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"प्यार ही प्यार बेशुमार..." -valentine contest

Posted On: 13 Feb, 2011 Others में

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……….फ़रवरी के आते ही ठण्ड कुछ कम हो गयी और मौसम कुछ खुशनुमा हो गया है ……और शायद ये मौसम का ही असर की हर तरफ प्यार ही प्यार छाया हुआ है … जहां भी जाओ प्रेम, प्यार, इश्क, मोहब्बत, की ही चर्चा है….. अभी कल की ही बात है, हम खरीदारी करने निकले….. एक किताबो की दूकान में खड़े होकर किताबो को निहारने लगी तो देखा फ़रवरी माह की हर पत्रिका प्रेम विशेषांक थी ……..आगे बढ़ी एक उपहारों की दूकान पर गयी तो वहाँ बधाई कार्ड हो या उपहार सब के सब प्रेम से ही सम्बंधित थे ……एक पूरी श्रुंखला ही बनी हुई थी प्रेम से जुड़े उपहारों की …………. और थोड़ी आगे बढ़ी तो सोने हीरो की दुकाने थी वैसे तो इस मंहगाई में जहां प्याज टमाटर भी सोच कर खरीदना पड़ता है इन जवाहरातो की दूकान में तो मै घुसती ही नहीं लेकिन हाँ अपने स्त्री मन को कितना समझाओ आँखे तो मुड़ ही जाती है ……और वैसे भी देखने के तो पैसे लगते नहीं है तो यूँ ही चलते चलते उन्हें भी एक हलकी नज़र मार ही ली ……और वहाँ भी क्या देखा वैलेंटाइन सेट, कपल सेट, और न जाने क्या क्या यानी की यहाँ भी प्रेम से ही जुड़े सोने हीरे के जेवर …………… और जब घर आकर फुरसत पाकर लेपटोप पर जागरण जंक्शन की साईट खोली तो यहाँ भी प्यार ही प्यार बेशुमार ………….. तब समझ आया की ये फ़रवरी के गुलाबी मौसम का नहीं १४ फ़रवरी वैलेंटाइन डे का असर है जो हर कोई प्यार की खुमारी में डूब गया है ………..और डूबना भी चाहिए प्यार है ही ऐसी चीज़ की इसके असर से कोई बच ही नहीं पाता…. बड़े बड़े तुर्रम खान भी प्यार के जादू से अपने को बचा नहीं पाए तो हम किस खेत की मुली है ………प्यार से जुड़े मैं सबके ब्लॉग पढ़ती रहती हूँ ब्लॉग ही नहीं और भी कई किताबे पर मुझे ये किताबी भाषा और प्यार के बारे में कही जाने वाली बड़ी बड़ी बाते कुछ ख़ास समझ नहीं आती ………अक्सर सब जगह यही लिखा जाता है की प्यार अनमोल अहसास है, प्यार में कोई शर्त नहीं रखनी चाहिए प्यार में कोई अपेक्षा उम्मीद नहीं रखनी चाहिए प्यार में स्वार्थ की भी कोई जगह नहीं होती आदि, इत्यादि ………….. पर मुझे ये किताबी प्यार कभी भी हजम नहीं हुआ ………. मुझे नहीं लगता की की ये किताब बाते सच में सच होती है…. प्यार में शर्ते भी होती है उम्मीदे भी अपेक्षाए भी …. प्रेम में क्रोध भी होता है स्वार्थ भी जलन भी …….. और इन सब बातो से प्रेम कम भी नहीं होता और न ही प्रेम का महत्व कम आँका जा सकता है …… जब हम प्यार में शर्ते रखते है तो हम वो रिश्ता और मज़बूत ही करते है …. जैसे माँ अपने बच्चे को अपने प्रेम का वास्ता देकर ही कुछ गलत करने से रोकती है, वो अपने छोटे से बच्चे को कुछ खिलाती है तो ये ही कहकर की अगर तुम ये नहीं खाओगे तो मम्मा तुमसे बात नही करेगी अगर देर रात तक घूमोगे तो घुमो जब तक घर नही आओगे मम्मा खाना नहीं खाएगी ……. और ये सुनते ही बच्चा घर की ओर दौड़ पड़ता है ………… इसी तरह प्रेमी भी एक दुसरे के सामने कई शर्ते रखते है जैसे देर रात तक न घूमने की शर्त ज्यादा दारु