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आई. आई. टी. और लव स्टोरी ...?

Posted On: 11 Nov, 2010 Others में

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अभी से ९ महीने पहले मेरे पास कुछ काम नही था सिवा आराम करने के क्योंकि मै प्यारे से नन्हे मुन्ने को जनम देने वाली थी …..और डाक्टर ने मुझे ज्यादातर आराम करने की सलाह दे रखी थी और उसकी ये सलाह मैंने बड़ी ख़ुशी ख़ुशी मानी थी क्योंकि मुझे आराम करने में बड़ा मज़ा आता है और मै आराम पसंद व्यक्तिओ में गिनी जा सकती हूँ ………. लेकिन आराम भी कुछ दिन ही आराम से किया जा सकता है पूरे ९ महीने तो मुझे भी थोड़ी उकताहट होने लगी थी क्योंकि टी वी पर जितने चैनल आते थे उनके सारे सिरिअल भी देख डाले पर फिर भी समय नही कटता था फिर किसी ने कहा की इस समय सत्संग में मन लगाया करो बच्चे में अछे संस्कार आयेंगे मैंने कहा की नही भाई मुझे कोई संत महात्मा नही पैदा करना पता चले मेरे पास न रहे हिमालय में जाकर बस जाए …… फिर सासुमा माँ ने कहा की रामायण पढ़ा करो बच्चे में अछे गुण आयेंगे लेकिन आप पूरे दिन तो रामायण नही पढ़ सकते है …………… पतिदेव भी जहाज पर चले गए थे मर्चेंट नेवी वाले जो ठहरे तब तक जागरण मंच भी नही मिला था की ब्लॉग ही लिख लेती तब मै अपने दादा(बड़े भैया) के पास गयी और वहाँ रखी ढेर सारी किताबे उठा लायी और उन्हें पढ़ना शुरू किया उनमे ३ किताबे तो चेतन भगत की थी जो आई. आई. टी. के छात्र रह चुके थे इसी तरह और भी कई किताबे जिनके नाम मेरी बहन ने बताये और कहा की ये सारी किताबे नेशनल बेस्ट सेलर रह चुकी है वगौरह वगैरह सब पढ़ी और सब में ये समानता थी की ये सारी किताबे आई. आई. टी. या आई. आई. ऍम . में पढ़े लोगो ने लिखी थी और सब की सब लव स्टोरी थी मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ की इतनी पढ़ाई के बीच भी इन्हें प्यार के बारे में सोचने का समय मिल जाता था और देखो केवल सोचा ही नहीं एक पूरी की पूरी किताब भी छपवा भी डाली …… अच्छा है अभी तक मै यही सोचती थी की जो आई.आई.टी करते होंगे वो जरुर किसी दुसरे गृह के प्राणी होते होंगे और उन्हें पढने के अलावा और कुछ सोचने या करने का समय ही नहीं मिलता होगा पर मेरा ये भ्रम इन लव स्टोरी को पढने के बाद टूट गया …….मेरे लिए ये बहुत ही आश्चर्य की बात रही क्योंकि स्कूल के दौरान मै यही देखती थी की जो पढने में बहोत ही तेज होते थे वो पहली बेंच में बैठते थे टीचर के आगे पीछे डोलते रहते थे और उनके पसंदीदा रहते थे और इन लड़के लडकियों के पास सिर्फ पढ़ाई ही एक काम होता था लड़के लडकियों में दिलचस्पी नही दिखाते थे और न ही लडकिया लडको……………. में उन पढ़ाकू लोगो से बात भी करो तो हमें चिंता दे देते थे की इन लोगो ने तो सब पढ़ डाला सब याद करके रिविसन भी कर लिया और हम अभी तक यही नही जानते की किताब मे पाठ कितने है……….. पर ऐसा नही है ये दुसरे गृह के प्राणीयो के पास दिल नाम की वस्तु होती है और वो धड़कती भी है ये इन किताबो को पढने के बाद साबित हो गया ………… अच्छी बात है प्यार के बारे में सभी को सोचना ही चाहिए तभी हम इंसान बने रह सकते है नही तो आई.आई.टी. और आई.आई ऍम की किताबो को देखने के बाद मै यही सोचती थी की इन्हें एक साथ उठाया कैसे जाए और इन्हें उठा कर कालेज कैसे जाया जाये …………..लेकिन प्यार ने इन किताबो को पढने वालो को इंसान ही बने रहने दिया मशीन बनने से बचा लिया नहीं तो सोचिए हमारे बीच कितने पढ़े-लिखी मशीने होती जिनके दिमाग में बस पढ़ाई ही पढ़ाई और किताबो की रटी रटाई बाते होती ……………….. लेकिन हाँ एक बात इन सब बातो के बीच तो मुझे अभी समझ में आ रही है की मेरे नन्हे मुन्ने ने तो रामायण भी पढ़ी और लव स्टोरी भी सास बहु ड्रामा भी देखा अंग्रेजी फिल्मे भी …. भजन भी सुने और जार्ज माइकल को भी इनमे से उसने किन गुणों को उसने आत्मसात किया होगा और क्या प्रभाव पडा होगा खैर ये तो भविष्य के गर्भ में छुपा हुआ है और मुझे बाद में ही पता चलेगा की बड़े-बूढों की ये बात की ९ महीनो के दौरान जो सोचो और पढो उसका बच्चे पर असर होता है……..तब तक के लिए आप सबको शुभ-रात्रि …

