priyanka

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प्रेस वाले की बच्ची ....

Posted On: 14 Apr, 2011 Others में

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अभी कुछ दिनों पहले हम अपने पुराने घर से नए घर में आये है ……….जब तक अपना घर न ले लो तब तक किराए के घर में रहने की वजह से ये उठा-पटक तो करनी ही पड़ती है ……….खैर मुझे कोई ख़ास ज्यादा दिक्कत नहीं हुई क्योंकि शादी के पहले डैडी के स्थानान्तरण की वजह से घर बदलने की आदत हो चुकी है ………और दिल्ली जसी बड़े महानगर में तो हर किसी को इसकी आदत है क्योंकि यहाँ हर कोई हमारी तरह अपना फ्लैट बुक कर देता है और फिर उसके मिलने के इंतज़ार में किराये के घर का किराया भी देता है और बुक किये हुए घर की इ.ऍम. आई. भी भरता रहता है ……….और जब तक अपना घर ना मिले एक घर से दुसरे घरो के मज़े लेता रहता है ……फिर वो किराये के ही क्यों ना हो ……. पर इस घर की सबसे ख़ास बात ये है की इस घर के सामने हरा भर पार्क है ……शाम को इस पार्क में ढेर सारे बच्चे अपनी माँ या दादी दादा के साथ खेलने आते है …….मै भी अपने नन्हे-मुन्ने को लेकर यहाँ चली जाती हूँ………इस बहाने थोड़ी देर वो मुझे परेशान नहीं करता है क्योंकि जबसे चलने लगा है तबसे तो पूछिए मत की क्या क्या करता है ये ब्लॉग भी छोटा पड़ जाएगा लेकिन उसकी बदमाशियों की लिस्ट नहीं ख़त्म होगी …….पार्क में जब सारे बच्चे उछल कूद मचाना शुरू करते है तो वो नज़ारा देखने लायक होता है, सारे बच्चो को अपने खिलोनो से नहीं दुसरे बच्चे के खिलोनो से ही खेलना है ……… इसी पार्क के सामने एक प्रेस वाला प्रेस करता है और वही अपने परिवार के साथ रहता भी है ……….उसकी ७-८ साल की एक लड़की है जो मुझे पूरे समय पार्क में ही नज़र आती है ………. जैसे ही वो किसी भी छोटे बच्चे को देखती है , मेरा प्यारा बाबु कहते हुए उसे गोद में उठा लेती है और फिर उसके साथ खेलने लगती है , वो बच्चा अपने साथ कोई न कोई खिलोना लिया ही होता है जैसे बेट बाल या कोई और ……….. और वो प्रेस वाले की बच्ची दौड़ दौड़ कर उसके साथ बेट बाल खेलने लग जाती है और फिर जैसे ही कोई और बच्चा दूसरी नयी बड़ी बाल लेके आता है वो दौड़ कर उसके पास भाग कर चली जाती है ……और अगर वो बच्चा उसे बाल नहीं देता है तो बैठे बैठे बड़ी हसरत भरी निगाहों से उसे बाल के साथ खेलते हुए देखने लगती है कोई जिद नहीं कोई गुस्सा नहीं ……………. गरीबो के बच्चे समय से पहले ही बड़े हो जाते है लेकिन दबे छुपे उनमे कहीं कहीं उनका बचपना छुपा ही रहता है जो कभी कभी नज़र आ जाता है,………लेकिन अक्सर बच्चो की माये उसे खिलोनो के साथ खेलने देती है क्योंकि खिलोनो के खेलने के साथ साथ वो उनके बच्चो को भी देखती रहती है और माँ लोग आराम से पार्क में बैठ कर थोडा बतिया लेती है…. छोटे बच्चो को खिलाने के बहाने वो भी उनके साथ खिलोनो को खेलने का शौक पूरा कर लेती है, वो खिलोने जो उसे उसके माँ बाप नहीं दिला पाते है….इए तरह वो खिलोने उसके लिए किराए के खिलोने ही हो जाते है ………………कैसी विडम्बना है जिसके पास जो चीज़ होती है उसे उसकी अहमियत नहीं होती है, मेरे बच्चे के पास खिलोने है तो वो पार्क में जाते ही उन्हें छुता तक नहीं है वो पेड़ पौधो मिटटी घास के साथ खेलना चाहता है और बेट बाल से वो प्रेस वाले की बच्ची खेलती है …….इस तरह वो थोड़ी देर के लिए अपने बचपन को जी लेती है नहीं तो आधे समय तो वो अपने छोटे भाई को संभालती है और आधे समय लोगो के घर प्रेस किये हुए कपडे या तो पहुंचाने जाती है या प्रेस के लिए कपडे लेने जाती है ………….लेकिन पार्क में बच्चो के आते ही दौड़ कर आ जाती है और थोड़ी देर के लिए उन्हें बेट बाल के साथ खिलाते हुए अपना बचपन भी जी लेती है ……..उसे और उस जैसे कई बच्चो को देखते ही मन में पीड़ा के साथ साथ टीस भी उठती है , टीस कुछ न कर पाने की …………हमारी ज़िन्दगी में ऐसे कई काम है जिन्हें हम करना चाहते है पर कर नहीं पाते है कभी कोई मजबूरी होती है और कभी ये की आखिर वो काम कैसे किया जाए …………….. लेकिन कुछ पल ही सही उन किराये के खिलोनो से खेल कर वो बच्ची खुश हो लेती है ……………ठीक उसी तरह जिस तरह हम किराए के घरो में रह कर अपने घर का सुख पा लेते है ……………….

