priyanka

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प्यार ही प्यार बेशुमार -2

Posted On: 17 Feb, 2011 Others,मेट्रो लाइफ में

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दिल्ली के मौसम का कोई भरोसा नहीं अभी तीन दिन पहले तक यहाँ गर्मी छायी हुई थी और दो दिनों से बारिश हो रही है और परसों रात तो यहाँ बारिश के साथ साथ ओले भी पड़े ……….आधी रात को अचानक ताड़ ताड़ करते हुए ओलो के गिरने की आवाज़ के साथ अचानक नींद खुली …….और सुबह मौसम खुला हुआ था और धुप निकली हुई थी …………….लेकिन अभी शाम शाम होते होते बादल छाने लगे है ………… जैसे मौसम का भरोसा नहीं है वैसे ही इस मंच का हाल हो गया है ……. पता नहीं कब किस लेख को लिखते ही आप पर तोहमते लग जायेंगी और कब किसी लेख पर प्रतिक्रिया देते ही सामने वाला बुरा मान जाएगा…………. वैसे मै इस मंच पर पिछले साल सितम्बर में जुडी भला हो गूगल का मैंने हिंदी ब्लॉग टाइप करके सर्च किया तो जागरण मंच के दर्शन हुए और फटाफट मैंने अपने आप को रजिस्टर कर लिया और मेरे नाम से यहाँ एक ब्लॉग हो गया ….. ब्लॉग ये शब्द भी मैंने अखबार में ही पढ़ा था की पहले तो मुझे समझ में नहीं आया की ये क्या है ….फिर जब शब्दकोष में देखा तो पाया की ब्लॉग को हिंदी में चिटठा या वेबदैनिकी कहते है …………… इसलिए ही मै इस मंच से जुड़ गयी ………. मै अपने आपको कोई बहुत बड़ा साहित्यकार या लेखिका नहीं मानती और न ही अपनी रचनायो को उस स्तर का मानती हूँ …………और यदि ये मंच केवल साहित्यकारों या लेखको का मंच होता तो शायद मै यहाँ होती भी नहीं………. ब्लॉग का मतलब जानने के बाद ही मै इस ब्लॉग नामक विधा से जुडी …….. वेबदैनिकी यानी की वेब के जरिये आप अपनी दैनिक कार्यविधि से जुड़े विचार रख सकते है ये आपका व्यक्तिगत चिटठा है ………….जिस तरह आपकी व्यक्तिगत डाइरी होती है जिसमे आप अपने मन के विचार लिखते है बस अंतर इतना है की इस डाइरी को आप सबके साथ बांटते है ………यानी की अपने विचारों को सबके सामने रखते है ……….यकीन जानिये अगर मुझे ज़रा भी इल्म होता की यहाँ मेरे अपने विचारों को रखने से साहित्य या लेखन विधा को क्षति पहुँच सकती है तो मै ऐसा करने से पहले जरुर सोचती ………………जहां तक प्रेम के बारे में मेरे विचारों का प्रश्न है मै अभी तक नहीं समझती की मैंने अपने पूर्व ब्लॉग में कहीं भी कुछ गलत लिखा ……..अभी भी मै अपने उन्ही विचारों से सहमती रखती हूँ ……………..मेरे लिए जीवन वही है जो मै जी रही हूँ और अपने आस-पास लोगो को जीते हुए देख रही हूँ ठीक इसी तरह प्रेम भी वही है जो मै स्वयं करती हूँ और अपने आस पास पाती हूँ …….और मै वही लिखती हूँ जो मै सोचती हूँ …………….. और मेरी सोच में हम सब इंसान भावनायो के पुतले है …………. बिना भावनायो के हम इन्सान हो ही नहीं सकते ……….. और हमारे अन्दर सारी भावनाए होती है जिसमे की अच्छी और बुरी दोनों भावनायो का समावेश है ………….. जिसमे प्रेम, त्याग, ममता, करुना, कर्त्तव्य, वफादारी के साथ कुछ बुरी भावनाए भी जैसे क्रोध, स्वार्थ, इर्ष्या, आदि भी है ………….. हमारे इंसानी मन में हर भावनाए रहती है ………..हर इंसान की प्रवुत्ति भी अलग अलग होती है ………और मेरे ये लिखने का अभिप्राय यही है की जब हम प्रेम किसी से करते है तो प्रेम के साथ साथ दूसरी भावनाए भी अभिव्यक्त होती है ……….जैसे की मै अपना ही उदाहरण देती हूँ हम ३ भाई बहन है दादा यानी की मेरे बड़े भैया, बचपन में ही नहीं बड़े होने पर भी हममे बहुत लड़ाइया हुई है बचपन में तो हाथापाई भी हो जाती थी और अब बड़े एवं समझदार होने पर मौखिक बहस हो जाती है ……..