न पिने की शर्त , अपने सिवा किसी और को न देखने की शर्त , और भी ऐसी ही कई छोटी छोटी रिश्ते से जुडी शर्ते ….. हम शर्ते उनके सामने ही तो रखते है जब हम जानते है की वो पूरी होंगी ………. हम अपेक्षाए उम्मीदे उन्ही से करते है जिनसे प्रेम करते है किसी भी राह चलते से तो हम उम्मीद नहीं कर लेते की वो हमें ठोकर नहीं मारेगा जिनसे प्रेम करते है उनसे ये उमीद लगा ही लेते है की वो हमें संभालेगा सहेजेगा………… हम इंसान है हमारे मन में इंसानी भावनाए तो होंगी ही ……..और हर इंसान के अन्दर क्रोध, अहम्, स्वार्थ, रूपी भावनाए होती ही है …….. और जिनमे नहीं होती वो संत महात्मा हो जाते है वो इंसान नहीं रहते इंसान से कुछ बढ़कर हो जाते है ………. अगर कोई प्रेमी अपने प्रेमी का इंतज़ार कर रहा या रही हो और वो देर से आये या आये ही नही तो क्रोध तो आयेगा ही कौन है जो कहेगा की नहीं मेरे प्रेम में कोई शर्त या अपेक्षा नहीं है तुम नही आये या देर से आये कोई बात नहीं ……….. जो इंतज़ार कर रहा होगा वो गुस्सा तो होगा ही फिर वो चाहे आज का प्रेमी हो या कल का प्रेमी ………… इसी तरह स्वार्थ भी प्रेम में होता ही है ज्यादा प्रेम पाने का स्वार्थ, अपने प्रेम में बांधे रखने का स्वार्थ ……….. हर कोई प्रेम में थोड़ा सा स्वार्थी तो हो ही जाता है ……. पूछिए उस माँ से जो अपने बेटे को तिलक लगाकर साफा पहनाकर घोड़ी पर चढ़ाती है उसकी आँखे नम हो जाती है, आँखों के कोरो से निकलते हुए आंसुओ को चुपके से पोंछती है वो जानती है की जिस बेटे को अपने छाती से लगाकर पाला अब वो बेटा उसके प्रेम का भागीदार लेने जा रहा है ……….. हर माँ रोती है ……… थोडा सा स्वार्थ थोड़ी सी जलन उस माँ की ममता में आ ही जाती है पर फिर भी कहीं से उसकी प्रेम की महत्ता में कमी नहीं आती , ये सब प्रेम के राग है , रस है ……. जब ये सारे राग मिलकर एक साथ प्रेम रुपी बांसुरी बजाते है तो उसकी धुन में कुछ और ही सुरूर होता है ……….. पर हाँ कहते है न की अति हर चीज़ की बुरी होती है …….. बस किसी भी भावना की अति नही होनी चाहिए ज्यादा क्रोध किसी रिश्ते को जला सकता है …. ज्यादा स्वार्थ प्रेम को ख़त्म कर सकता है ………….. इसी तरह ज्यादा प्रेम भी किसी इंसान को बिगाड़ सकता है ……….. जब हम प्रेम रूपी बांसुरी में कोई बी राग को ज्यादा छेड़ देते है तो बेसुरी धुन तो निकलेगी ही ………लेकिन हर कोई हरी प्रसाद चौरसिया तो बन नही सकता जो की सधी हुई बांसुरी बजा सके ……. बेसुरी धुन निकलती है और ज़िन्दगी में परेशानिया कठिनाइया आ जाती है ………. पर यही तो हमारा जीवन है हम प्रेम में लड़ते है झगड़ते है रुठते है ………. और फिर प्रेम में ही तो मनाते है ………. जिसके जीवन में सिर्फ प्रेम ही प्रेम है उसका जीवन तो गुलाबजामुन की चाशनी बन जाएगा फिर वो बिचारा कितना चाशनी पिएगा …………इतना मीठा जीवन क्या उसे भाएगा ……जब तक जीवन में प्रेम के हर रस राग नहीं होंगे वो जीवन सूना ही रहेगा …………प्रेम एक ऐसा शब्द है इसके बारे में कितना भी लिखा जाये लगता है कुछ छूट गया है लेकिन लेखक की भी अपनी सीमाए होती है शब्दों की, समय की, लेख की लम्बाई-चौड़ाई की, लेकिन फिर भी कितना भी कह लू बहुत कुछ अनकहा रह गया है …………..शुभ प्रभात ……..

