौ लोग है और सबके बीच बहुत प्यार है फिर भी आप अपने आपको अकेला क्यों समझ रहे है ............जब तक आप अपने दुःख अपने गम में डूबे रहते है तब तक आप यही सोचते है की आपसे ज्यादा दुखी कोई नहीं है आपका दुःख ही सबसे बड़ा है, जो भगवान् ने आपसे छीना वो उसे नहीं करना चाहिए था .......... लेकिन आप जैसे ही थोड़ी देर के लिए ही नज़र उठा कर देखते है तो आप पाते है की दुनिया में ऐसा बहुत कुछ हुआ है जिससे हर कोई आहत है दुखी है .........और जैसे ही आप उनके आंसू पोंछ देंगे आपको लगेगा की धीरे धीरे आपका दुःख कम हो रहा है ...........दुखी रहना पछताते हुए रहना, अकेले रहना बहुत आसान है ...........मुश्किल है उस दुःख को अपने में समेट के सबके साथ खुश रहना ...........ऐसा मत सोचियेगा की मई आपको प्रवचन सूना रही हूँ स्वयं के अनुभव से कह रही हूँ .......यहाँ हर किसी ने अपनी ज़िन्दगी में कुछ न कुछ अनमोल खोया है ...........लेकिन ज़िन्दगी में जैसे हम अपने दुःख को भुला कर आगे बढते है ज़िन्दगी हमें कुछ और ख़ास चीज़ दे देती है ..........आशा करती हूँ आगे आप रोये तो वो आपके ख़ुशी के आंसू हो .....................

के द्वारा: priyasingh priyasingh

प्रिया जी, एक बेहतरीन आलेख !! आपका हार्दिक धन्यवाद !! पढ़कर मानो बचपन की यादें ताज़ा हो गयी | हालांकि मेरी उम्र अभी इतनी नहीं है कि मैं जमानों पहले की बात करूँ, लेकिन पिछले दस सालों में लोगों के दृष्टिकोण एवं जीवन शैली में इतना बदलाव आ गया है कि बस.....!! मुझे भी ग्रामीण जीवन-शैली बहुत पसंद है | अभी कुछ दिनों पहले ही हम भी सपरिवार शहर में आए हैं, लेकिन मेरा आने का मन नहीं था | तो इस बात पर घर वालों का तर्क था कि आज नहीं तो कल....बाहर तो जाना ही पड़ेगा, और तुमने तो इंजीनियरिंग की है तो तुम्हें घर पे कौन रहने देगा | :( अब भी मन अनमना-सा ही रहता है | शायद इन सब चीजों के पीछे भौतिकतावादी सोच एवं एकाकी परिवारों के प्रति बढ़ता रुझान है | :(

के द्वारा: संदीप कौशिक संदीप कौशिक

प्रिया जी, मै भले ही आपसे बहुत ही छोटा हूँ..लेकिन आपने अभी जो भी लिखा बस यही सोच रहा था की आपकी उस मंडली में मै भी रहा था..जो आज बहुत पछता रहा है इस शहर की भागदौड़ की ज़िन्दगी से....मेरा गाँव जहा मेरे दादा दादी रहते है वो घर 200 लोगों का सम्मिलित परिवार है आज भी वहा सब एक है आप समझ सकती होंगी की इतने बड़े परिवार में सबके बीच कितना प्यार होगा और ऐसी जगह रहना कितना सुखद..मेरे ननिहाल में हम अपने नाना -नानी-मामा-मामी के इकलौते भांजे थे बहुत प्यार मिलता था मिलता है.. मगर अफ़सोस आज आपका ये लेख पढ़कर मै रो पड़ा पिछले 8 -10 सालो में ज़िन्दगी बहुत बदल गयी..मेरी ज़िन्दगी में एक ऐसा तूफ़ान आया की .......अब कुछ भी नहीं लिख सकता..... बहुत अकेला हूँ.. आपके लेख को सलाम.. ***************************** एक अकेला आकाश तिवारी *****************************

