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उद्यानों की आबो-हवा ख़राब हो रही है ...???

Posted On: 19 Oct, 2010 Others,मेट्रो लाइफ में

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जब मै नयी नयी शादी करके दिल्ली आई थी तो मुझे बिलकुल अच्छा नही लगता था ………….. आधे समय तो मै अपने घर को याद कर के रोती ही रहती थी ………. ऐसे ही शाम को मै उदास बैठी थी मेरा मन बहलाने के लिए पतिदेव जी ने कहा की चलो पास में ही पार्क है तुम्हे अच्छा लगेगा टहल कर आते है ……………. तो मैंने भी सोचा की हाँ हो सकता है खिले खिले फूलो और मंद गति से हवा के संग बहती हुई पत्तियो को देखकर मन को कुछ अच्छा लगे … तो हम चल पड़े साथ में सासु माँ , मामी सास , और मामी सास की छोटी सी लड़की वो भी हो ली ……………….. हम पार्क में पहुंचे ………. और सच में पार्क बहुत ही अच्छा था …………….. नर्म नर्म मुलायम घास …….करीने से सजे हुए फूल ……………हरे हरे पेड़ ………. और घनी घनी झाडिया ….. और……………………………. उन पेड़ो के निचे बैठे हुए कई जोड़े ……………. दिन-दुनिया से बेखबर अपने में ही गुम……… ये सब देखते हुए अचानक मेरी आँखे चौंक गई ……………. वो दृश्य जन्हें हम टी.वी. में भी देखते वक़्त रिमोट का बटन झट से दबा देते है और उन्हें मारे शर्म के देखते नहीं है ……….वही दृश्य मेरे सामने थे …………. जिन्हें शब्दों में लिख कर समझा पाना मेरे लिए मुमकिन तो नहीं ही है ………. लेकिन जो भी दिल्ली या किसी भी महानगरीय उद्यानों की सैर पर गए होंगे वो समझ ही गए होंगे और बाकी लोगो ने अंदाजा लगा लिया होगा ……… ….मैंने आस-पास नज़र दौडाई पर मेरे अलावा किसी को ज्यादा फ़र्क नहीं पड़ रहा था क्योंकि अधिकतर लोग अपनी शाम की सैर का आनंद ले रहे थे और कुछ लोग कान में इअर फ़ोन लगाए हुए जोगिंग करने में व्यस्त थे ………..और कुछ लोग आराम से बैठे हुए इन जोड़ो को देखने में व्यस्त थे …………….. एक मै ही थी जो उस माहौल में असहज महसूस कर रही थी ………………उसके बाद मै दिल्ली के कई उद्यानों में गई और हर जगह यही हाल था ………………… पता नहीं क्यों लेकिन इसे देखकर मेरा मन मुझे इतना कचोटता है की क्यों क्यों आज कल हमारे संस्कार इतने कमज़ोर हो गऐ है ………….. इसे प्यार का नाम देकर हम खुलेआम क्यों इसका प्रदर्शन करने में एक पल भी नही हिचकिचाते है …………………मेरे नज़र में तो ये कहीं से भी प्यार नही है …..इसे प्यार का नाम देकर मै प्यार जैसी पवित्र और पावन भावना को अपमानित नही कर सकती …………. और सबसे बड़ी और आश्चर्य वाली बात मुझे ये लगी की लोगो को इससे रत्ती भर भी फरक नही पड़ रहा था ………….ये सब उनके लिए एक आम बात थी ऐसे सब पार्क में घूम रहे थे जैसे उन्हें कुछ दिखाई ही नही दे रहा था …………….. पर मै अपनी आँखों का क्या करती मेरी आँखे तो अभी तक ठीक ही है अभी वो महानगरीय चकाचौंध में अंधी नही हुई थी पर यहाँ पर तो सबकी आँखे महानगरीय चकाचौंध में अंधी हो चुकी है और अपनी अंधेपन को छुपाने के लिए सबने आधनुकिता का चश्मा भी पहन लिया है …………..लेकिन आधानुकिता की इस अंधी दौड़ में लोग ये भूल रहे है की हम अपने संस्कार मर्यादा और संस्कृति को कहीं दूर पीछे छोड़ते जा रहे है हम उन्ही चीजों को पीछे छोड़ते जा रहे है जिनके कारण हमारी पहचान है हमारा अस्तित्व है …………………….प्यार के इस झूठे और भोंडे प्रदर्शन के कारण हम हमारा और हमारे समाज का कितना नुक्सान कर रहे है ये हम सोच ही नही पा रहे है ………………. ये लड़के और लडकिया कितनी बड़ी भूल कर रहे है ये समझ ही नहीं पा रहे है ….. अगर ये थोड़ा सा भी दिल और दिमाग से सोचे तो इन्हें ये समझ में आ जाएगा दिल और दिमाग दोनों का नाम इसलिए ले रही हूँ क्योंकि आजकल के बच्चे दिमाग से कम और दिल से सोचना ज्यादा पसंद करते है…………………..लेकिन मुझे लगता नही है की इन लोगो को कुछ भी समझ में आएगा और जब तक समझ में आएगा तब तक ये लोग अपनी ज़िन्दगी का क्या खो चुके होंगे इन्हें ये कभी पता ही नही चल पायेगा औए इन्हें ये बात समझाएगा भी कौन क्योंकि जो लोग इन्हें समझा सकते है जो इनके माँ बाप है वो खुद पैसे कमाने की दौड़ में इतने दूर जा चुके है की उन्हें वक़्त ही नही है की उनके बच्चे क्या कर रहे है कहाँ है ……………………अब इस बात के लिए किसको ज़िम्मेदार ठहराया जाये आजकल के माहौल को पश्चिमी सभ्यता के अन्धिनुकरण को या हमारे पिक्चरो को टी वी को या अपने आप को…………………….. जैसे संस्कार हमारे माँ पिताजी ने हमारे अन्दर डाले वो पाठ हम उन्हें नही पढ़ा पा रहे है…….खैर कारण तो कई हो सकते है पर उन कारणों के निदान भी हमें ही खोजने होंगे नही तो जिन संस्कारो जिस प्राचीन संस्कृति पर हमें गर्व हुआ करता है वही हम खो देंगे……………………………. जैसे अब मुझे दिल्ली में रहते हुए मुझे ४ साल हो गए है पर दिल्ली के उद्यानों में जाने की इच्छा नही होती उसी तरह हर कोई यही करने लगेगा क्योंकि हमारे उद्यानों की आबो हवा खराब हो रही है हमारे ही घर के फूलो से …???

