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कभी तुमने देखा है धुप को ...

Posted On: 8 Nov, 2010 Others में

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कभी तुमने देखा है धुप को -
आसमान से उतर कर छत से होकर घर के आँगन पर पसरते हुए…
कभी तुमने देखा है धुप को-
लकड़ी की खिड़कियो के कोनो से निकल कर उंगलियो से खेलते हुए…
कभी तुमने देखा है धुप को-
आसमान के काले बादलों से छुप कर चोरी से बारिश की बूंदों पर पड़ते हुए…
कभी तुमने देखा है धुप को-
सर्द कोहरे को चीरकर पत्तो पर पड़ी उस की बूंदों को सुखाते हुए…
कभी तुमने देखा है धुप को-
धरती पर अपनी तपिश छोड़कर आसमान के कोनो में लौटते हुए…

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
November 9, 2010

कभी तुमने देखा है धुप को- सर्द कोहरे को चीरकर पत्तो पर पड़ी उस की बूंदों को सुखाते हुए… खूबसूरत कविता के लिए हार्दिक बधाई……………

rajkamal के द्वारा
November 9, 2010

प्रियांका जी …अभिवादन ! बहुत ही अच्छी कविता ….. अनकहे + अनसुने मगर जाने पहचाने हुए एहसासों को व्यक्त करती हुई सुंदर कविता …. (आगे से एक दिन में सिर्फ एक ही पोस्ट किया करे )


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