के द्वारा: Aakash Tiwaari Aakash Tiwaari

बहुत बहुत शाबाशी की हकदार हैं आप . हम लोग दुनिया में हमेशा बड़ी बड़ी चीजों को ही देखते रहते हैं और बड़े बड़े सपनो में जीते रहते हैं . किन्तु अपने आस पास की इन छोटी छोटी चीजों में जो आत्मिक सुख मिलता है उसकी कल्पना नहीं की जा सकती है . उस पल को जीने का सुख ही कुछ और है . आप ने कहा की उस बच्ची के लिए आप कुछ कर नहीं पाती हैं . ऐसा नहीं है , आप की यह सोच ही आप के उद्देश्य की राह की पहली सीढ़ी है . जब हमारी शोच सकारात्मक होती है तो हम जाने अनजाने में समाज के उस वंचित तबके के लिए बहुत कुछ कर जाते हैं , मसलन आप उसे या उस जैसे बच्चों को कोई पुरानी किताब या अपने बच्चों के पुराने कपडे जो उसके नए से भी अच्छे ही होंगे या पुराने खिलौने आदि प्यार और सम्मान के साथ दे कर तो देखिये . फिर उसके चेहरे पर जो ख़ुशी और प्यार आपके लिए दिखाई देगा वैसा सुख आपको पहले शायद ही कभी मिला होगा . आपकी मीठी प्यारभरी स्नेहिल शोच के लिए पुनः आपको साधुवाद . जैहिंद जैभारत .

के द्वारा:

के द्वारा: priyasingh priyasingh

प्रिय जी सुन्दर लेख पढने को मिला मानव जीवन सच में बहुत सस्ता है ये सिद्ध हो जाता है हर गली नुक्कड़ बस स्टैंड रेलवे प्लेटफार्म पर -आप ने भी देखा होगा -दिल दर्द से रो पड़ता है कुत्ते और गाय बैल जो रोटी छोड़ बढ़ जाते हैं उसे कुछ अभागे बेचारे उठा खाते हैं लोगों की दुत्कार गालियाँ सहते हैं किसी बड़ी दुकान के आस पास अपनी जीविका चलने के लिए अगर ठेला या जमीं पर ही बैठ गए तो पैर की ठोकर तक पा जाते हैं -बड़े लोग बड़े ही होते हैं जबान बड़ी कद बड़ा गाड़ी बड़ी -उनकी पहुँच बड़ी जेब में पैसे होते तो शायद वह उसे भी लूट ही लेता -न मिला तो डरा धमाका मार इज्जत ही कमा लेगा -पता नहीं कब ये हमारा पढ़ा लिखा सभी समाज अपनी राह पर आएगा ? सुन्दर लेख के लिए बधाई सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५

के द्वारा:

के द्वारा: priyasingh priyasingh

प्रिया जी, उपरोक्त घटना मन में कई तरह के सवाल भी पैदा करती है और इंसान की ख़त्म हो रही संवेदनशीलता की ओर भी इशारा करती है. ये एक ऐसी घटना है जिसकी हर व्यक्ति भर्त्सना करेगा. एक और संस्मरण है- कुछ दिन पहले मैंने एक पोस्ट लिखी थी 'लोकतंत्र पर हावी धनपशु' ये उन्ही इलेक्शन हार चुकी महिला के साथ हुई घटना है. उनके पति एक ठेकेदार है और मेरे मित्र भी और उनका घर मेरे घर से ५० मीटर की दूरी पर है. बीच में एक ऐसा मकान है जिसमे कई कमरों में रिक्शे, ठेलेवाले और मजदूर रहते है. एक रिक्शे वाला हर रोज शराब पी कर शाम को आता है और वह उनके घर के पास पहुँच कर भद्दी बाते और गालियाँ देता है और सुबह उनसे प्रणाम करता है यानी शराब की मदहोशी का शुद्ध बहाना! परेशान होकर एक दिन उन्होंने रिक्शे वाले को शाम को रोका और और उनके ड्राइवर ने बाकायदा उसकी आरती उतार दी. बस तबसे उसे एक नया बहाना मिल गया अब शराब पी कर वह रास्ते भर अनर्गल तिप्प्दियाँ करता चलता है. पुलिस में कम्प्लेन का कोई फायदा नहीं क्योंकि पुलिस भी उसी शराबी को पकडती है जिसके जेब में नोट हों. मेरे कहने का मतलब संवेदनहीनता हर तबके में मौजूद है इसका पैसे या रुतबे से बहुत कम सम्बन्ध है. अच्छी पोस्ट पर एक बार फिर बधाई!

