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क्या हमें प्रकृति से प्यार है ...

Posted On: 31 Mar, 2011 Others में

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प्रकृति की स्निग्धिता
प्रकृति की हरीतिमा
आकाश में डूबते
सूरज की लालिमा
चंहुओर व्याप्त है
प्रकृति की व्यापकता
कर रहा यशोगान
प्रकृति का पत्ता-पत्ता
हमारी हर सांस में
प्रकृति का तेज है
हमारे जीवन में
प्रकृति का ओज है
प्रकृति के आँचल तले
खेत-खलिहान लहलहा रहे
प्रकृति के बांहों में
पुष्प कुसुम कहकहे लगा रहे
प्रकृति जब शांत है
ममतामयी करुणामयी
प्रकृति जब उग्र है तो
रुद्रमयी क्रुद्धमयी
यही प्रकृति का प्रकार है
यही उसका व्यहार है
पर क्या हम गर्व से
कह सकते है की हमें
प्रकृति से प्यार है……………..

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9 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shubham Shahi के द्वारा
May 2, 2011

बहूत ही सुंदर रचना

sdvajpayee के द्वारा
April 2, 2011

   कविता में अंतर्निहित सुचिंतित दर्शन और संदेश-सवाल ही इसे सार्थकता दे रहा है।    पर क्या हम गर्व से कह सकते है की हमें प्रकृति से प्यार है……………..। सवाल सौटके का है, लेकिन हम खुद को , स्‍वयं को ही कहां प्‍यार करते हैं या कर पाते हैं?

abodhbaalak के द्वारा
April 1, 2011

सुन्दर रचना प्रिया जी http://abodhbaalak.jagranjunction.com

    priyasingh के द्वारा
    April 2, 2011

    शुक्रिया आपका……….

आर.एन. शाही के द्वारा
April 1, 2011

प्रिया जी, हमेशा की तरह आपकी बेहतरीन रचना । बधाई ।

    priyasingh के द्वारा
    April 2, 2011

    आप जैसे आदरणीय और प्रबुद्धजन रचना को सराहते है तो मन के साथ साथ कलम भी संतुष्ट हो जाती है ……….

वाहिद काशीवासी के द्वारा
March 31, 2011

प्रीती जी, हमारे और प्रकृति के बीच के सम्बन्ध को दर्शाती अत्यंत ही सुन्दर कविता है यह| आज हम अपने स्वार्थ के वशीभूत इतने अंधे हो गए हैं कि प्रकृति का उचित उपयोग न करके उसका दोहन कर रहे हैं और उसका परिणाम भी भोग रहे हैं| मैं तो गर्व से कहूँगा…हाँ..मुझे प्रकृति से प्यार है| साभार,

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    March 31, 2011

    प्रिया जी क्षमा कीजिये आपके नाम की जगह भूलवश दूसरा नाम छप गया है|

    priyasingh के द्वारा
    April 2, 2011

    हम सभी अगर प्रकृति को प्यार करने के साथ साथ उसकी देखभाल अपने बच्चो की तरह करे तो फिर बात ही क्या होगी चारो और खिले खिले फूल और हरियाली ही हरियाली …………..कविता को पसंद करने के लिए शुक्रिया…..


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