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क्या भारतीय सच में असभ्य है...???

Posted On: 27 Sep, 2010 Others में

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आज आमिर खान जी का विज्ञापन देखा टी. वी. पर जिसमे एक विदेशी परिवार एअरपोर्ट से निकलता है और टैक्सी से कैमरा निकाल कर फोटो खिंच ही रहा होता है की तभी उनके कैमरे पर केले का छिलका आ गिरता है फिर वो रस्ते में एक बच्चे को सु-सु करते हुए देखते है और हम भारतीयों की सभ्यता पर चकित होते है ………………….. है ये छोटी छोटी बाते जो हम अपनी रोज़ की दिनचर्या में रोज़ या तो करते है या किसी और को करते हुए देखते है पर इसे अनदेखा कर निकल जाते है . लेकिन यदि हम इसे एक बड़े स्वरुप में देखे तब हमें पता चलता है की ये कितनी बड़ी बात है …….. आपको लगता है की एक केले के छिलके से क्या होगा या एक चिप्स या कुरकुरे के पैकेट को फेंकने से क्या होगा लेकिन हम भूल जाते है की ऐसा सिर्फ हम अकेले नही सोच रहे ये करते वक़्त हर कोई यही सोचता है की एक चीज़ फेंकने से सड़क गन्दी तो नही हो रही और इस तरह हर कोई सड़क पर फेंकते हुए निकल जाता है और बिचारी सड़क का जो हाल होता है उसे देख कर नगर निगम वालो को कोसने लगते है पर क्या हमरी भी कुछ नैतिक ज़िम्मेदारी नही बनती इस ओर अगर हम झाडू लेकर सड़क की सफाई करने नही निकल सकते तो कम से कम सड़क को गन्दा करना भी तो कहीं से सही नही है बिचारी सड़क क्योंकि उसका कोई एक मालिक नही है इसलिए हर कोई अपनी संपत्ति समझ कर उसे गन्दा करता रहता है . जब मै रीवा में थी (मध्य प्रदेश का छोटा सा शहर) तो वहां पर एक बहूत ही बड़ा शौपिंग काम्प्लेक्स बनाया गया नाम था शिल्पी प्लाज़ा बहोत ही शानदार मार्बल फ्लोरिंग शानदार कलर का पैंट देखने में बहुत ही सुन्दर ……………लेकिन थोड़े ही दिन में उसका हाल देखने वाला था उस ईमारत के हर कोने में पान खाने वालो ने थूक थूक कर उसकी सुन्दरता में चार चाँद लगा दिए थे दिमाग ख़राब हो गया ये देखकर अगर वो ईमारत बोल सकती थी तो चीख चीख कर रोती हुई नज़र आती ज़रा सोचिए आप सज-धज कर बहार निकले और कोई पान के लाल लाल छींटे आप पर डाल दे कैसा लगेगा आपको और उस बिचारी ईमारत पर यह अत्याचार तो न जाने कितने सारे लोगो ने न जाने कितनी बार किया ………….और ऐसी ये एक ईमारत की कहानी नही है सरकारी अस्पताल जाकर देखी आपको येही हाल नज़र आएगा …………अब इन पान खाने वालो से कोई ये पूछो की इनके शौक का खामियाजा बिचारी ये इमारते क्यों भुगत रही है ……………खैर हमें क्या हमारे घर तो साफ़ रहते है …..वाला रवैया अपनाकर हर कोई इसे अनदेखा कर देता है ……. ………. ये सिर्फ एक छोटे से शहर की लोगो की ही बात नहीं है ……… अब जब मै दिल्ली आ गई हूँ तब भी अपने आस पास यही करते हुए लोगो को देखती हूँ …….. अब दुसरो के बारे में क्या कहू आप लोगो को बताती हूँ मै खुद भी सड़क पर कूड़ा फेंकने में हिचकिचाती नही थी लेकिन मेहरबानी हो मेरे पतिदेव जी की जिन्होंने समझाया की ये सही नहीं है और मै समझ भी गई अमूमन मै उनकी बाते आसानी से नही समझती पर ये बात तो समझनी ही थी क्योंकि मुझे भी सही लगी ठीक इसी तरह अगर हर कोई अपने आपको और अपने आस-पास के लोगो को ऐसा करने से रोके तो चीज़े अपने आप सुधर जाएंगी ……. अगर हम थोडा सा संकोच और हमें क्या लेना वाला रवैया छोड़कर ये करना शुरू कर दे तो चीज़े जरुर बेहतर होंगी ……….अगर आपके आस-पास कूड़ेदान नही है तो नगर-निगम में आप शिकायत कर सकते है ………..हाँ लेकिन ये भी है की नगर निगम हर ज़गह कूड़ेदान की व्यवस्था नही कर सकती है तो आप ही सड़क पर कूड़ा फेंकने की जगह उसे उस वक़्त अपनी गाडी में ही रख ले फिर जहां कूड़ेदान दिखे वहां डाल दे या फिर घर का कूड़े दान तो है ही . जिस तरह हम अपने घर को साफ़-सुथरा देखना चाहते है ठीक उसी तरह अगर हम अपने शहर को भी साफ़ रखने की ठान ले तो ये कोई कठिन नहीं है . बस छोटी छोटी आदतों में सुधार लाकर हम ऐसा कर सकते है और हाँ दुसरो को रोक-टोक कर भी आखिर ये हमारी नैतिक और सामाजिक दायित्य बनता है ……………… और हम ऐसा विदेसियो के सामने सिर्फ अपनी अच्छी छवि बनाने के लिए ही न करे बल्कि अपने शहर को साफ़ और सुथरा बनाने के लिए भी करे …………. शहर में गन्दगी फैला कर हम अपने आपको असभ्य तो साबित करते ही है साथ ही साथ बीमारियों को भी न्योता देते है …………. मैंने तो पहल कर दी है जरुरत है हम सबकी पहल की ………..तो आज से आप लोग भी अपने आस-पास गंदी फैलानो वालो को प्यार से समझाना शुरू कर दीजिए शुरुआत अपने घर से ही कीजिए……………………