लेकिन इन सारी लड़ाइयो के बावजूद हमारे बीच प्रेम है और दिल्ली जैसे महानगर में रहते हुए भी हमारी रोज़ एक बार जरुर बात होती है ……..हमारे बीच प्रेम है पर हमारे उस प्रेम में क्रोध भी आ जाता है मै उनसे नाराज़ भी हो जाती हूँ और भाभी के आ जाने पर इर्ष्या की भावना भी आई की कहीं वो हमारी उपेक्षा तो नहीं कर देंगे ………..और मुझे लगता है की ऐसा ही हर भाई बहन का रिश्ता होता होगा ………. ठीक इसी तरह हर प्रेम का रिश्ता होता है हम ये जानते हुए भी की क्रोध, इर्ष्या, स्वार्थ ये सब दुर्गुण है और इनसे हमें दूर रहना चाहिए हम अपने आपको कहाँ बचा पाते है……….. क्योंकि हम मनुष्य है और हम अपनी दैनिक दिनचर्या में ऐसी परिस्तिथियों में फंस जाते है की इन दुर्गुणों के भंवरजाल में फंस ही जाते है ………… कई महात्मा अपने प्रवचनों में और कई महापुरुषों ने अपने ग्रंथो में जीवन प्रेम से जीने के कई उपदेश देते है ………. और वो उपदेश गलत नहीं होते है ……..जीवन के सार होते है वो उपदेश और गहन चिंतन के परिणाम होते है वो उपदेश …..और मै किताबी बाते कहकर कतई इनकी अवहेलना नहीं करना चाहती हूँ …… परन्तु जब हम ये जीवन जीते है तो इसमें तमाम तरह की कठिनाइया उलझने परेशानिया भी हमारे सामने होती है ……………. हम कितना भी इस जीवन को प्रेम से बिताने की कोशिश करे कुछ न कुछ कमी तो रह ही जाती है और इसी कमी के कारण इंसानी दुर्गुण रूपी भावनाए भी व्यक्त हो जाती है …………. अब जैसे एक सीमा पर तैनात जवान अपने मातृभूमि के प्रेम के कारण ही तो युद्ध के दौरान गोली का जवाब गोली चला कर देता है ………..जबकि किताबो में लिखा जाता है की युद्ध विनाश की निशानी है पर हम यदि युद्ध के समय जवान बन्दूक न उठा कर प्रेम से जवाब देने लगे तो ये कायरता ही कही जायेगी ……..ठीक इसी तरह दैनिक दिनचर्या में कई उदाहरण मिल जायेंगे जैसे माँ पुत्र प्रेम में उसकी कई गलतियो को नादानियो का नाम देकर उसे पिता से बचाती है और उसे बचाने के लिए वो झूठ का भी सहारा लेती है जबकि झूठ भी एक दुर्गुण ही होता है……. हमारे सामाजिक रिश्ते पारिवारिक रिश्ते अंतर्मन के प्रेम पर ही टिके होते है …….. पर उस प्रेम का अहसास सबके लिए अलग अलग होता है ………… जैसे की हमारे घर में बर्तन मांजने के लिए बाई शकुंतला आती थी उसका पति रात को पीकर आता था और कभी कभी दो चार हाथ उसपर आजमा भी लेता था जिसे लेकर मै उसे हमेशा कहती थी की तुम क्यों सहती हो और जब एक दिन तीज का व्रत आया तो बाकायदा वो सजकर आई और मम्मी से कहा की शाम को नही आएगी क्योंकि उसने निर्जला व्रत रखा है तो मै चौंक गयी मैंने कहा की ऐसे पति के लिए तुमने व्रत रखा है तो उसने यही कहा की वो मारता जरुर है बेबी पर वो मुझसे प्यार भी करता है ये साड़ी वही लेकर आया बेबी आप अभी नही समझोगी शादी हो जायेगी तब समझोगी …. और आज शादी हो जाने पर मै यही सोचती हूँ की उम्र बीतने के साथ ही रिश्तो और उनमे छुपे प्रेम समझ में आते है ……… प्रेम एक अनमोल अहसास है जो इन दुर्गुणों के बावजूद मन में जगमगाता रहता है ………ये बुरे विचार ये दुर्गुण उस प्रेम की महत्ता को कम नहीं करते है ……….. हाँ मै ये अवश्य मानती हूँ की इंसान को इन बुराइयों से दूर रहना चाहिए लेकिन जब हम किसी प्रेम भरे रिश्ते को निभाते है तो वह रिश्ता हमेशा ही मीठा नहीं रहता वह रिश्ता कई आयामों से होकर गुजरता है और समय के साथ वह प्रेममयी रिश्ता ज़िन्दगी के हर रस का स्वाद लेता है जिसमे निम्बू की खटास, मिर्ची की तिखाई भी होती है ……..