priyanka

no defeat is final until you stop trying.......

36 Posts

521 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 3063 postid : 36

क्या साहित्य रचना औरतो के बस का काम नहीं ...???

Posted On: 22 Oct, 2010 Others में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

नही नही ये मेरे स्वयं के विचार नही है ……….ये तो कल मैंने एक पत्रिका में charlotte bronte की एक किताब के बारे में पढ़ा वही लिखा हुआ था की ………”साहित्य रचना औरतो की आजीविका का साधन नही हो सकती और होना भी नही चाहिए अगर औरत अपने सामाजिक रूप से तय कर्तव्यों को ढंग से निभा रही हो तो उसे फुरसत ही नही मिलेगी की वह कुछ लिखे …” ये पढ़ते ही मेरे दिमाग में पहला विचार यही आया की ये लेखिका तो यूरोप की विक्टोरियन युग की लेखिका है तो इसका मतलब है की औरतो के साथ हर युग में हर देश में ही अन्याय होता आया है ….. और ये जान कर संतोष भी हुआ की हमें सिर्फ भारत को ही नही कोसना चाहिए ………..ये तो घर घर की कहानी है ………. लेकिन अगर ध्यान से इन वाक्यों को पढ़ा जाये तो मुझे तो कहीं न कहीं ये वाक्य सही दिखाई पड़ते है ……क्योंकि कुछ गिनी चुनी नामचीन लेखिकाओ को छोड़ दिया जाय तो इस लेखन विधा पर हमेशा से ही पुरुषो का ही वर्चस्व दिखाई पड़ता है ………….और हो भी क्यों न पुरुष ही है जो शादी हो जाने के बाद भी आराम से पूरी बेफिक्री के साथ एक कमरे में बंद होकर लिख जो सकते है ………….. और हाँ शादी न करने के लिए मना भी कर सकते है जब चाहे जिस समय वो शादी कर सकते है ………….. और हम बिचारी लडकिया सारी मर्यादाओं और संस्कारो की दुहाई देकर फटाफट ढंग का लड़का मिलते ही हमें निपटा दिया जाता है हम तो ये कह ही नही सकते की अभी शादी नही करनी तमाम सवाल खड़े हो जाते है …………… क्यों भई क्यों नही करनी माजरा क्या है कोई लड़का देख रखा है क्या, माँ बाप क्या पूरा मोहल्ला सकते में आ जाता है …………….बिचारी लड़की सोचती है की चुप चाप हाँ करने में ही भलाई है……..और फिर शादी के बाद तमाम उलझने ………..सास की ससुराल की पति की घर की …………….और उसके बाद बच्चे की ……………..वो कहाँ कमरे में बंद होके कुछ वक़्त खुद के साथ बिता पाती है उस बिचारी औरत के अन्दर जो लेखिका होती है वो धीरे धीरे दम तोड़ ही देती है ………….. ऐसा मै खुद के अनुभव से और आस-पड़ोस देख कर ही कह रही हूँ ……….. मै खुद जितना पहले लिख पाती थी उतना अब नही लिख पाती हूँ ……….इसमें दोष किसी और का नही खुद हमारा ही होता है हम लडकियों की परवरिश ही ऐसे की जाती है की हम खुद ही शादी होते ही सारे शौक और पसंद को भूल कर घर पति बच्चो में रम जाते है ………..और हम लडकियों ने खुद भी अपने घर और आस-पास यही देखा भी होता है तो हम वही करते है जो हमें सिखाया जाता है की सबसे पहले अपने घर अपने परिवार को रखो फिर अपने आपको ………….