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खुल्ले पैसो के बदले टॉफी ..............

Posted On: 27 Sep, 2010 Others,मस्ती मालगाड़ी में

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आज एक बड़ी मज़ेदार घटना घटी …… विस्तार से बताती हूँ ………….. अभी मै कुछ सामान लेने departmental store गई थी सारा सामान लेने के बाद बिलिंग करवाने के लिए खड़ी थी तो मेरे आगे खड़ी औंटी जी ने बिल दिया पर पैसे लेने वाले लड़के ने कह की क्या आपके पास दो रुपये के खुल्ले है तो उन औंटी जी ने कहा की नही है तो उसने कहा की ध्यान से देख लीजिए अगर हो तो ……… उन्होंने फिर से पर्स में हाँथ डाला और अपने पर्स से दो टाफी निकाल कर उसे पकड़ा दी …………वो पैसे लेने वाला लड़का टुकुर टुकुर उन्हें ताकने लगा ……….. तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा की…….. क्यों जब तुम लोगो के पास खुल्ले नही होते है तो तुम लोग भी तो हमे टाफी पकड़ा देते हो तो अब इस बार मेरे पास खुल्ले नही है ………………. अब क्या …… वो बिचारा लड़का झेंप गया और खुल्ले ढूंढने की कोशिश करते हुए कहने लगा की हाँ हाँ क्यों नही मै भी ले सकता हूँ क्यों नही क्यों नही ………….पर उसके हाथ खुल्ले ढूंढते जा रहे थे ……..ये सब देख कर मेरी हंसी फूट पड़ी और मैंने आंटी से कहा की आपने ये ठीक किया ………… ये लोग भी तो हमें कोई भी टाफी पकड़ा देते है चाहे वो टाफी हम खाते हो या न खाते हो …….तो उन आंटी ने कहा की हाँ और ऐसे में पर्स ऐसी ही टाफी से भरा रहता है ……….. इस बातचीत के बीच उस लड़के ने दो रुपये ढूंढ़ हुई लिए …….और उन्हें पकड़ा दिए………. खैर ये सब देख कर मुझे एक लाइन याद आ गई “ये भी खूब रही “………………………..

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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

abodhbaalak के द्वारा
September 28, 2010

  सच में, ये भी खूब रही, या ये कहें, “जैसे को तैसा मिला, कितना मज़ा आया.” मै भी येही सोच रहा हूँ, की आगे से जेब में टाफी रख कर घूमा जय. http://abodhbaalak.jagranjunction.com

pawan1990 के द्वारा
September 27, 2010

excellent…..it is truth…..it happens always with people who want to buy something…very nice…….

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
September 27, 2010

यही घटना एक बार मेरे साथ हुई थी पर तब हाल कुछ और रहा….. रिक्शा स्टैंड से मैंने टोकन लिया आठ रुपए का……. और दस का नोट दिया उसने दो टाफी दी…… फिर मैं रिक्शा से ऑफिस की और चला गया ………… शाम को फिर मैं घर जाता समय मैं स्टैंड पर गया और दस का नोट दिया उसने फिर दो टाफी दी….. मैंने कहा की पांच का नोट दो मैं तीन देता हूँ…….. और मैंने सुबह की दो टाफियां और एक रुपए का सिक्का दिया …….. वो बोला हम टाफी लेते नहीं है……… तो मैंने पुचा देते क्यों हो……. वो बोला खुले पैसा देना तुम्हारा काम है हमारा काम नहीं…….. विवाद बढ़ा तो हमारे मित्र विभागीय रोब झाड कर बोले …………….. तो फिर उसने सॉरी सर कह कर पांच रुपए दे दिया…….. सरकार इन सांकेतिक मुद्रा चलाने वालों के खिलाफ कुछ नहीं करती इसका कारण समझ नहीं आता….. आज आपने याद दिला दी है एक बार कुछ प्रयास करके देखते है…………… तब तक यूँ ही इनको इनकी भाषा में जवाब देते रहें……….. अच्छे लेख के लिए बधाई………….

daniel के द्वारा
September 27, 2010

पुरानी हास्य श्रंखला “ये भी खूब रही “… की याद आपने सच में ताज़ा कर दी ! ……………………….*हम सब को हँसाने के लिए धन्यवाद*………………….


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