मैंने अपने पूर्व ब्लॉग में प्रेम में जिन भावो की बात कर रही थी उसके कहने का अभिप्राय यही था की हर उस रिश्ते में जिसमे प्रेम होता है उसमे समय पड़ने पर क्रोध नाराज़गी भी होती है ……. पर क्या जिस रिश्ते को निभाते वक़्त हमारे मन में क्रोध या इर्ष्या के भाव आ जाये वो प्रेम नहीं होता है उसे बुद्धिमान या बुधजीवी वर्ग समझौते से भरे रिश्ते का नाम दे देगा तब तो हर शादीशुदा जोड़े के बीच प्यार का नही समझौते का ही रिश्ता होता होगा ……….खैर मै अपने आपको विश्लेषक की श्रेणी में नहीं रखती की मै रिश्तो और उनके प्रेम का विश्लेषण करू की ये प्रेम है की नहीं …………… मेरे जीवन में समय समय पर जो जैसे हो रहा है वैसे ही मै उसे जीने की कोशिश कर रही हूँ और उसे वैसे ही इस ब्लॉग पर लिख देती हूँ और मेरे लिखने का अभिप्राय लेखन या साहित्य को नुक्सान पहुंचाने का नहीं है क्योंकि मै अपने आपको पारंगत नहीं मानती हूँ मै अभी सीख रही हूँ अपने आपको मै विद्यार्थी मानती हूँ ……….. एक विद्यार्थी की तरह मै कई गलतिया भी करती हूँ और उनसे सीखने की कोशिश करती हूँ ……….मेरे लिए जीवन पाठशाला के समान है, पाठशाला में हम जितने देर रहते है उतना ही अपने आपको ज्यादा समझदार और बुद्धिमान पाते है ……..ये ज़िन्दगी रोज़ हमें एक न एक पाठ जरुर सिखाती है और जिस दिन वो कुछ नहीं सिखाती उस दिन को मै रविवार मान लेती हूँ और जिस दिन कुछ घमासान सीखा देती है उस दिन को परीक्षा का दिन मान लेती हूँ और समय बीतने पर ऊपर बैठा परीक्षक हमें बताता है की हम पास हुए या फेल………जिस तरह एक स्वादिष्ट व्यंजन कई सामग्रियों से बनता है उसी प्रकार प्रेम रुपी व्यंजन भी कई भावनायो का मिला जुला रूप है जिसमे क्रोध इर्ष्या की भी छोटी सी मात्रा शामिल होती है, जो हमारे जीवन को चटाकेदार बनती है ……… पर फिर भी मै यही कहूँगी की ये मेरे विचार है ……….. पर अगर कोई इसे भी गलत माने या इसे कुंठित विचारधारा की संज्ञा दे तो मै क्या कह सकती हूँ लेकिन हाँ मेरे विचार से ह्त्या तो एक जघन्य अपराध है पर जब वही ह्त्या स्व रक्षा में या फिर किसी निर्दोष को बचाते हुए की जाए तो क्या वही ह्त्या अपराध की श्रेणी में आएगी …………….. जवाब आप सब जानते है ………. मेरे लिए लेखन सिर्फ मन बहलाव का जरिया नहीं है मै लिखती हूँ क्योंकि मै सोचती हूँ…….. और मै सोचती हूँ क्योंकि मै जी रही हूँ ……..जब ये मंच नहीं था मै तब भी लिखा करती थी ये अलग बात है तब डाइरी में लिखा करती थी ……….. लेखक की उपाधि पाना या अपनी किताब छपवाना मेरा उद्देश्य कतई नहीं है अगर किसी को मेरे विचार पसंद नहीं है तब भी मै लिखती रहूंगी क्योंकि लिखना मेरे लिए जीना है ……….. जब कभी मै कागज़ कलम नहीं पाती हूँ तो मन में ही लिख लेती हूँ फिर वो चाहे मन के कागज़ से मिट ही जाये ………………….जब अपने आसपास कुछ गलत होते हुए देखती हूँ और कुछ नहीं कर पाती तो उस कसमसाहट को लिख कर व्यक्त कर देती हूँ ………. पर उस गलत को देखते वक़्त मन में क्रोध आता है वो क्रोध इंसानियत के प्रति प्रेम के कारण आता है फिर कोई चाहे उस क्रोध को लाख बुरा कहे …………मै आज भी कहूँगी की मेरे प्रेम में क्रोध भी है स्वार्थ भी है इर्ष्या भी है ……मेरे प्रेम में बड़े बड़े उपमा अलंकार से सजे शब्द नहीं है मेरा प्रेम आम इंसान का प्रेम है……….. लिखते लिखते मै भावनाओं की रौ में बहती ही जा रही हूँ………अब हाथो को यही विराम देती हूँ ……… आप सबको शुभ -संध्या ……..