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5 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Rachna Varma के द्वारा
September 28, 2010

प्रिया , आपने सही लिखा है कि देखने में ये सब बाते छोटी -छोटी लगती है मगर सच में हम भारतीयों को सिविक सेन्स बिलकुल नहीं है सडक ,फुटपाथ या किसी जगह पर गंदगी फैलाना हमारी आदत में शुमार हो चुका है और जरुरी है कि इन सब आदतों पर रोक लगाया जाये यदि हर कोई अपने को सुधार ले तो काफी हद तक हम अपने आस -पास का माहौल सुधार सकते है |

nishamittal के द्वारा
September 27, 2010

सच लिखा आपने ,हमारा स्वभाव बन चुका है दूसरों को कोसना और स्वयं वही कार्य करना.सब करते हैं,इसलिए हम भी वही सब करें मेरे विचार से इस धरना से मुक्त हुए बिना समाज देश का क्या स्वयं अपना भला भी नहीं कर सकते

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
September 27, 2010

प्रिय जी…….. सही कहा आपने जिसको हम आम बात कह कर टाल देते हैं…….. वो ही हमारी प्रतिष्ठा पर घात करती है………. अक्सर देखता हूँ की लोग सड़क के किनारे अपने घर का कूड़ा फेकते है…………….. और उनके चेहरे पर शर्म का कोई भाव नहीं होता………… इनके लिए कभी घर समाज से बड़ा हो जाता है……….. और कभी घर वालों की खुशियों से बड़ा समाज हो जाता है………….. ये कैसा इंसान है…………. अच्छे लेख के लिए हार्दिक बधाई……………

abodhbaalak के द्वारा
September 27, 2010

प्रियाजी आपने जो लिखा है वो सत्य है पर ये केवल भारत के लिए ही नहीं है. आपने क्या विश्व के और देशों में देखा है? लगभग यही हाल एशिया के हर देश का है, इसके लिए हम सब हे जिमेदार हैं, हमें खुद को बदलना होगा, और इसका प्रारंभ खुद से करना होगा. अछे लेख के लिए बंधी हो http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    priyasingh के द्वारा
    September 27, 2010

    हो सकता हो अबोध जी की ऐसा कई देशो का हाल हो पर इस बात से ये सब करना सही तो नही हो जाता ………… लेख पढने के लिए धन्यवाद पर असली बात तो तब है की जब आज से आप इस पहल में मेरा साथ दे …………….


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