के द्वारा: chaatak chaatak

के द्वारा: priyasingh priyasingh

के द्वारा: priyasingh priyasingh

के द्वारा: priyasingh priyasingh

के द्वारा: priyasingh priyasingh

पंचकर्म चिकित्सा केंद्र का कार्यक्रम -- 23 अप्रैल 2011 आर्य समाज , मोती नगर Block 17, नई दिल्ली 110015 कीऔर से "श्री संतुलन पंचकर्म चिकित्सा केंद्र" का विधिवत उदघाटन 23 अप्रैल 2011 सायं 4 .15 बजे प्रसिद्ध समाजसेवी महाशय धर्मपाल (प्रधान आर्य केंद्रीय सभा दिल्ली राज्य ) करेंगे I रोगियों को रोगमुक्त करने के लिए वरिष्ठ वैद डाo हेमंत मोदी की देख रेख मैं पंचकर्म पद्धति से उपचार किया जाता है I 125 वें दिवस के उपलक्ष्य पर उद्योग मंत्री दिल्ली सरकार डा० रमाकांत गोस्वामी, विधायक श्री सुभाष सचदेवा, निगम पार्षद श्री वेद प्रकाश गुप्ता व अनेक गणमान्य प्रतिष्ठित महानुभाव कार्यक्रम में सम्मिलित होंगे I श्री विनय आर्य जी , राजीव आर्य जी , धर्मपाल आर्य जी समस्त दिल्ली के आर्यजन का प्रतिनिधित्व करेंगे I इस अवसर पर आपका स्वागत है I संयोजक सुरेन्द्र कोछड़ Search ayurngo on google

के द्वारा:

के द्वारा: priyasingh priyasingh

के द्वारा: priyasingh priyasingh

..उसे और उस जैसे कई बच्चो को देखते ही मन में पीड़ा के साथ साथ टीस भी उठती है , टीस कुछ न कर पाने की …………हमारी ज़िन्दगी में ऐसे कई काम है जिन्हें हम करना चाहते है पर कर नहीं पाते है कभी कोई मजबूरी होती है और कभी ये की आखिर वो काम कैसे किया जाए …………….. लेकिन कुछ पल ही सही उन किराये के खिलोनो से खेल कर वो बच्ची खुश हो लेती है ……………ठीक उसी तरह जिस तरह हम किराए के घरो में रह कर अपने घर का सुख पा लेते है ………………. प्रिया जी बधाई हो सुन्दर लेख के लिए -आप ने इसमें सारा दर्द , संवेदनाये डाल दी हैं , उधर किराये का घर , एक तरफ प्रेस वाले की बच्ची की बचपन की तस्वीर -सच है जिसके पास जो होता है वह उसे भाता नहीं इन्सान की मनोवृत्ति ही ऐसी होती है -हम उसकी ज्यादा अहमियत देते हैं जो दूसरों के पास होती है बड़े हों या बच्चे -हमारी यही शुभ कामनाएं है की अपना देश भी केवल कानून न बनाये कानून लागू करे -अन्य देश सा बच्चों को पढने लिखने का पैसा छात्रवृत्ति मिले, उनको खाने जीने का अधिकार मिले, आज भी ढाबों होटलों में बच्चे पलते धो रहे कोई बोझ ढो रहा कोई कूड़े में पड़ा है शायद आप ने हमारी कविताओं में भी ये दर्द पढ़ा होगा , शायद ये खयाली पुलाव हमारा कभी सच हो जाये ??? सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर५

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा: priyasingh priyasingh

आज चाँद कुछ उदास है, मौसम भी कुछ बेखास है छाया हुआ है मनहुसिअत का आलम सोचती हूँ हमारे मन में संवेदनाये है भावनाए है किसी अजनबी के दुःख से दुखी हो जाता है हमारा मन और अपनों की परेशानियों से तो सहम जाता है हमारा मन फिर कैसे किसी का इतना निर्दयी हो जाता है मन की हजारो-लाखो लोगो की मौत की कल्पना कर जाता है और इस कल्पना को साकार भी कर देता है कैसे इंसान इतना कठोर हो जाता है वो इंसान, इंसान नहीं शायद जानवर हो जाता है शायद ही क्योंकि जानवरों की कौम को बदनाम करना ठीक नहीं जानवर तो अपना पेट भरने के लिए ये करते है और इंसान तो बस निजी स्वार्थ के लिए इसे अंजाम करते है कितने लोग मर जाते है ……………. और अपने पीछे छोड़ जाते है कई मरी हुई जिन्दगिया जो ढोते है उनकी मौत का उनकी यादो का बोझ और अपनी जलाई-दफनाई खुशियों का बोझ एक टीस एक कसक उन सबके दिल में है काश! जो हुआ वो न हुआ होता हम जिन आतंकियो को मार देते है या जेल में बंद कर देते है उन्हें उन परिवारों के पास भेजे जो अपनों की मौत को रो रहे है ‘शायद’ उन्हें तब ये अहसास हो जाये जो उन्हें अभी नही हो रहा किसी माँ की सूनी आँखे … किसी बाप का अनकहा दर्द… किसी बच्चे का तोतला रोना… किसी पत्नी की मरी हुई चल रही साँसे… देख के ‘शायद’ उनके अहसास जाग उठे ‘शायद’ उनका जमीर धिक्कार उठे कितने ‘शायद’ है अपने जीवन में काश एक दिन ये ‘शायद’ कम हो जाये मौसम कुछ ख़ास हो जाये और… ‘शायद’ चाँद फिर खिल उठे………………