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23 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Amit Dehati के द्वारा
February 18, 2011

आदरणीय Priyaa जी प्रणाम ! अतिसुन्दर प्रयाश ! आदरणीय आपके लेख में सच्चाई झलक रही हैं ……. आपको बहुत बहुत बधाई| धन्यवाद ! http://amitdehati.jagranjunction.com/2011/02/12/%E0%A4%AD%E0%A4%B2%E0%A4%BE-%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%82%E0%A4%AE-%E0%A4%86%E0%A4%B8%E0%A5%81%E0%A4%82%E0%A4%93%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A5%8B-%E0%A4%B8%E0%A4%9C%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A5%8D/

Aakash Tiwaari के द्वारा
February 18, 2011

प्रिया जी, बहुत ही खूबसूरत लेख…कुछ न कर पाने की जो ये तकलीफ आपको होती है ये ये आपके सच्चे होने को दर्शाता है… http://aakashtiwaary.jagranjunction.com आकाश तिवारी

Ritambhara Tiwari के द्वारा
February 18, 2011

प्रिय जी! एक बेहतरीन रचना!

    priyasingh के द्वारा
    February 18, 2011

    आपका धन्यवाद………..

Rajni Thakur के द्वारा
February 18, 2011

प्रिया जी, ‘मेरा प्रेम आम इंसान का प्रेम है .’..अपनी बात बेहद शशक्त तरीके से कही आपने. पोस्ट बेहद पसंद आई.

    priyasingh के द्वारा
    February 18, 2011

    पोस्ट पसंद करने के लिए धन्यवाद…………

Alka Gupta के द्वारा
February 18, 2011

प्रिया जी , धाराप्रवाह शैली में बहुत ही सुन्दर भावों व विचारों के साथ लिखा गया अच्छा लेख है प्यार में बहुत ताकत होती है और उस प्यार में अन्य भाव भी जुड़ जाते हैं अची तरह बताने का प्रयास किया है बढ़िया रचना !

    priyasingh के द्वारा
    February 18, 2011

    प्रयास को सराहने के लिए धन्यवाद……..

jeetrohann(jeetrohann.jagranjunction.com के द्वारा
February 18, 2011

तू कर्म वीर तू धर्म वीर बस अपना धर्म निभाता चल !प्रिनका जी सब को तो भगवान भी खुश नहीं कर सकता

    priyasingh के द्वारा
    February 18, 2011

    आपके वाक्य बिलकुल सही है ………… आपका शुक्रिया…..

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
February 17, 2011

प्रिया जी………. सुंदर भावों से भरे आपके इस सुंदर प्रयास के लिए बधाई……

    priyasingh के द्वारा
    February 18, 2011

    प्रयास को सराहने के लिए शुक्रिया………..

charchit chittransh के द्वारा
February 17, 2011

प्रिय जी , नमस्कार ! अति सुन्दर प्रस्तुति के लिए बधाई ! प्रेम पर आपका पिछला लेख पढ़े बिना इस लेख में दिए स्पष्टीकरण से अर्थ निकाल प्रेम पर मन में आये विचार अभी यहीं लिखने विवश हूँ . श्रीमद्भागवद्गीता में जो कर्म फल की इच्छा बिना कर्म के लिए कहा गया है वही प्रेम के बिषय में भी सार्थक है . प्रेम केवल देने के लिए होता है पाने की इच्छा किये बिना !जब ऐसा प्रेम दिया जाना संभव हो जाता है तो प्रेमसलिला का उद्गम होता है . फिर प्रेम का सागर भी बनता है .जब प्रेम सागर का रूप ले लेता है तो प्रेम सागर में क्रोध , ईर्ष्या, आशंका, अदि के पत्थर केवल क्षणिक उथल पुथल उत्पन्न कर पाते हैं किन्तु प्रेम सागर में आनंद की लहरें निरंतर उद्वेलित करती रहती हैं . प्रेम सागर ना भी बना हो तो प्रेमसलिला भी ऐसे पत्थरो से प्रवाहहीन नहीं होती किन्तु यदि प्रेम के कटोरे में पत्थर लगे तो असर होता है . अब यह आपके प्रेम की प्रगति पर निर्भर है कि कितना फर्क पड़े . जहाँ तक प्रेम में क्रोध अदि के जन्म का प्रश्न है तो यह पूरी तरह मानव स्वाभाव के अनुकूल ही है . जिससे प्रेम होता है उसपर एकाधिकार कि इच्छा भी , प्रेम के प्रतिफल में प्रेम का मिलना सहज प्रतिक्रिया है और ऐसा होता भी है हाँ कभी कभी प्रेम का प्रतिफल कम मिलता अनुभव होता है किन्तु यह सत्य नहीं होता भ्रम मात्र होता है .