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30 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

nikhil के द्वारा
February 26, 2011

प्रिय जी अपने लेखन से आपने मंच पर अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है … नमश्कार …. कंटेस्ट में शार्टलिस्ट होने के लिए बहुत बहुत बधाईया .. ऐसे ही लिखते रहे.. शुभकामनाये

Shailesh Kumar Pandey के द्वारा
February 20, 2011

प्रिया जी ! वेलेंटाइन कांटेस्ट में शार्टलिस्टेड होने की बधाइयां, व आगे के लिए शुभकामनाएं 

आर.एन. शाही के द्वारा
February 20, 2011

प्रेम के यथार्थवादी चित्रण से सजा आपका यह आलेख मैंने आज देखा और लगा कि विषय को यदि छुआ जाय तो उसका विस्तार इसी प्रकार सर्वांगीण ही होना चाहिये, अधकचरा नहीं । आप अपनी व्याख्या से संतुष्ट नहीं हैं, यह रचनाकार की रचनात्मकता कही जाएगी, मुझे व्यक्तिगत रूप से आपका प्रयास एक सम्पूर्ण प्रयास ही लगा है । साधुवाद ।

    आर.एन. शाही के द्वारा
    February 20, 2011

    प्रिया जी, प्रतियोगिता में शार्टलिस्टेड होने की बधाइयां, व चयनित होने की शुभकामनाएं ।

chaatak के द्वारा
February 19, 2011

प्रिया जी, वेलेंटाइन कांटेस्ट में अंतिम पांच में चुने जाने पर हार्दिक बधाई!

    priyasingh के द्वारा
    February 19, 2011

    आपको भी हार्दिक बधाई ……………..

rajkamal के द्वारा
February 19, 2011

प्रिया जी …नमस्कार ! उस आपाधापी में भी आप का यह लेख पूरा पढ़ा था …. इसलिए की क्योंकि इसमें कुछ ना कुछ तो बात है …. और इसका दूसरा भाग तो मेरी नजर में इससे किसी भी मायने में कम नही है …. इसलिए मैं आपको इन दोनों लेखों और विजेतायो की सूची में शामिल होने पर हार्दिक बधाई देता हूँ

    priyasingh के द्वारा
    February 19, 2011

    इस सूची में नाम आना मेरे लिए बड़ी आश्चर्य की बात रही……… स्कूल की दिनों की याद आ गयी जब परीक्षा का परिणाम आने पर कक्षा में किसकी कौन सी रेंक आई ये देखा जाता था ………… अपना नाम इस सूची में देख कर उत्साह तो बढ़ा ही ख़ुशी भी हुई …….आपकी बधाई का शुक्रिया……………

allrounder के द्वारा
February 19, 2011

प्रिय जी, एक सशक्त लेख और प्रतियोगिता मैं अंतिम ५ मैं चुने जाने पर हार्दिक बधाई !

    priyasingh के द्वारा
    February 19, 2011

    आपका शुक्रिया………..

charchit chittransh के द्वारा
February 18, 2011

प्रिया जी ,उत्तम लेख मेरी कल की टिपण्णी यहाँ पेस्ट होनी चाहिए थी , आज मूल लेख पढ़ा किन्तु टिप्पणी वही की वही देना चाहूँगा , बधाइयाँ ! आप प्रेम प्रतीक प्रधान के चुनाव के अधिकृत प्रत्याशी घोषित हुई हैं {जैसे आस्कर अवार्ड के लिए अधिकृत भारतीय फिल्म का चुना जाना }. आपको इस प्रतियोगिता का सिरमौर चुने जाने हेतु ह्रदय की गहराइयों से शुभकामनाएं !

Aakash Tiwaari के द्वारा
February 18, 2011

प्रिया जी, प्रेम एक ऐसा शब्द है इसके बारे में कितना भी लिखा जाये लगता है कुछ छूट गया है लेकिन लेखक की भी अपनी सीमाए होती है शब्दों की, समय की, लेख की लम्बाई-चौड़ाई की, लेकिन फिर भी कितना भी कह लू बहुत कुछ अनकहा रह गया है. बहुत ही सही और सलीके से लिखा है आपने पूरा लेख…. शुभकामनाओं सहित http://aakashtiwary.jagranjunction.com आकाश तिवारी

rajeevdubey के द्वारा
February 17, 2011

प्रिया जी, देर से पहुंचा आपके इस लेख पर…जैसा कि आपने लिखा जीवन में हर रंग है …तो मैं भी यहाँ से वहां इस विचित्र संसार में एक रंग से दूसरे रंग में भीगता रहता हूँ….प्रेम में सब कुछ होगा तभी वह सच्चा होगा…नहीं तो किताबी ही होगा…अच्छा लगा आपका लेख.

