priyanka

no defeat is final until you stop trying.......

36 Posts

521 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 3063 postid : 84

मन से विचारो की दूरी ......

Posted On: 1 Feb, 2011 Others में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

……………..पिछले कुछ महीनो मै इस मंच से दूर रही तो यूँ लगा जैसे मन से विचार ही दूर हो गए ……और मन में न जाने क्या क्या कचरा जमा हो गया ………क्योंकि जब विचारो को कहीं लिख नहीं पायी तो, वो जमा होते होते कचरा ही बन गए, वैसे ही जैसे हम अपने घर में सामाँन इकठ्ठा करते चले जाए और पुराने सामानों को न निकाले तो घर में जगह ही नहीं बचेगी और घर कचरा-घर बन जाएगा वैसे ही कुछ मेरे साथ हुआ ……मन में आये विचारों को कहीं लिख नहीं पायी वो मन में ही रह गए और नए विचारों के आ जाने से मन में ढेर सारा कचरा जमा हो गया और हद तो तब हो गयी जब इस कचरे की वजह से मन से विचार ही दूर होने लगे यानी की मन ने सोचना ही बंद कर दिया ………और मेरे लिए तो ये बड़ी भयावह स्तिथि हो गयी थी क्योंकि जब इंसान का मन सोचना बंद कर दे मन में विचार ही न हो सिर्फ कचरा हो तो वो धीरे धीरे जानवर बनने लगता है …………….और किसी भी इंसान के लिए तो ये बड़ी सोचनीय बात हो जाएगी की वो इंसान न रहे और जानवर बनने की और अग्रसर होने लगे ……………..इसलिए मैंने पुनः कलम उठा ही ली यानी की की-बोर्ड उठा ही लिया ……….वैसे इस मंच से मै एक हफ्ते पहले ही जुड़ गयी थी पर पर यहाँ इतना कुछ बदल गया था तो एक हफ्ते तो इस बदलाव को ही पढ़ती रही पीछे जितना कुछ छुट गया था उसे समेटा और उसे समेटने के बाद यानी की दुसरो के विचारों को पढने के बाद मेरे मन में भी कुछ विचारों का प्रवाह शुरू हुआ ………. पर अभी भी ऐसा लग रहा है जैसे की विचारों की वो गति नहीं बन पायी है जो पहले थी ………….वो शायद इसलिए भी है की पिछले दो-ढाई महीनो में बहुत कुछ घटा ………..हम पुराने घर से नए घर में आये और नए साल में भी प्रवेश किया और मेरा नन्हा सा बच्चा एक साल का हो गया उसने चलना सीख लिया ……….. और इन सबके बीच में मेरा लिखना छुट गया …… खैर…………कोई बात नहीं ………लेकिन हाँ मुझे हमेशा ये जरुर लगता रहा की पता नहीं यहाँ क्या क्या लिखा जा रहा होगा और मै उन सब को पढ़ नहीं पा रही हूँ जैसे किसी फिल्मो के दीवाने को परीक्षा के समय ये लगता है की उफ़ कितनी सारी फिल्मे आ गयी और मै नहीं देख पाया ठीक वैसे ही मुझे लग रहा था …….की पता नहीं पियूष जी ने कौन सी प्रेरणास्पद रचना लिख डाली होगी और राजकमल जी ने और किसी अनोखी रचना का निर्माण कर डाला होगा ………. पिछले दो-ढाई महीने मै अपने इस लिखने के नशे से दूर रही और मुझे ऐसा लगा जैसे कुछ और समय दूर रही तो कहीं पागल न हो जाऊ ………. लिखना मेरे लिए एक नशा ही है एक ऐसा नशा जो मुझे शान्ति और सुकून पहुंचाता है …………. और जब मुझे सुकून मिलता है तो मै खुश होती हूँ और जब मै खुश होती हूँ तो अपने आस-पास के लोगो को भी खुश रखती हूँ और मुझे लगता है की एक गृहणी का खुश रहना बहुत जरुरी है ………………. अगर वो खुश है तभी उसका घर भी खुश रहेगा …………… हर इंसान अपने जीवन में और चाहता भी क्या है एक सुकून भरी शांत खुशमय ज़िन्दगी ……………… खैर छोड़िये हम सबके चाहने से क्या होता है क्या हम सब सच में वो सब मिल पता है जो हम चाहते है हम इस शांति और सुकून की तलाश में जीवन भर भटकते ही रह जाते है हम उसे ढूंढ़ नहीं पाते क्योंकि हमारे ढूंढने में ही गलती होती है…………..और इस सच को जान लेने के बाद भी हम ये स्वीकार कहाँ कर पाते है की गलती हमारे ढूंढने में थी हम अपने दुखो के लिए हमेशा दुसरो को ही ज़िम्मेदार ठहराते है ……….और जब कोई और नहीं मिलता तो भगवान् तो है ही उसे भी कोसते है ……….ऐसा ही कुछ फिलहाल मेरे साथ हो रहा है आजकल मेरी भी भगवान् से लड़ाई चल रही है देखती हूँ कब मै अपनी गलती स्वीकार कर पाती हूँ और भगवान् को कोसना बंद कर पाती हूँ ………. फिलहाल के लिए इतना ही ……………. आप सबको शुभ-संध्या …………