खैर इसमें कोई बुराई भी नही है क्योंकि हमें भगवान् ने इस तरह रचा होता है की जितनी अच्छी तरह से हम एक परिवार चला सकते है एक मकान को घर बना सकते है वैसे पुरुष नही कर सकते …………..और हम अपने इस कार्य को करने में इतना रम जाते है की हम अपनी ख़ुशी से अपने शौक को भूल जाते है ………….. और मुझे पता है की मेरी इस बात से सारा पुरुष वर्ग भी सहमत ही होगा ……. लेकिन क्या यह सत्य है कि सहित्य रचना औरतो के बस का काम नही ……….अगर मै स्वयं से इसका जवाब पूछु तो मुझे जवाब हाँ में ही मिलेगा……जब किसी कहानी या किसी विषय पर वो लिखना चाहती है तो कई ऐसे विषय जिन पर मन में विचार तो कई होते है पर उन्हें कलम के जरिये उतार नही पाती है वो झिझक जाती है और जो सम्पूर्ण बेबाकी से लिखती भी है उन्हें तरह तरह की विषम परिस्थितियों से गुजरना पड़ता है तसलीमा नसरीन तो सबको याद ही होंगी , लेकिन पुरुष लेखको की स्तिथि इससे उलट है उन्हें प्रशंशा का पात्र समझा जाता है , खैर अगर मै अपना उदहारण लूँ तो मै तो समयाभाव को ही दोष दूंगी मेरी तरह कई लेखिकाए अपनी घर की जिम्मेदारियों को सबसे पहले और लेखन एवं अपने अन्य शौक को सबसे अंत में रखती है………….मेरे मन में कितने विचार घुमड़ते रहते है पर समयाभाव के कारण उन्हें कागज़ पर किसी रचना का आकार नही दे पाती जबकि शादी से पहले जब भी कोई विचार या ख्याल मन में आता था उसे फट से लिख लेती थी ………….. हो सकता है पुरुष वर्ग मेरे इस विचार से असहमत हो और वो कहे की हमें भी तो ऑफिस या व्यापार संभालना पड़ता है पर फिर भी पुरुष वर्ग चाहे जितना इस बात को अस्वीकार करे लेकिन ये तो है की वो अपने हर कार्य बड़े आराम से कर लेते है चाहे वो उनके शौक हो या दोस्तों के साथ समय बिताना हो या फिर कोई अन्य काम ……… मुझे ऐसा लगता है की लेखन ऐसा काम है जो शान्ति और सुकून चाहता है यदि हम कुछ लिखना चाहते है और हमें उसे पन्नो पर उतरने का समय ही न हो तो वो विचार मन में गुम हो जाता है और यदि उस विचार को उस वक़्त किसी रचना का आकार ना दो तो वो विचार व्यर्थ ही हो जाता है ……………..लेकिन फिर भी अपने आस पास अनीता देसाई , अरुंधती राय, झुम्पा लाहिरी, महाश्वेता देवी,सुभद्रा कुमारी , आदि कई नाम है जिन्होंने कमाल लिखा है और हमारे लिए उदाहरण भी रखा है की अगर मन में तीव्र इच्छा हो तो चाहे तमाम काम हो , राह में चाहे कितने रोड़े हो हर किसी को अपनों मंजील मिल ही जाती है ……………….और हम औरते यह भी दिखा देती है की घर बच्चे सबको संभालने के बावजूद हम समाज में अपनी उपस्तिथि भी दर्ज़ कर ही देते है ………………….हाँ ये है की हम महिला लेखिकाओ को गिनती चाहे कम हो और हमने किताबे चाहे कम छपवाई हो पर न जाने कितने घरो को सजाया संवारा और रोशन किया है हमने ……………..