NIKHIL PANDEY के द्वारा
February 14, 2011

प्रिय जी बढ़िया लिखा है आपने.. किताबी प्यार किसी ओ भी हजम नहीं होता क्योकि वह किताबी हो ही नहीं सकता ..जो इसके किताबी संस्करण पर ही ध्यान देते है वो ही दुःख और परेशानिया झेलते है.. अर्थपूर्ण लेख है.. बधाई

Alka Gupta के द्वारा
February 14, 2011

प्रिया जी, प्रेम का स्वरूप ऐसा है कि कितना भी कहा जाए या लिखा जाए सदैव अधूरा ही रहता है मंगलकामनाएं !

R K KHURANA के द्वारा
February 14, 2011

प्रिय प्रिय जी, सुंदर रचना ! प्रेम के रंगों से सराबोर कर दिया आर क्र खुराना

rajkamal के द्वारा
February 13, 2011

प्रिया जी …. नमस्कार ! यह देख कर खुशी हुई की आपने भी इस कांटेस्ट में भाग लिया , शीर्षक को इनवर्टड कोमा में डाल दे …. आपने अपने विचार रखे + एहसास और अनुभव तथा नजरिया रखा …. मैं सहमती या असहमति की बात नही करूँगा …. धन्यवाद व शुभकामनाये

    priyasingh के द्वारा
    February 13, 2011

    कांटेस्ट में हर कोई अपनी उपस्तिथि दर्ज़ करवा रहा था तो मैंने सोचा की मै क्यों पीछे रहू ….. आपने अपनी सहमती या असहमति नही दिखाई पर मै जानना जरुर चाहूंगी………और हाँ आपके कहे अनुसार शीर्षक को ठीक कर लिया है …..

    rajkamal के द्वारा
    February 13, 2011

    priyaa ji …nmskaar ! baad wala koma contest ke baad last me aana chahiye …. dhanyvaad

HIMANSHU BHATT के द्वारा
February 13, 2011

जी हाँ प्रिय जी… मई आपकी कुछ बातों से असहमति जाताना चाहूँगा… आपने प्रेम में स्वार्थ का समर्थन किया है… और उदाहरण दिया है की माँ अपने बच्चे को अपने प्रेम का वास्ता देकर ही कुछ गलत करने से रोकती है, वो अपने छोटे से बच्चे को कुछ खिलाती है तो ये ही कहकर की अगर तुम ये नहीं खाओगे तो मम्मा तुमसे बात नही करेगी…. लेकिन प्रिय जी अपने ही वक्तव्य को ध्यान से देखिये यहाँ स्वार्थ क्या है… स्वार्थ क्या होता है… मई इसकी अध्यात्मिक परिभाषा में नहीं जाना चाहता… लेकिन प्रेम स्वार्थ और शर्तों पर खडा करोगे… तो वह मात्र एक कांट्रेक्ट होगा… माँ अपने बेटे को दूल्हा बनते हुए इसलिए नहीं रोती की प्रेम बाँट जाएगा… वू आंसू तो ख़ुशी के होते हैं जिस लाडले को जन्म दिया… आज वह इतना बड़ा हो गया है की अपनी गृहस्थी बसाने चला है… प्रिया जी प्रेम का आनंद इतना परम है की जितना भी आता जाई मजा ही आता है… ये जीवन अगर किसी को मिल जाए तो उसे इसके सिवा कुछ नहीं भाता… अगर आपको ऐसे प्रेम मई जीवन जीने वाला कोई मिल सके तो उससे जरुर पूछियेगा… की यह कैसी चाशनी है… प्रेम से भरे व्यक्ति के जीवन में कोई कठिनाई नहीं होती… प्रेम सकारात्मकता से भर देता है… फिर कठिनाई तो हो ही नहीं सकती… अगर जीवन में कठिनाई है तो… निश्चित प्रेम नहीं है… याद रखें… UNCONDITIONAL LOVE FOR EVERY ONE…. IS THE ONLY AGENDA…

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 13, 2011

    हिमांशु जी…. बिलकुल सही कहा आपने….. वास्तव मे प्रेम शर्तों से परे का विषय है………शर्ते तो व्यापार मे होती है… प्रेम मे त्याग होता हैं… विश्वाश होता है ओर प्रेम भाव होता है……. फिर बिना कहे ही सामने वाला आपकी हर इच्छा समझ जाता है ओर वही करने लगता है जैसा आप चाहते हैं…….

