priyanka

no defeat is final until you stop trying.......

36 Posts

521 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 3063 postid : 28

लिखने का भी एक नशा होता है ...!!!

Posted On: 18 Oct, 2010 Others में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

बहुत दिनों से कुछ लिखा नही था लेकिन फिर भी मन कुछ न कुछ सोचते जा रहा था मन भी कहाँ किसी के रोके रुकता है वो तो बस अपने ही मन की करता है………………………. ये बात तो है मै चाहे कलम से कितने भी दिन दूर रहू लेकिन मन में कुछ न कुछ लिखती ही रहती हूँ मन लिखने के नशे में डूबा रहता है ………..बस इसी फिराक में रहता है की जैसे ही थोड़ी फुरसत मिले और लिख लूँ …………….. पुराने दिन याद करती हूँ स्कूल और कॉलेज के दिन जब फुरसत ही फुरसत रहती थी ……………. नहीं नहीं ऐसी बात नहीं थी की मै पढ़ाई लिखाई से दूर भगा करती थी पर …… मन को और कोई खास काम नही रहा करता था ………………..सिवाय मेरे संग सोचने के सिवा वो मेरे संग मिल कर कुछ न कुछ खिचड़ी पकाता ही रहता था ………… हम दोनों एक लम्बी उड़ान पर निकल जाते थे ……………. मन की उड़ान …. मन जो कहीं भी जा पहुँचता है उसे उड़ने के लिए किसी हवाई जहाज की जरुरत तो होती नही है ……………… मुझे अभी भी याद है जब मैंने मन के साथ मिलकर पहली कविता लिखी थी अपने घर के पीछे लगे हुए बड़े बड़े केले के पत्तो पर …………. अब उसे पढ़ कर हंसी आती है ………… पर उस वक़्त जब वह कविता बच्चो की पत्रिका फुलवारी में छपी थी तब मै और मन हम दोनों कितने खुश हुए थे …………….. और कॉलेज के दिनों में तो पूछिए मत हम दोनों को बस एक ही काम था लिखना लिखना सिर्फ और सिर्फ लिखना ………….न जाने कितनी डायरिया भर डाली लिख लिख कर पर फिर भी हमारा नशा नही उतरा …………. रात को ३ बजे भी जब नींद अपने आगोश में लेने लगती थी तब मन झकझोर कर उठ देता था और लिखने का नशा हावी हो जाता था …………….. और हम दोनों ही इस नशे को छुपा कर ही करते थे किसी को पता नही चलने देते थे ………. किसी को भनक भी नही थी हमारे इस नशे के बारे में ………..आज भी कहाँ पता है किसी को ………….लिखना का नशा ऐसा नशा है जो बस अकेलापन चाहता है कोई न हो बस आप हो आपका मन हो और कागज़ कलम और कोई न हो ………….. दिन दुनिया से बेखबर बस लिखने के नशे में डूबे रहना चाहता है मन …………..इसके लिए रात का समय सबसे सही समय होता है बालकनी में कुर्सी रखकर उसमे आराम से पसर कर चाँद को तकते हुए लिखने की खुमारी में डूबे रहो ……….. लेकिन आजकल सारा नशा उतरा हुआ है इस बेरहम दुनिया के पचड़ो में पड़कर सारी खुमारी उतर चुकी है ………..ये दुनिया के रस्मो रिवाज़ ………… पहले तो शादी और ससुराल की उलझने और अब बच्चे की रोने की चीख-पुकार ………….. इन सब बातो के चक्कर ने तो मेरा नशा पूरी तरह उतार दिया है ……….. और अब तो मेरे नशे के सच्चे साथी मन ने भी मेरा साथ छोड़ दिया है उसे तो अब कागज़ कलम से ज्यादा बच्चे के संग खेलना उसे हँसते हुए देखना उसकी बदमाशियों में ज्यादा मज़ा आने लगा है ……………… अगर मै कोशिश भी करती हूँ और पुराने दिनों का वास्ता देकर उसके संग मिलकर कुछ लिखने की कोशिश भी करती हूँ तो भी वो बच्चे की किल्कारिया सुनकर भाग जाता है …………….. लेकिन मैंने भी ठान ली है की मै हार नही मानूगी आज मेरा मन मेरे साथ नही है तो क्या हुआ एक दिन फिर मै और मेरा मन साथ होंगे और हम दोनों फिर से लिखने के नशे में डूब जायेंगे तब तक मै जाती हूँ मन मुझे खींच कर ले जा रहा है बच्चे के संग खेल खिलौने खेलने के लिए…………………….

| NEXT

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading ... Loading ...

6 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

roshni के द्वारा
October 19, 2010

प्रिय जी .. बहुत खूब कहा .. मगर ये नशा सच में बहुत ही बढ़िया है……बस ये नाश चढ़ा रहे तो तनहा होकर भी तन्हाई नहीं होती….. धन्यवाद सहित

Dharmesh Tiwari के द्वारा
October 19, 2010

नमस्कार प्रिया जी, बिलकुल सही है ये की हर काम नशे से ही होता है नशा बुरा भी है लेकिन देखा जाय तो बिना नशा के कुछ भी नहीं होता,खैर हमारी तो यही कामना है की आप ब्यस्त जीवन में होते हुए भी इस नशे से दूर न हो पायें ताकि कुछ अच्छी लाईने हम लोगों को पढने को मिलती रहें,धन्यवाद!

harish के द्वारा
October 18, 2010

सच में लिखना एक बहुत अच्छी आदत है. बहुत अच्छा लेख.

दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
October 18, 2010

प्रिया जी, नमस्‍कार, बहुत अच्‍छी सोच है आप की, यह रचना का उदय इस मंच (जागरण ब्‍लॉग) पर आने के बाद ही हुआ होगा। इस मंच से जुड़ने के बाद मेरे भी अंर्तमन में उथल पुथल मचाता रहा। आज तक 45 प्‍लस होने के बाद भी पहले कभी यह लिखने का नशा नहीं किया था। परन्‍तु इस परिवार (जागरण ब्‍लॉग) से जुड़ने के बाद दिमाग में विषय घुमते रहते है कि इस विषय पर लिखू या उस पर। वैसे तो नशा कोई भी हो वह गल्‍त है पर आप के इस नशे के लिए तो मेरा कहना है – लगी रहो प्रिया बहन। http://deepakjoshi63.jagranjunction.com

ashvini kumar के द्वारा
October 18, 2010

लिखना एवं पढना दोनों ही नशा होता है ,,पर आजकल अच्छी किताबों मिलती कहाँ है,अगर मिलती भी हैं तो जेबें इतनी हल्की कर देती हैं,दो चार दिन आह आह करते बीत जाता है |

abodhbaalak के द्वारा
October 18, 2010

प्रिय जी, \"होनहार बिरवान के होत चीकने पात\" आप पर सही बैठता है, आपमें बचपन से ही लेखन कला बसी है, जैसा की आपने लिखा है, और निसंदेह आपके लेखन में काफी सरलता और सुन्दरता है, आपका कथन सत्य है की लिखना भी एक तरह से नशा है, ऐसे ही लिखती रहे, http://abodhbaalak.jagranjunction.com


topic of the week



अन्य ब्लॉग

  • No Posts Found

latest from jagran