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79 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sadhana thakur के द्वारा
September 14, 2011

कभी समय मिले तो मेरी रचना पर भी नजर डालें ,,धन्यवाद्

sadhana thakur के द्वारा
September 13, 2011

प्रिया जी ,पहली बार आपकी रचना पढ़ी ,बहुत अच्छी लगी ..ब्लॉगर ऑफ़ द वीक बनने की ढेर सी बधाई …………

prakash chandra के द्वारा
May 3, 2011

बहुत बहुत शाबाशी की हकदार हैं आप . हम लोग दुनिया में हमेशा बड़ी बड़ी चीजों को ही देखते रहते हैं और बड़े बड़े सपनो में जीते रहते हैं . किन्तु अपने आस पास की इन छोटी छोटी चीजों में जो आत्मिक सुख मिलता है उसकी कल्पना नहीं की जा सकती है . उस पल को जीने का सुख ही कुछ और है . आप ने कहा की उस बच्ची के लिए आप कुछ कर नहीं पाती हैं . ऐसा नहीं है , आप की यह सोच ही आप के उद्देश्य की राह की पहली सीढ़ी है . जब हमारी शोच सकारात्मक होती है तो हम जाने अनजाने में समाज के उस वंचित तबके के लिए बहुत कुछ कर जाते हैं , मसलन आप उसे या उस जैसे बच्चों को कोई पुरानी किताब या अपने बच्चों के पुराने कपडे जो उसके नए से भी अच्छे ही होंगे या पुराने खिलौने आदि प्यार और सम्मान के साथ दे कर तो देखिये . फिर उसके चेहरे पर जो ख़ुशी और प्यार आपके लिए दिखाई देगा वैसा सुख आपको पहले शायद ही कभी मिला होगा . आपकी मीठी प्यारभरी स्नेहिल शोच के लिए पुनः आपको साधुवाद . जैहिंद जैभारत .