के द्वारा:

के द्वारा: priyasingh priyasingh

के द्वारा: priyasingh priyasingh

के द्वारा: priyasingh priyasingh

के द्वारा: priyasingh priyasingh

प्रिय जी , नमस्कार ! अति सुन्दर प्रस्तुति के लिए बधाई ! प्रेम पर आपका पिछला लेख पढ़े बिना इस लेख में दिए स्पष्टीकरण से अर्थ निकाल प्रेम पर मन में आये विचार अभी यहीं लिखने विवश हूँ . श्रीमद्भागवद्गीता में जो कर्म फल की इच्छा बिना कर्म के लिए कहा गया है वही प्रेम के बिषय में भी सार्थक है . प्रेम केवल देने के लिए होता है पाने की इच्छा किये बिना !जब ऐसा प्रेम दिया जाना संभव हो जाता है तो प्रेमसलिला का उद्गम होता है . फिर प्रेम का सागर भी बनता है .जब प्रेम सागर का रूप ले लेता है तो प्रेम सागर में क्रोध , ईर्ष्या, आशंका, अदि के पत्थर केवल क्षणिक उथल पुथल उत्पन्न कर पाते हैं किन्तु प्रेम सागर में आनंद की लहरें निरंतर उद्वेलित करती रहती हैं . प्रेम सागर ना भी बना हो तो प्रेमसलिला भी ऐसे पत्थरो से प्रवाहहीन नहीं होती किन्तु यदि प्रेम के कटोरे में पत्थर लगे तो असर होता है . अब यह आपके प्रेम की प्रगति पर निर्भर है कि कितना फर्क पड़े . जहाँ तक प्रेम में क्रोध अदि के जन्म का प्रश्न है तो यह पूरी तरह मानव स्वाभाव के अनुकूल ही है . जिससे प्रेम होता है उसपर एकाधिकार कि इच्छा भी , प्रेम के प्रतिफल में प्रेम का मिलना सहज प्रतिक्रिया है और ऐसा होता भी है हाँ कभी कभी प्रेम का प्रतिफल कम मिलता अनुभव होता है किन्तु यह सत्य नहीं होता भ्रम मात्र होता है .

के द्वारा: charchit chittransh charchit chittransh

नमस्कार प्रिया जी..... आपने मेरे पोस्ट पर प्रतिक्रिया दी थी.... लेकिन शायद आपने उस पर मेरा उत्तर नहीं देखा है.... मई ज्यादा कुछ नहीं कहूँगा आपकी ही एक बात का जो की आपने इस पोस्ट पर लिखी है समर्थन करूँगा .... आपने लिखा है......जब अपने आसपास कुछ गलत होते हुए देखती हूँ और कुछ नहीं कर पाती तो उस कसमसाहट को लिख कर व्यक्त कर देती हूँ.... प्रिया जी यही कमी मुझमे है.... अब आप ही बताइये मै क्या करूँ.... क्या मैंने गलत कहा....फिर भी.... लगता है आपने मेरा सम्पूर्ण लेख अपने उपर ही ले लिया.... मेरा लेख आप पर केन्द्रित नहीं था... किसी एक व्यक्ति पर केन्द्रित होकर मै लेख नहीं लिखता.... मेरा लेख सम्पूर्ण जागरण जंक्शन के मंच पर चल रही अराजकता पर था... अगर ऐसा नहीं है... या यह लेख जो मैंने लिखा आप पर केन्द्रित होता.... तो जिस प्रकार से प्रतिक्रियाएं उस लेख पर आई हैं वह ना होती... सिर्फ अच्चा लेख, शुभकामनाएं, आभार, मजा आ गया, बेहतरीन लेख, आदि आदि ही प्रतिक्रिया स्वरुप होता.... मात्र एक लाइन से आप का यह सोचना की लेख आप पर है... यह गलत है... हाँ यह जरुर है की वह एक लाइन आप पर थी..... सार्थक लेखन की मै हमेशा कद्र करता हूँ और करता रहूँगा.... आपसे हमेशा सहयोग की ही उम्मीद करूँगा... आभार.....