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
October 20, 2010

आदरणीय प्रिया जी, आप ने सही ही कहा है …………..लेकिन आधानुकिता की इस अंधी दौड़ में लोग ये भूल रहे है की हम अपने संस्कार मर्यादा और संस्कृति को कहीं दूर पीछे छोड़ते जा रहे है हम उन्ही चीजों को पीछे छोड़ते जा रहे है जिनके कारण हमारी पहचान है हमारा अस्तित्व है। और इसे प्‍यार न कह कर नग्‍नता ही कहे तो सही होगा। आज के ये युवा इस में अपनी शान समझते है उनकी डिशनरी में शर्म, हया, पर्दा आदि शब्‍द अब लुप्‍त हो चुके है। पर क्‍या इस में हम भी कही दोषी तो नहीं कि हमारी (परिवार की) शिक्षा, परवरिश या संस्‍कारों में कही कोई कमी आई हो जिस के कारण हमारे यह बच्‍चे आज इस प्‍यार (झूठ) को बाहर तलाश रहे है। बहुत ही अच्‍छी रचना के लिए धन्‍यवाद।

Dharmesh Tiwari के द्वारा
October 19, 2010

आदरणीया प्रिया सिंह जी,ये सही बात है की स्थिति काफी ख़राब हो चुकी है जिसमे युवा वर्ग तो जयादा जिम्मेदार है ही साथ में घरवाले भी……..मै इस लेख को पढ़ते वक्त यही ढूंढ़ रहा था जो आखिर बाद में मिल ही गया…….आज इस पर जितना युवाओं को सोचने की जरुरत है शायद उससे कहीं जयादा बड़े बुजुर्गों को,बढ़िया लेख,धन्यवाद!

sdvajpayee के द्वारा
October 19, 2010

प्रशंयनीय।

abodhbaalak के द्वारा
October 19, 2010

प्रिया जी “आधानुकिता की इस अंधी दौड़ में लोग ये भूल रहे है की हम अपने संस्कार मर्यादा और संस्कृति को कहीं दूर पीछे छोड़ते जा रहे है हम उन्ही चीजों को पीछे छोड़ते जा रहे है जिनके कारण हमारी पहचान है हमारा अस्तित्व है ” आपने सही कहा है की आज हम उन्ही चीजों को पीछे छोड़ते जा रहे हैं जिनके कारण हमारी पहचान है पर अगर आप नयी पीढ़ी से ये सब कहेंगी तो वो आप को कहेंगी, की आप तो ओल्ड फैशन और रूढ़िवादी है, हाय रे नया दौर! सुन्दर रचना के लिए बधाई हो http://abodhbaalak.jagranjunction.com


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