dalveermarwah के द्वारा
April 26, 2011

अपने सरल भाषा शैली में जो विवरण प्रस्तुत किया है वाक़ई उसके लिए आपको बधाई।

K M Mishra के द्वारा
April 25, 2011

कल मैंने झोपड पट्टी की एक महिला को देखा जो सड़क पर मटमैली साड़ी पहने अपने ३ साल के बच्चे की उंगली पकडे चली जा रही थी. वो लड़का मात्र एक कमीज पहने था और नीचे से नंगा था. लेकिन माँ की उंगली पकड कर सड़क पर  ऐसी बेफिक्री से चल रहा था मानो उसे किसी चीज की कमी न हो. माँ है न साथ में. उस दृश्य में पता नहीं ऐसा क्या था में उन्हें दूर तक जाते देखता रहा. एक बार सोचा की मोबाइल से उनकी फोटो ले लूं. लेकिन फिर सोचा की लोग सोचेंगे की में एक गरीब का उपहास कर रहा हूँ. खैर, मुझे वह बच्चा बार बार याद आता है. 

    priyasingh के द्वारा
    April 25, 2011

    माँ की ऊँगली थाम कर तो ३० साल का नौजवान भी हर मुश्किल से निकल जाता है ………..माँ की सुरक्षा उनका आशीर्वाद इस दुनिया के हर धन से अनमोल है …………दुनिया का हर सुख हर आराम हर अनमोल चीज़ एक तरफ और माँ का साथ उनका प्यार एक तरफ………………..क्योंकि जीन के पास माँ है उन्हें इस सबकी जरुरत ही नहीं है ………………इतनी सुन्दर घटना हम सबके साथ बांटने के लिए शुक्रिया आपका………..

Dharmesh Tiwari के द्वारा
April 25, 2011

आदरणीया प्रिया जी सादर प्रणाम,ब्लोगर ऑफ़ द वीक बनने पर हार्दिक शुभकामनायें,धन्यवाद!

    priyasingh के द्वारा
    April 25, 2011

    धन्यवाद धर्मेश जी ………….

    Mrityunjay के द्वारा
    April 27, 2011

    कहां शुरू कहां खतम… सोचा था प्रेस यानी पत्रकार वाली की बच्‍ची होगी लेकिन आपने तो कहानी कुछ अधिक ही मार्मिक कर दी। बहुत खूब। http://mrityunjaykumartripathi.jagranjunction.com

kuldeep kumar के द्वारा
April 25, 2011

आपके द्वारा लिखा गया बचपन का दर्द अति उत्तम है” 

    priyasingh के द्वारा
    April 25, 2011

    धन्यवाद कुलदीप जी………….

Vivekinay के द्वारा
April 25, 2011

बहुत ही सुंदर लेख प्रिया जी बचपन के दर्द को बड़े ही सहजता से मोतिओं की भांति माला मैं पिरो दिया आपने. बधाई हो आपको

    priyasingh के द्वारा
    April 25, 2011

    धन्यवाद आपका……….

नितेश झा के द्वारा
April 24, 2011

प्रिय प्रिया जी कितने सहज शब्दों में आपने इतनी मार्मिक लेख को लिखा है ये वास्तव में प्रसंशा के योग्य है आपको हार्दिक बधाई

    priyasingh के द्वारा
    April 25, 2011

    आपकी प्रशंशा के लिए आभार आपका………

chaatak के द्वारा
April 24, 2011

प्रिय जी, हमारे आस पास बहुत से ऐसे बच्चे हैं जो उस बच्ची की तरह ही जीते हैं और आगे चल कर उन ऊंचाइयों को छूते हैं जिन्हें साधन संपन्न सोच भी नहीं सकते| आपने बच्ची का जो विवरण दिया है उससे पता चलता है कि आपकी निरीक्षक दृष्टि बहुत ही पैनी है और भावनाओं की पहचान करने में भी आप गलती नहीं करती हैं| ऐसे बच्चों को कुछ नहीं चाहिए सिर्फ हम इतने संवेदनशील हों कि उन्हें सम्मान और प्यार दें ताकि उन्हें लगे कि वे इंसानों की दुनिया में रहते हैं और वे खुद भी हममे से एक है, थोड़े कम या ज्यादा संसाधनों के साथ| अच्छी पोस्ट के लिए मोस्ट व्युड ब्लॉगर चुने जाने पर बधाई !