के द्वारा: HIMANSHU BHATT HIMANSHU BHATT

मै आप दोनों की बात समझ रही हूँ ........ पर मैंने अपने लेख के शुरू में ही लिखा की मुझे किताबी प्यार समझ में नही आता ....और आप लोग जिस प्रेम की बात कर रहे है वो आपके नजरिये से सही है और मै जिस प्रेम की बात कर रही हूँ वो मेरे नजरिये से सही है ....... हर सिक्के के दो पहलु होते है अब ये आपके ऊपर है की आप उसे किस तरफ से देखना चाहते है ......... मेरे जीवन में प्रेम के हर पहलु है ..... मेरे प्रेम में क्रोध है स्वार्थ है ...... ढेर सारा प्रेम पाने का स्वार्थ फिर वो चाहे किसी से भी हो पति से भाई से बहन से दोस्तों से ...... लेकिन मै उस प्रेम को संभाल कर सहेज कर रखना जानती भी हूँ ........ आपके प्रेम में कोई शर्त नही है अपेक्षाए नही है ये आपके जीवन जीने का नजरिया है और आप उसे इसी तरह के प्रेम से जीना चाहते है ....ये बहुत अछि बात है......... वैसे भी जीवन इतना छोटा है उसे हर किसी को पूरी जिंदादिली से जी लेना चाहिए फिर उनके प्रेम का स्वरुप चाहे जैसा हो .......... आप दोनों की आलोचनायो का भविष्य में भी स्वागत है आपकी आलोचनायो की पैनी धार से मेरे लेख में चार चाँद लग गए..........

के द्वारा: priyasingh priyasingh

जी हाँ प्रिय जी... मई आपकी कुछ बातों से असहमति जाताना चाहूँगा... आपने प्रेम में स्वार्थ का समर्थन किया है... और उदाहरण दिया है की माँ अपने बच्चे को अपने प्रेम का वास्ता देकर ही कुछ गलत करने से रोकती है, वो अपने छोटे से बच्चे को कुछ खिलाती है तो ये ही कहकर की अगर तुम ये नहीं खाओगे तो मम्मा तुमसे बात नही करेगी.... लेकिन प्रिय जी अपने ही वक्तव्य को ध्यान से देखिये यहाँ स्वार्थ क्या है... स्वार्थ क्या होता है... मई इसकी अध्यात्मिक परिभाषा में नहीं जाना चाहता... लेकिन प्रेम स्वार्थ और शर्तों पर खडा करोगे... तो वह मात्र एक कांट्रेक्ट होगा... माँ अपने बेटे को दूल्हा बनते हुए इसलिए नहीं रोती की प्रेम बाँट जाएगा... वू आंसू तो ख़ुशी के होते हैं जिस लाडले को जन्म दिया... आज वह इतना बड़ा हो गया है की अपनी गृहस्थी बसाने चला है... प्रिया जी प्रेम का आनंद इतना परम है की जितना भी आता जाई मजा ही आता है... ये जीवन अगर किसी को मिल जाए तो उसे इसके सिवा कुछ नहीं भाता... अगर आपको ऐसे प्रेम मई जीवन जीने वाला कोई मिल सके तो उससे जरुर पूछियेगा... की यह कैसी चाशनी है... प्रेम से भरे व्यक्ति के जीवन में कोई कठिनाई नहीं होती... प्रेम सकारात्मकता से भर देता है... फिर कठिनाई तो हो ही नहीं सकती... अगर जीवन में कठिनाई है तो... निश्चित प्रेम नहीं है... याद रखें... UNCONDITIONAL LOVE FOR EVERY ONE.... IS THE ONLY AGENDA...