| NEXT

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

16 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
February 5, 2011

भगवान् से लड़ाई का अक्सर कोई नतीजा नहीं निकलता है……… उसपर पूर्ण श्रद्धा से समपर्ण कर देने से ही….. सारे मसले हल हो पाते है………… तो झगडा छोड़ कर एक बार उसपर विश्वास कर दुबारा शुरुवात करें …..

chaatak के द्वारा
February 4, 2011

प्रियंका जी, आप ही की तरह लगभग सभी नियमित ब्लॉगर मंच से कभी न कभी दूर होते ही हैं लेकिन उनका वापस आना भी तय होता है| वैसे भगवान से आपकी लड़ाई चल रही है तो समझिये सबकुछ ठीक ही होगा| मेरी कविता ‘उस शिव से मेरी लड़ाई है’ और ‘मैं तुझको ईश्वर क्यूँ मानू’ पढियेगा, अच्छा लगेगा|

nishamittal के द्वारा
February 3, 2011

मंच पर स्वागत आपका प्रिया जी.सच में सब लोगों के लेख पढने में अपने विचार व्यक्त करने के लिए जागरण के आभारी हैं हम.कृपया लेख पढ़ कर विचारों से अवगत कराएँ.कल बहुत दिन बाद नन्हे शिशु का प्यारा सा चित्र जो आपके ब्लॉग की पहचान है अच्छा लगा.

HIMANSHU BHATT के द्वारा
February 2, 2011

नमस्कार प्रिया जी…. पहली बार आपके ब्लॉग पर आया हूँ…. आप अच्छा लिखती हैं यह तो स्पष्ट ही है अभी आपके सारे लेख नहीं पढ़े हैं…. खैर वो तो पढ़ ही लूँगा… प्रिया जी कभी कभी आपनी आवश्यक जिम्मेदारियों के कारण हमें कुछ काम पेंडिंग रखने पड़ते हैं…. इसमें किसी का कसूर नहीं होता….. आपका मंच पर पुनः आगमन पर स्वागत ….

Dharmesh Tiwari के द्वारा
February 2, 2011

प्रिया सिंह जी नमस्ते,मंच पर पुनः आगमन पर आपका हार्दिक स्वागत है,धन्यवाद!

abodhbaalak के द्वारा
February 2, 2011

प्रिय जी एक लम्बे अंतराल के बाद आज आपकी कोई पोस्ट देखि, अच्छा लगा आपने पहले कहा ही था की लेखन भी एक आदत है, और बिना लिखे …. आशा है की आप ने पियूष और राज जी की सारी रचनाएँ पढ़ डाली होंगी और साथ ही साथ मंच की बड़ी हस्तियों की भी …. आशा है की अब आप जल्दी छुट्टी नहीं लेंगी :) http://abodhbaalak.jagranjunction.com

Manish Singh "गमेदिल" के द्वारा
February 2, 2011

बिलकुल सही कहा आपने …………. भावनाओं के मंदिर में रहने वाले हम पुजारी यदि पूजा ही न करें या भजन मंडली में हरदम मग्न रहने वाले प्रेमी…………… सुर से दूर रहे तो उनका जीवन उस पुष्प के सामान हो जाता है जो खूबसूरत तो है पर मन भवन कर देने वाली सुगंध से परे……….. मैं आपकी व्यथा समझ सकता हूँ…………………… परन्तु मेरा दिल कहता है – रचनाकार जब भी और जिस भी गली से गुजरेगा वहां अपनी महक जरूर छोड़ जायेगा…………… शुभ स्वागतम

Alka Gupta के द्वारा
February 2, 2011

प्रियाजी , इस प्यारे से नए मेहमान के साथ पुनः आगमन के लिए बधाई ! अपने नन्हे मुन्ने के साथ व्यस्त जीवन में भी अपने विचारों को मंच पर प्रस्तुत किया स्वागत है आपका ! इसी तरह समय मिलने पर आगे भी आपकी लेखनी चलती रहेगी उसे तो विराम मिलेगा ही नहीं ….फिर कुछ नया लिखकर पोस्ट कर दें आपकी दुनिया खुशी से भर जायेगी….