| NEXT

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

22 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

October 25, 2010

जिस ज्ञान क्षेत्र का आराध्य ही देवी सरस्वती को माना जाता है……… उसको क्षेत्र में महिलाओं को कमतर कैसे माना जा सकता है………… जितनी कहानियां माएँ अपनी संतानों को सुनती हैं वो अगर संकलित की जाएँ तो न जाने कितना साहित्य हर रोज निर्मित हो जाये………….. अच्छे लेख के लिए हार्दिक बधाई………….

abodhbaalak के द्वारा
October 23, 2010

प्रिया जी, जहाँ तक मुझे लगता है की औरतों में त्याग की भावना अधिक होती है और वो मातृत्व को और परिवार के पालन पोषण को अधिक महत्त्व देती हैं, ये कहना की औरतों में साहित्य रचना का अभाव है ,सर्वथा गलत होगा, बल्कि मेरा तो या मानना है की वो पुरुषों से कहीं अधिक सामर्थ्य रखती हैं, आपने एक सुन्दर विषय को अपने लेख में उठाया है, सराहना करनी ज़रूरी है. http://abodhbaalak.jagranjunction.com

    priyasingh के द्वारा
    October 24, 2010

    सराहना के लिए धन्यवाद …………

jalal के द्वारा
October 23, 2010

यह तो सच है प्रिया जी, के औरतों को समय नहीं मिल पाता. कारण कई हैं जैसा की आपने गिनाया. और रही लेखन की बात तो हर कोई लिख सकता है. लेकिन (याद रहे यह लेकिन है) पुरुष ज्यादातर उन्हें इन सब चीज़ों के लिए वक़्त नहीं देते. खुद करें तो महान कार्य और स्त्री करे तो वक़्त का दुरूपयोग समझते हैं. जल्दी महत्व ही नहीं देते .क्यूंकि अपने से आगे बढ़ता हुआ नहीं सह पाते. अपने आप को ऊँचा समझने की मानसिकता जो है. हालाँकि सभी ऐसे नहीं है. चलिए आपका लेख कुछ की आँखें तो ज़रूर खोलेगा. बधाई हो और समय मिले तो जवाब दें.

    priyasingh के द्वारा
    October 24, 2010

    एक पुरुष होकर भी आपने पुरुषो की खामियों को पहचाना मेरे लिए ये आश्चर्य की बात है ……………. लेकिन ये भी सही कहा की सभी ऐसे नहीं होते है ………… मेरा ये लेख किसी को आँखे खोल सकता है ऐसा सोचने के लिए धन्यवाद ……..आप सबकी अमूल्य प्रतिक्रियाए लिखने के लिए प्रेरित करती है ………..

roshni के द्वारा
October 23, 2010

प्रिया जी, बड़ा ही उतम ख्याल पेश किया अपने… और आपकी बातिने साडी की साडी सच भी है .. मैंने अपने आस पास बहुत सी ऐसी शादी शुदा महिलये देखि है जो शादी से पहले तो बहुत तरह के काम करती थी अपनी प्रतिभा का लोहा मानवती थी मगर शादी होते ही सब कुछ भूल कर अपने घर संसार में रम जाती है … और जो नहीं रम पाती वोह मन में इस टीस को लिए रहती हैं … लिखाण या कोई और प्रतिभा को भूलकर अपने निजी संसार के निर्माण में ही वोह खुद को खुश महसूस करती है ……. युभी नारी बड़ी महान है और अगर वोह चाहे तो अपने व्यस्त समय से कुछ पल चुराकर लिख सकती है बस उसका पाती अगर उसका साथ दे तो ….. बढ़िया लेख के लिए आभार

    priyasingh के द्वारा
    October 23, 2010

    आप मेरी भावनाओं को समझ गई …………..पति का साथ सच में बहुत ही आवश्यक होता है और इस मामले में मै खुशकिस्मत हूँ …………….. भावनाओं को समझने के लिए धन्यवाद……..

Nikhil के द्वारा
October 23, 2010

करे जो सिंह की सवारी, जिसे पूजे है दुनिया सारी ए मेरे दोस्त, इश्वर की वो नायाब रचना है नारी. और जहाँ तक रहा औरतों के साहित्य रचने का सवाल, तो आपके साहित्य सृजन करने की क्षमता ही उसका उत्तर है. अच्छा लेख बधाई. निखिल झा

    priyasingh के द्वारा
    October 23, 2010

    हौसला-अफजाई के लिए शुक्रिया…………….

atharvavedamanoj के द्वारा
October 23, 2010

प्रिया जी बहुत कुछ निर्भर करता है की आप स्त्रीत्व को कैसे परिभाषित करती हैं और साहित्य के प्रति आपका दृष्टि कोण क्या है?…… हाँ ये है की हम महिला लेखिकाओ को गिनती चाहे कम हो और हमने किताबे चाहे कम छपवाई हो पर न जाने कितने घरो को सजाया संवारा और रोशन किया है हमने ……सलाम करता हूँ इस लाइन को| मनोविज्ञान कुछ दुसरे तरीके से परिभाषित करता है…neuropsychology के अनुसार स्त्रियों का लेफ्ट hemisphere अधिक प्रभावी होता है इसलिए मेरी दृष्टि में वे पुरुषों से अधिक अच्छे साहित्य का सृजन कर सकती हैं…हाँ आधुनिक देह विमर्श से थोडा हटके….लोक लीक गाडी चलें लिकही चले कपूत तिन लीक पर ना चले शायर, सिंह, सपूत

    priyasingh के द्वारा
    October 23, 2010

    आपकी टिपण्णी की अन्तिम वाक्यों का मतलब अवश्य जानना चाहूंगी …………. आपकी अमूल्य प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद ………..