के द्वारा: HIMANSHU BHATT HIMANSHU BHATT

के द्वारा: priyasingh priyasingh

 \'\'क्या हम सब सच में वो सब मिल पता है जो हम चाहते है \'\' -   इस लिए तो नहीं कि हम जो चाहते हैं  उसमें निरंतरता और एक सूत्रता नहीं रहती। एक साथ कई बातें चाहते हैं। या र्धर्य नहीं रहता । किसी चाहत को स्थिरता के साथ पकडें और धैर्य का संबल रखने से शायद जो चाहते हैं वह पूरा होता हो।   इस लिए तो नहीं कि चाहते तो हम हैं पर पूरा करने वाला दूसरा है। यह द्वंद बाधक होता हो।  या इस लिए तो नहीं कि-  जिस की जितनी चादर थी , उसको उतनी सौगात मिली।  जो चादर देने वाला है वही सौगात देने वाला भी। \'चाहतें\' भी उसी के खेल का हिस्‍सा हैं।  भगवान से लडाई केवल भक्‍त कर सकते हैं। वही उसे दिल से कोसते रह सकते हैं। कोसना ही तो भगवान से तार जोडना है। मेरे विचार से आपको गलती मानने की जरूरत ही नहीं है। वह गलती तो भगवान की है। आपकी लडाई बढती रहे और इस मोड पर पहुंचे जहां दो, द्वंद ,न रहे - इस चाहत के साथ।

के द्वारा:

प्रिय जी, अक्सर हम सभी यही सोचते हैं कि सब चुप बैठे हैं तो मै क्यूँ बोलूं और कोई कुछ नहीं बोलता क्यूंकि हम आज भेड चाल चल रहे हैं लेकिन कहते हैं ना जुर्म करने वाले जितना कसूरवार जुर्म सहने वाला भी होता है और जहाँ भी गलत होता है हमे उसके खिलाफ जरुर बोलना चहिये और जैसा की आपने कहा - "चाहे आपके साथ कोई न हो पर अंत में जीत आपकी ही होगी और जितने की लिए आपको हिम्मत तो करनी ही होगी " और कुछ ऐसा ही मेरे साथ भी हो रहा है परन्तु मुझे अभी तक इसका नुकसान ही उठाना पड़ा है शायद मेरी नौकरी भी ऐसे जगह है जहाँ जी - हजुरी ही चलती है और मेरे सारे दोस्त भी मुझे चुप रहने की सलाह देते हैं और मै सोचता भी हूँ की अब कुछ भी गलत हो मै नहीं बोलूँगा लकिन जब भी गलत होता है मै चुप नहीं रह पाता शायद इसी उम्मीद से की कभी तो मेरी भी सुनवाई होगी दीपक जैन रायगढ़ (छत्तीसगढ़)

के द्वारा:

के द्वारा:

सरकार को चाहिए कि वह खोल दे उनके लिए भी एक बूचड़खाना जिसमे उनको पकड, पकडकर सफाई का पूरा ध्यान रखते हुए, सफाई से काट़ दिया जाए ॥ जिन्हे गरीबी की महान रेखा के नीचे रहने योग्य भी नही पाया गया है . -व्यंग कविता ....गिरीश नागड़ा प्रिया जी नमस्कार । गरीब जरूर सपने देखता होगा पर सपने में क्या देखता होगा । भूख, गरीबी, बीमारी, बेरोजगारी या फिर देखता होगा ऋण लेकर खरीदा गया रिक्शा, या पान की गुमटी या सामान ढोने वाली छोटी सी टेंपो । पता नहीं क्या देखता होगा । शायद बच्चों के लिये कपडे खरीदता होगा सपने में या फिर बीवी को दारू पीकर धुनकता होगा या फिर बूढ़े बाप का मोतियाबिंद का आपरेशन करवाता होगा और अम्मा के जोड़े के दर्द के लिये सरकारी हस्पताल का चक्कर लगाता होगा । पता नहीं क्या देखता होगा वह ।

के द्वारा: kmmishra kmmishra

प्रिया जी, जिस तरह से नदियों की सफाई के नाम पर पैसे का खेल हो रहा है वह नदियों के प्रदूषण की ही भाँति अत्यंत भयावह है जो बच्चे नदी में कूद कूद कर नदी में डाली गई वस्तुवें और मुद्रा बाहर निकालते हैं सरकार बाकायदा इसका गोताखोरी का ठेका उठाती है जिसकी बोली लाखों में लगती है| और इसे बढ़ावा देते हैं हम लोग जो बिना अपनी नदियों की पवित्रता का ख्याल किये उनमे न जाने कितनी अपशिष्ट चीज़ें अर्पित किया करते हैं| इसके पीछे सिर्फ धर्मान्धता और अज्ञानता ही है जो लोगों को जाने अनजाने नदियों का दुश्मन बना रही है| आपकी पोस्ट समस्या और निदान दोनों ही बड़े अच्छे ढंग से व्याख्यित कर रही है| बधाई स्वीकार करें !