    priyasingh के द्वारा
    February 18, 2011

    आपकी पहली प्रतिक्रया के लिए धन्यवाद ……….आपके विचारों को पढ़कर अच्छा लगा ………

HIMANSHU BHATT के द्वारा
February 17, 2011

नमस्कार प्रिया जी….. आपने मेरे पोस्ट पर प्रतिक्रिया दी थी…. लेकिन शायद आपने उस पर मेरा उत्तर नहीं देखा है…. मई ज्यादा कुछ नहीं कहूँगा आपकी ही एक बात का जो की आपने इस पोस्ट पर लिखी है समर्थन करूँगा …. आपने लिखा है……जब अपने आसपास कुछ गलत होते हुए देखती हूँ और कुछ नहीं कर पाती तो उस कसमसाहट को लिख कर व्यक्त कर देती हूँ…. प्रिया जी यही कमी मुझमे है…. अब आप ही बताइये मै क्या करूँ…. क्या मैंने गलत कहा….फिर भी…. लगता है आपने मेरा सम्पूर्ण लेख अपने उपर ही ले लिया…. मेरा लेख आप पर केन्द्रित नहीं था… किसी एक व्यक्ति पर केन्द्रित होकर मै लेख नहीं लिखता…. मेरा लेख सम्पूर्ण जागरण जंक्शन के मंच पर चल रही अराजकता पर था… अगर ऐसा नहीं है… या यह लेख जो मैंने लिखा आप पर केन्द्रित होता…. तो जिस प्रकार से प्रतिक्रियाएं उस लेख पर आई हैं वह ना होती… सिर्फ अच्चा लेख, शुभकामनाएं, आभार, मजा आ गया, बेहतरीन लेख, आदि आदि ही प्रतिक्रिया स्वरुप होता…. मात्र एक लाइन से आप का यह सोचना की लेख आप पर है… यह गलत है… हाँ यह जरुर है की वह एक लाइन आप पर थी….. सार्थक लेखन की मै हमेशा कद्र करता हूँ और करता रहूँगा…. आपसे हमेशा सहयोग की ही उम्मीद करूँगा… आभार…..

    priyasingh के द्वारा
    February 18, 2011

    मै भी आपसे हमेशा सहयोग की अपेक्षा रखूंगी …………और आपकी आभारी रहूंगी………………

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 18, 2011

    धन्यवाद प्रियाजी……

sanjay kumar tiwari के द्वारा
February 17, 2011

bahut sunder vichar ………..Agle lekh ka intjar rahega …………

    priyasingh के द्वारा
    February 18, 2011

    विचारो को पसंद करने के लिए शुक्रिया………..

rajkamal के द्वारा
February 17, 2011

प्रिया जी …… नमस्कार ! क्या बात है ! आज अपना लेख चाहे किसी भी भावना के वशीभूत होकर लिखा हो आपने इसमें जो निरंतरता + प्रवाह +लय है उसके कारण मैं इसकी लाइन तो लाइन कोई अक्षर भी नहीं छोड़ पाया …… आपका आजतक का बेहतरीन लेख मेरी नजर में …… अब इससे ज्यादा क्या कहूँ …… बहुत -२ मुबारकबाद

    priyasingh के द्वारा
    February 18, 2011

    उत्साहवर्धन के लिए शुक्रिया……

R K KHURANA के द्वारा
February 17, 2011

प्रिय प्रिया जी, प्यार में बहुत ताकत होती है ! प्यार के दो बोल मनुष्य का जीवन बदल देते है ! प्यार को किसी परिभाषा में नहीं बंधा जा सकता ! प्यार बस प्यार ही होता है ! बहुत सुंदर रचना आर के खुराना

    priyasingh के द्वारा
    February 18, 2011

    रचना को पसंद करने के लिए शुक्रिया………..


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