Ramesh bajpai के द्वारा
October 23, 2010

प्रिया जी , रानी झाँसी , बचेंद्री पाल, किरण बेदी , इंदिरा गाँधी . कब किससे कम थी . जब भागवान विष्णु योग निंद्रा में थे तब समाज के

    Ramesh bajpai के द्वारा
    October 23, 2010

    प्रिया जी……… तब भगवती दुर्गा ने सामाजिक हितो की स्थापना के लिए स्वयं शश्त्र उठाये इसलिए नारी के नाते लेखन में कहा दिक्कत हो सकती है आप बिना किसी दबाव के लिखिए

    priyasingh के द्वारा
    October 23, 2010

    सही कह आपने ……आप सब आदरणीयो की शुभ कामनाये चाहिए ……………धन्यवाद………

chaatak के द्वारा
October 23, 2010

प्रिया जी, मैं बहुत कम शब्दों में सिर्फ इतना कहना चाहूंगा- पुरुष तो साहित्य का निमित्त मात्र है जबकि स्त्री स्वयं साहित्य होती है| वफ़ा करे तो प्रेम-गीत, बेवफाई करे तो दर्द के नगमे, माता बने तो वात्सल्य, बहन हो तो शौर्य| मैं हमेशा यही महसूस करता आया हूँ कि शब्द वाग्देवी के होते हैं और निमित्त मैं और डरता हूँ कि उसने स्वयं कलम उठा ली तो मैं तो कहीं का नहीं रह जाऊँगा| आप इसी तरह से लिखते रहिये| वाग्देवी किसी से भी प्रसन्न हो सकती हैं और वे भी तो स्त्री स्वरूप है! अच्छा लेख बेहतर प्रस्तुति, जारी रखिये शुभकामनाएं!

    priyasingh के द्वारा
    October 23, 2010

    आपकी प्रतिक्रिया से आत्मबल मिला …………….. धन्यवाद……….

K M MIshra के द्वारा
October 22, 2010

हैरी पॉटर उपन्यास श्रृंखला लिखने वाली भी एक महिला ही हैं । कृष्णा सोबती, अमृता प्रीतम, इस्मत चुगतई, मन्नू भंडारी आदि तमाम महिलाएं है जिन्होंने साहित्य में नाम कमाया है । महिलाएं साहित्य नहीं रच सकती ये धारणा गलत है । आपके अंदर भी एक लेखिका छिपी है । ब्लागिंग के माध्यम से उसे उभारिये । आभार ।

    priyasingh के द्वारा
    October 23, 2010

    कृष्ण सोबती के बारे में आपके माध्यम से और जानना चाहूंगी …………… सराहना के लिए धन्यवाद …

rajkamal के द्वारा
October 22, 2010

अब सच्चाई मेरे मुहं से सुन कर आपको दुःख होगा …. आप खुद ही देखले कि आप कैसा लिखती है ….

    priyasingh के द्वारा
    October 23, 2010

    आपके मुह से सच्चाई जरुर सुनना चाहूंगी यकीन मानिये दुःख नही होंगा ……….. आपकी सच्चाई के इंतज़ार में……………..

chandrashekhar Prasad, Haldwani के द्वारा
October 22, 2010

प्रियंका जी आप का लेखा पढ़ कर अच्छा लगा! आप ने सत्य को पहचान लिया और शादी हो गई हो तो महसूस भी हो गया होगा! समाज एक जटिल प्रिक्रिया है, इस लिय बदलाव में सदियों बीत जाता है और बदलाव भी नहीं आ पता है! इस लेख के किय आप को धन्यवाद!

    priyasingh के द्वारा
    October 23, 2010

    टिपण्णी के लिए धन्यवाद ………………..


topic of the week



अन्य ब्लॉग

  • No Posts Found

latest from jagran