के द्वारा: chaatak chaatak

धर्म के नाम पर इन नदियों का जितना विनाश हुआ है .............. वो व्यक्त नहीं किया जा सकता ......... मुझे याद है की बचपन में हमें सिखाया जाता था की मंदिर की सफाई सबसे पहले की जाती है.......... क्योकि वो भगवान् का घर है.......... इसीलिए जिस व्यक्ति का मन साफ़ होता है उसी को भगवान् मिलते है.......... पर यहाँ कुछ और ही है........... जिस नदी को देवी कहते है उसी को गन्दा करने में कोई कसार नहीं छोड़ते........... यहाँ उत्तराखंड में लोग दूर दूर से मंदिरों में दर्शन को आते हैं.........और सारा कूड़ा मंदिर परिसर में फेक जाते है............ क्या ये श्रद्धा है............. यदि हां तो शायद ये धर्म कोई दूसरा है........... जिस धर्म को मैं मानता और जनता हूँ ये वो नहीं है................. सकारात्मक विषय पर लिखने के लिए हार्दिक बधाई...............

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani Piyush Pant, Haldwani

प्रिया जी, इसमें कोई शक नहीं है कि बच्चों पर जन्म से पहले ही आसपास होने वाली घटनाओं का प्रभाव पड़ना शुरू हो जाता है और आगे चलकर बच्चे उन्ही प्रमुख गुणों को प्रकट करते हैं जिनका अनुभव उन्हें माँ के गर्भ में होता है| आपकी लेखन शैली बताती है कि आप जिज्ञासु होने के साथ-साथ एक अच्छी विश्लेषक दृष्टि भी रखती हैं, अस्तु स्पष्ट कि आपके बच्चे के अन्दर उन कार्यक्रमों का प्रभाव सीधा न पड़कर आपके द्वारा महसूस की गई भावनाओं का उद्दीपन होगा और वह अच्छी सूझ-बूझ के साथ विभिन्न प्रकार की परिस्थितियों और चरित्रों की पहचान कर सकेगा| आपकी राय और अनुभव जानकार प्रसन्नता हुई| अच्छी लेखन शैली पर बधाई!

के द्वारा: chaatak chaatak

अब तो दूसरे ब्लोगरो को आपसे खतरा महसूस हो रहा होगा ... आपका ब्लॉग फीचर्ड हुआ ..बहुत अच्छी बात है ....मुबारकबाद ! लेकिन अभी भी सुधार की गुंजाईश है ...अपनी पोस्ट को हम सभी को पोस्ट करने से पहले ३-४ बार पढ़ना चाहिए ....अगर हो सके तो पाठक की नज़र से भी पढ़ने की कोशिश करनी चाहिए .... आपने सिर्फ एक महीने के ही प्रभाव की बात की है और मानी है ...लेकिन पूरे समय के प्रभाव का भी अपना महत्व है ... लेकिन उससे भी बढ़ी एक बेसिक बात है .....जोकि आप तो क्या किसी से भी यहाँ पे नहीं की जा सकती ......लेकिन अपने खुद ही कहा है की आप कोई महात्मा नहीं चाहती ....लेकिन मैं अपने घर में एक धार्मिक स्वभाव का ही बच्चा चाहूँगा ... इसी उम्मीद के साथ की जैसे संस्कार अपने बच्चे को देना चाहती है , वोह उसमें पूरी तरह रच बस जाये ...

के द्वारा: rajkamal rajkamal

जैसा की आपने कहा की आपको कहा गया की ............ सत्संग में मन लगाया करो बच्चे में अच्छे संस्कार आयेंगे..................... सासुमा माँ ने कहा की रामायण पढ़ा करो बच्चे में अछे गुण आयेंगे............. तो ध्यान रखें ये सभी बातें प्रतीक है........ वास्तव में सारा खेल उर्जा है है............... इन सब चीज़ों का पालन करने से आपमें एक सकारात्मक उर्जा का संचार होगा........... और ये उर्जा आपसे आपके बच्चों तक ही नहीं............. अपितु आपके आस पास के लोगों में भी जाती है...... एक प्रयोग करके देखें सुबह उठते ही नहा धो कर किसी ऐसे व्यक्ति के नजदीक बैठ जाये जो सोया हो...... तो आपकी उर्जा से उसकी नींद खुद समाप्त हो जाएगी........ और यदि आप किसी ऐसे व्यक्ति के पास बैठ जाये जो सो रहा है और आप खुद तारो तजा नहीं है तो आपको भी नींद आने लगेगी ..............क्योकि तब उसकी उर्जा आप पर हावी हो जाएगी.............. और जहाँ तक IIT वालों के लिखने का प्रश्न है तो............ वो हर तरह से हमारी तरह ही हैं.......... बस वो कुछ समय तक अपनी संवेदनाओं को दबाये रखते हैं................. इस लेख के लिए हार्दिक बधाई............