    priyasingh के द्वारा
    February 2, 2011

    धन्यवाद आपका उत्साहवर्धन के लिए……

Alka Singh के द्वारा
February 2, 2011

प्रियाजी हिंदी साहित्य के एक महान लेखक १८ साल लेखन से दूर रहे अपनी मजबूरियों के चलते ,सोचिये उन्होंने खुद को कैसे फिर से समेटा होगा .जीवन में लेखन के साथ -साथ और भी बहुत कुछ जरूरी है l फ़िलहाल अपने बच्चे पर पूरा ध्यान दीजिये .

वाहिद काशीवासी के द्वारा
February 2, 2011

“इश्क़ में तौफ़ीक़ है तमन्ना हर, गर इरादा हुआ तो गर्ज़ है ये;” अपने प्रिय (नशा) से दूरी यूँ ही व्यथित करती है, अतः लेखनी का प्रयोग करते रहिये और जब वक़्त मिले तो पोस्ट कर दें| आपका पुनः स्वागत है इस वैचारिक संसार में, इस नवागंतुक द्वारा,

    priyasingh के द्वारा
    February 2, 2011

    आपका धन्यवाद ………….

rajkamal के द्वारा
February 1, 2011

आदरणीय प्रिय सिंह जी ….सादर अभिवादन ! सबसे पहले तो आपको इस बात की बधाई की अब आप के विचार एक सीधी लीक पर प्रवाहमय रूप से बहने लग गए है ….. लेकिन मुझको हैरानी इस बात की है की आप का इतना सुंदर बच्चा (फोटो वाला ) के सामने होते हुए भी एक माँ को कोई परेशानी हो सकती है ….. खैर आपकी इस साफगोई पर बहुत ही खुशी हुई की आपने इमानदारी से यह माना है की आप पूरे एक हफ्ते तक परदे के पीछे रही , वर्ना कोई इतनी सच्चाई बताने की हिम्मत नहीं करता है …. धन्यवाद

    priyasingh के द्वारा
    February 1, 2011

    सबसे पहले तो इतना सम्मान देने की आवश्यकता नही है क्योंकि मुझे आदत नहीं है ……….. जी, तक तो फिर भी ठीक है पर आदरणीय तो कुछ ज्यादा ही हो गया ………बच्चे की फोटो पर मत जाइए एक साल में ही उसने जो घुमाया है मुझे की पूछिए मत ………… यहाँ पर आप सब लोगो ने मिल कर इतना कुछ लिख डाला था की उसको पढने में एक हफ्ता भी कम ही कहा मैंने ……….मेरे विचार आपको सीधे लगे इसके लिए धन्यवाद……

sdvajpayee के द्वारा
February 1, 2011

 \’\'क्या हम सब सच में वो सब मिल पता है जो हम चाहते है \’\' -   इस लिए तो नहीं कि हम जो चाहते हैं  उसमें निरंतरता और एक सूत्रता नहीं रहती। एक साथ कई बातें चाहते हैं। या र्धर्य नहीं रहता । किसी चाहत को स्थिरता के साथ पकडें और धैर्य का संबल रखने से शायद जो चाहते हैं वह पूरा होता हो।   इस लिए तो नहीं कि चाहते तो हम हैं पर पूरा करने वाला दूसरा है। यह द्वंद बाधक होता हो।  या इस लिए तो नहीं कि-  जिस की जितनी चादर थी , उसको उतनी सौगात मिली।  जो चादर देने वाला है वही सौगात देने वाला भी। \’चाहतें\’ भी उसी के खेल का हिस्‍सा हैं।  भगवान से लडाई केवल भक्‍त कर सकते हैं। वही उसे दिल से कोसते रह सकते हैं। कोसना ही तो भगवान से तार जोडना है। मेरे विचार से आपको गलती मानने की जरूरत ही नहीं है। वह गलती तो भगवान की है। आपकी लडाई बढती रहे और इस मोड पर पहुंचे जहां दो, द्वंद ,न रहे - इस चाहत के साथ।

    priyasingh के द्वारा
    February 1, 2011

    अपने कई सवालों का जवाब मिल गया मुझे ……… आपकी यह टिपण्णी मेरे जीवन में प्रेरणा का काम करेगी ………..आपकी सदा आभारी रहूंगी ………धन्यवाद…………


topic of the week



अन्य ब्लॉग

  • No Posts Found

latest from jagran