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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

chaatak के द्वारा
November 12, 2010

प्रिया जी, इसमें कोई शक नहीं है कि बच्चों पर जन्म से पहले ही आसपास होने वाली घटनाओं का प्रभाव पड़ना शुरू हो जाता है और आगे चलकर बच्चे उन्ही प्रमुख गुणों को प्रकट करते हैं जिनका अनुभव उन्हें माँ के गर्भ में होता है| आपकी लेखन शैली बताती है कि आप जिज्ञासु होने के साथ-साथ एक अच्छी विश्लेषक दृष्टि भी रखती हैं, अस्तु स्पष्ट कि आपके बच्चे के अन्दर उन कार्यक्रमों का प्रभाव सीधा न पड़कर आपके द्वारा महसूस की गई भावनाओं का उद्दीपन होगा और वह अच्छी सूझ-बूझ के साथ विभिन्न प्रकार की परिस्थितियों और चरित्रों की पहचान कर सकेगा| आपकी राय और अनुभव जानकार प्रसन्नता हुई| अच्छी लेखन शैली पर बधाई!

rajkamal के द्वारा
November 11, 2010

अब तो दूसरे ब्लोगरो को आपसे खतरा महसूस हो रहा होगा … आपका ब्लॉग फीचर्ड हुआ ..बहुत अच्छी बात है ….मुबारकबाद ! लेकिन अभी भी सुधार की गुंजाईश है …अपनी पोस्ट को हम सभी को पोस्ट करने से पहले ३-४ बार पढ़ना चाहिए ….अगर हो सके तो पाठक की नज़र से भी पढ़ने की कोशिश करनी चाहिए …. आपने सिर्फ एक महीने के ही प्रभाव की बात की है और मानी है …लेकिन पूरे समय के प्रभाव का भी अपना महत्व है … लेकिन उससे भी बढ़ी एक बेसिक बात है …..जोकि आप तो क्या किसी से भी यहाँ पे नहीं की जा सकती ……लेकिन अपने खुद ही कहा है की आप कोई महात्मा नहीं चाहती ….लेकिन मैं अपने घर में एक धार्मिक स्वभाव का ही बच्चा चाहूँगा … इसी उम्मीद के साथ की जैसे संस्कार अपने बच्चे को देना चाहती है , वोह उसमें पूरी तरह रच बस जाये …

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
November 11, 2010

जैसा की आपने कहा की आपको कहा गया की ………… सत्संग में मन लगाया करो बच्चे में अच्छे संस्कार आयेंगे………………… सासुमा माँ ने कहा की रामायण पढ़ा करो बच्चे में अछे गुण आयेंगे…………. तो ध्यान रखें ये सभी बातें प्रतीक है…….. वास्तव में सारा खेल उर्जा है है…………… इन सब चीज़ों का पालन करने से आपमें एक सकारात्मक उर्जा का संचार होगा……….. और ये उर्जा आपसे आपके बच्चों तक ही नहीं…………. अपितु आपके आस पास के लोगों में भी जाती है…… एक प्रयोग करके देखें सुबह उठते ही नहा धो कर किसी ऐसे व्यक्ति के नजदीक बैठ जाये जो सोया हो…… तो आपकी उर्जा से उसकी नींद खुद समाप्त हो जाएगी…….. और यदि आप किसी ऐसे व्यक्ति के पास बैठ जाये जो सो रहा है और आप खुद तारो तजा नहीं है तो आपको भी नींद आने लगेगी …………..क्योकि तब उसकी उर्जा आप पर हावी हो जाएगी………….. और जहाँ तक IIT वालों के लिखने का प्रश्न है तो………… वो हर तरह से हमारी तरह ही हैं………. बस वो कुछ समय तक अपनी संवेदनाओं को दबाये रखते हैं…………….. इस लेख के लिए हार्दिक बधाई…………

bhaijikahin by ARVIND PAREEK के द्वारा
November 11, 2010

सुश्री प्रिया सिंह जी, जो होगा सब अच्‍छा ही होगा । जब आपनें इतना कुछ किया है तो सोच भी सकारात्‍मक रखिए । रही बात आईआईटी और आईआईएम वालों की तो आपके लेख को पढ़ ऐसा लगा कि वहां इंजीनियर या प्रबंधन की बजाय बस प्‍यार की पढ़ाई होती है । शायद इसीलिए वे लोग पढ़तें ही मोटी मोटी तनख्‍वाह पा जाते हैं । अरविन्‍द पारीक

manoj के द्वारा
November 11, 2010

 प्रिया जी लगता है आपने टाइम पास के लिए आपने बहुत कुछ किया लेकिन कोई भी उपाय आपको ज्यादा रास नही आया.

abodhbaalak के द्वारा
November 11, 2010

प्रिया जी, सुन्दर रचना, वास्तव में आपकी एक पंक्ति पर मै भी आश्चर्यचकित रह गया की, अधिकतर बेस्ट सेलर पुस्तकों के लेखक आईआईएम या IIT के छात्र है, आपने अपनी इस कहानी से हमें एक सीख भी दे दी है की पहले से किसी के बारे में धारणा नहीं बनाना चाहिए, वैसे हमारे भांजे/भांजी (Nephew / Niece ) अब कैसी हैं? http://abodhbaalak.jagranjunction.com


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