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani Piyush Pant, Haldwani

के द्वारा: atharvavedamanoj atharvavedamanoj

आदरणीय प्रिया जी, आप ने सही ही कहा है …………..लेकिन आधानुकिता की इस अंधी दौड़ में लोग ये भूल रहे है की हम अपने संस्कार मर्यादा और संस्कृति को कहीं दूर पीछे छोड़ते जा रहे है हम उन्ही चीजों को पीछे छोड़ते जा रहे है जिनके कारण हमारी पहचान है हमारा अस्तित्व है। और इसे प्‍यार न कह कर नग्‍नता ही कहे तो सही होगा। आज के ये युवा इस में अपनी शान समझते है उनकी डिशनरी में शर्म, हया, पर्दा आदि शब्‍द अब लुप्‍त हो चुके है। पर क्‍या इस में हम भी कही दोषी तो नहीं कि हमारी (परिवार की) शिक्षा, परवरिश या संस्‍कारों में कही कोई कमी आई हो जिस के कारण हमारे यह बच्‍चे आज इस प्‍यार (झूठ) को बाहर तलाश रहे है। बहुत ही अच्‍छी रचना के लिए धन्‍यवाद।

के द्वारा: दीपक जोशी DEEPAK JOSHI दीपक जोशी DEEPAK JOSHI

के द्वारा:

यही घटना एक बार मेरे साथ हुई थी पर तब हाल कुछ और रहा..... रिक्शा स्टैंड से मैंने टोकन लिया आठ रुपए का....... और दस का नोट दिया उसने दो टाफी दी...... फिर मैं रिक्शा से ऑफिस की और चला गया ............ शाम को फिर मैं घर जाता समय मैं स्टैंड पर गया और दस का नोट दिया उसने फिर दो टाफी दी..... मैंने कहा की पांच का नोट दो मैं तीन देता हूँ........ और मैंने सुबह की दो टाफियां और एक रुपए का सिक्का दिया ........ वो बोला हम टाफी लेते नहीं है......... तो मैंने पुचा देते क्यों हो....... वो बोला खुले पैसा देना तुम्हारा काम है हमारा काम नहीं........ विवाद बढ़ा तो हमारे मित्र विभागीय रोब झाड कर बोले ................. तो फिर उसने सॉरी सर कह कर पांच रुपए दे दिया........ सरकार इन सांकेतिक मुद्रा चलाने वालों के खिलाफ कुछ नहीं करती इसका कारण समझ नहीं आता..... आज आपने याद दिला दी है एक बार कुछ प्रयास करके देखते है............... तब तक यूँ ही इनको इनकी भाषा में जवाब देते रहें........... अच्छे लेख के लिए बधाई.............

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani Piyush Pant, Haldwani

प्रिय जी............ जो आपने लिखा है वो काफी हद तक सही है......... पर इतना कह कर हम ये नहीं कह सकते की................... पता नहीं कैसे लोग इन महात्माओं के जाल में फँस जाते है.................... भारतीय संस्कृति अपनी अध्यात्मिक विचारधारा के मूल्यों पर टिकी है............ ये महात्मा जिनको लोग गुरु भी बनाते है और मानते है............. उनका काम अपने शिष्यों को संसार में रह कर संसार से दूर रहने का ज्ञान देना है..... पूर्व में राम कृष्ण परमहंस, स्वामी दयानंद, स्वामी रामानंद जैसे कई लोगों ने ये काम किया....... वर्तमान में जितने भी लोग इस तरह के अनैतिक कार्यों में लिप्त हैं...... वो वास्तव में उन लोगों की बोई फसल काट रहे हैं........... जिन्होंने इस क्षेत्र में कई बड़े काम किये............. सो गलत की बुरे करें पर किसी पूरी प्रक्रिया को गलत न ठहराएँ................ कुल मिला कर ढोंगियों के खिलाफ एक अच्छा लेख..........

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani Piyush Pant, Haldwani




latest from jagran