    priyasingh के द्वारा
    April 25, 2011

    सही कहा आपने हमारे आस-पास ऐसे कई बच्चे है लेकिन वो मुझे अलग इसलिए लगी क्योंकि इतनी छोटी उम्र में भी मुझे उसके अन्दर आत्म-सम्मान की एक प्रबल भावना दिखाई दी …………..वो उन खिलोनो को छीन कर या चुरा कर नहीं खेलना चाहती थी बल्कि उन्हें उन छोटे बच्चो के साथ मिलकर खेलना चाहती थी यही बात उसे विशेष बना देती है …………आपकी बधाई के लिया आभार आपका……..

Rajkamal Sharma के द्वारा
April 23, 2011

प्रियंका जी ….नमस्कार ! इस हफ्ते की टाप सुपर स्टारनी चुने जाने पर ढ़ेरो बधाईयाँ ….. मेरा यह मानना है की उस प्रेस वाले की बच्ची के स्टार बहुत ही स्ट्रांग है , भविष्य में वोह जरूर कोई ऊँची उड़ान भरेगी ….. आपने उस पर लेख लिखा तो उसने आपको उपर (स्तरीय) उठा दिया , इसलिए अब मेरी आपको यही सलाह है की आप अपने हरेक लेख में एक बार उसका ज़िक्र जरूर किया करे ….(लेडी लक) धन्यवाद

    priyasingh के द्वारा
    April 25, 2011

    आप सबकी दुआओं से जरुर उसके स्टार स्ट्रोंग हो गए है …….. …….मुझे ऐसा लगता है की जिसने भी इस रचना को पढ़ा होगा उसे मन ही मन जरुर आशीर्वाद भेजा होगा और आशीर्वाद जरुर फलित होगा………… आपकी सलाह के बारे में क्या कहू ……….आपकी बधाइयो के लिए आभार आपका………

नितिन धामू के द्वारा
April 23, 2011

आप का लेख पढ़ कर लगा की आदमी भी कभी कभी कितना बेबस हो जाता है, हम चाह कर भी कुछ नहीं कर पाते॥

    priyasingh के द्वारा
    April 25, 2011

    सही कहा आपने कभी कभी ये बेबसी हमें कचोटती है पर फिर भी हम मजबूर ही खड़े rah जाते है …………

संदीप कौशिक के द्वारा
April 23, 2011

प्रिया जी, सप्ताह की सबसे अधिक पढ़ी जाने वाली ब्लॉगर चुने जाने के लिए आपको हार्दिक बधाई | आपका ये लेख पढ़ कर सचमुच ये लगा कि आप इसकी हकदार थी | दिल को छूने वाले इस लेख को इस मंच पर रखने के लिए आपका आभार !! :)  

    priyasingh के द्वारा
    April 25, 2011

    सराहना के लिए धन्यवाद आपका…………

Ambalika के द्वारा
April 23, 2011

प्रिया जी, इस भावनात्मक, प्रेरणादायी लेख के लिये हार्दिक धन्यवाद.

    priyasingh के द्वारा
    April 25, 2011

    आभार आपका……………

sanjay ranjan के द्वारा
April 22, 2011

िपऱया जी           नमस्ते कहीं मैेने सुन रखा है िक- िमल जाए तो िमट्टी है और खो जाए तो सोना। अापके द्वारा िलखे गए ब्लाग में मुझे कमोवेश तो यही देखने को िमल रही है। ध्नयवाद संजय रंजन पटना 