    priyasingh के द्वारा
    February 13, 2011

    मै आप दोनों की बात समझ रही हूँ …….. पर मैंने अपने लेख के शुरू में ही लिखा की मुझे किताबी प्यार समझ में नही आता ….और आप लोग जिस प्रेम की बात कर रहे है वो आपके नजरिये से सही है और मै जिस प्रेम की बात कर रही हूँ वो मेरे नजरिये से सही है ……. हर सिक्के के दो पहलु होते है अब ये आपके ऊपर है की आप उसे किस तरफ से देखना चाहते है ……… मेरे जीवन में प्रेम के हर पहलु है ….. मेरे प्रेम में क्रोध है स्वार्थ है …… ढेर सारा प्रेम पाने का स्वार्थ फिर वो चाहे किसी से भी हो पति से भाई से बहन से दोस्तों से …… लेकिन मै उस प्रेम को संभाल कर सहेज कर रखना जानती भी हूँ …….. आपके प्रेम में कोई शर्त नही है अपेक्षाए नही है ये आपके जीवन जीने का नजरिया है और आप उसे इसी तरह के प्रेम से जीना चाहते है ….ये बहुत अछि बात है……… वैसे भी जीवन इतना छोटा है उसे हर किसी को पूरी जिंदादिली से जी लेना चाहिए फिर उनके प्रेम का स्वरुप चाहे जैसा हो ………. आप दोनों की आलोचनायो का भविष्य में भी स्वागत है आपकी आलोचनायो की पैनी धार से मेरे लेख में चार चाँद लग गए……….

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 14, 2011

    नमस्कार प्रिया जी…. माफ़ कीजियेगा मैअभी भी आपकी बातों से सहमत नहीं हूँ… आपका प्रेम और मेरा प्रेम ….. यह अवधारणा आप बदल दीजिये और प्रेम को प्रेम ही रहने दीजिये…. आप सिक्के के पहलु की बात करती हैं…. अब आपने सिक्का ही गलत पकड़ा है तो इसमें किसी का क्या दोष… प्रेम के सिक्के के एक ओर श्रध्दा है तो दूसरी ओर समर्पण … प्रेम में ना तो क्रोध है न ही स्वार्थ… क्रोध और स्वार्थ तो व्यक्ति के दुर्गुण हैं इन्हें प्रेम से जोड़ना गलत है… रही बात आलोचना की तो जिस वक्तव्य से मै असहमत हूँ उससे असहमति जताना मेरा कर्तव्य है….

वाहिद काशीवासी के द्वारा
February 13, 2011

प्रिया जी, प्यार ऐसी भावना ही है कि कितना भी कह-सुन लिया जाये कमी रह ही जाती है|यही तो प्रेम का उदात्त स्वरुप है| http://kashiwasi.jagranjunction.com

div81 के द्वारा
February 13, 2011

प्रिया जी बिलकुल सही कहा प्यार में सभी भाव का होना जरुरी है | वैसे भी ज्यादा मीठे से शुगर होने का खतरा तो होता ही है :)

    priyasingh के द्वारा
    February 13, 2011

    मेरे विचारों से समानता रखने के लिए धन्यवाद …..

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
February 13, 2011

…प्रेम एक ऐसा शब्द है इसके बारे में कितना भी लिखा जाये लगता है कुछ छूट गया है लेकिन लेखक की भी अपनी सीमाए होती है शब्दों की, समय की, लेख की लम्बाई-चौड़ाई की, लेकिन फिर भी कितना भी कह लें बहुत कुछ अनकहा रह जाएगा………. बिलकुल सही कहा आपने….. जल्दबाज़ी मे हुई आपकी एक गलती की ओर ध्यान दिलाना चाहता हूँ… आपने अपने ब्लॉग के शीर्षक के अंत मे प्यार ही प्यार बेशुमार……(velentine contest) लिखा है…… इसे सुधार कर प्यार ही प्यार बेशुमार……-valentine contest कर लें स्पेलिंग की त्रुटि है ओर दूसरा ब्रेकेट की जगह डैश लगाएँ……

    priyasingh के द्वारा
    February 13, 2011

    आपके कहे अनुसार मैंने अपनी त्रुटी सुधार ली है ध्यान आकर्षित करने के लिए धन्यवाद … लेकिन लेख के विषय में आपने ज्यादा कुछ नही कहा उसमे भी कुछ त्रुटी हो तो जरुर बताइयेगा …… आलोचनायो से ही तो लेखनी में सुधार होता है ……..

vinitashukla के द्वारा
February 13, 2011

प्रेम के बहुआयामी रूप से रूबरू कराने के लिए आपका धन्यवाद.

    priyasingh के द्वारा
    February 13, 2011

    आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद …


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