    priyasingh के द्वारा
    April 23, 2011

    धन्यवाद संजय जी……………

mahendratripathi के द्वारा
April 22, 2011

प्रिया जी आपके इस प्रेरणादायी और संवेदनात्‍मक सोच के साथ एक प्रेस वाले की बच्‍ची को देखकर जो बात उकेरा है इसके लिए आपको ढेर सारी बधायी काश किराये का मकान सबके लिए अपना हो जाता तो शायद सभी की इच्‍छाए पूरी होती कई दिनो के बाद ब्‍लाग पढा मन काफी भावुक हो गया उसकी संवेदनात्‍मक बात पढकर/ पुन धन्‍यवाद इस तरह की बात लिखने के लिए।

    priyasingh के द्वारा
    April 23, 2011

    अगर किराये का मकान सबके लिए अपना हो जाएगा तो बिचारे मकान मालिको का क्या होगा……… मेरे विचारों ने आपके मन को छुआ तो मेरा लिखना सफल हो गया …………… आभार आपका……………

वाहिद काशीवासी के द्वारा
April 22, 2011

प्रिया जी, सप्ताह की सर्वाधिक देखे जाने वाली ब्लॉगर चुने जाने पर बधाई हो|

    priyasingh के द्वारा
    April 23, 2011

    धन्यवाद वहिदजी …………

    priyasingh के द्वारा
    April 23, 2011

    शुक्रिया…………..

    priyasingh के द्वारा
    April 23, 2011

    सही कहा आपने डॉ. साहब बच्चे मन के सच्चे होते है वो खिलोनो से खेलते है जिंदगियो से तो बड़े खेलते है …..

FIROZ KHAN के द्वारा
April 22, 2011

आपका ब्लाक पड़ कर आज मुझे अपना बचपन याद आगया लिकिन आज शब् कुछ ठीक है ,

    priyasingh के द्वारा
    April 23, 2011

    शुक्रिया खान साहब………….

dr deepak dhama के द्वारा
April 22, 2011

बड़ा लेखन, बधाई हो

    priyasingh के द्वारा
    April 23, 2011

    शुक्रिया डॉ. साहब …………

SKKJI के द्वारा
April 22, 2011

पंचकर्म चिकित्सा केंद्र का कार्यक्रम — 23 अप्रैल 2011 आर्य समाज , मोती नगर Block 17, नई दिल्ली 110015 कीऔर से “श्री संतुलन पंचकर्म चिकित्सा केंद्र” का विधिवत उदघाटन 23 अप्रैल 2011 सायं 4 .15 बजे प्रसिद्ध समाजसेवी महाशय धर्मपाल (प्रधान आर्य केंद्रीय सभा दिल्ली राज्य ) करेंगे I रोगियों को रोगमुक्त करने के लिए वरिष्ठ वैद डाo हेमंत मोदी की देख रेख मैं पंचकर्म पद्धति से उपचार किया जाता है I 125 वें दिवस के उपलक्ष्य पर उद्योग मंत्री दिल्ली सरकार डा० रमाकांत गोस्वामी, विधायक श्री सुभाष सचदेवा, निगम पार्षद श्री वेद प्रकाश गुप्ता व अनेक गणमान्य प्रतिष्ठित महानुभाव कार्यक्रम में सम्मिलित होंगे I श्री विनय आर्य जी , राजीव आर्य जी , धर्मपाल आर्य जी समस्त दिल्ली के आर्यजन का प्रतिनिधित्व करेंगे I इस अवसर पर आपका स्वागत है I संयोजक सुरेन्द्र कोछड़ Search ayurngo on google

Alka Gupta के द्वारा
April 22, 2011

प्रिया जी , ब्लॉगर ऑफ़ द वीक बनने पर बधाई !

    priyasingh के द्वारा
    April 23, 2011

    शुक्रिया अलका जी……………..

manoranjanthakur के द्वारा
April 22, 2011

बहुत जीवंत ,सुदंर आलेख  ढेर सारी बधाइयाँ !

manoranjanthakur के द्वारा
April 22, 2011

बहुत जीवंत ,सुदंर आलेख  ब्लॉगर ऑफ़ द वीक बनने पर ढेर सारी बधाइयाँ !

    priyasingh के द्वारा
    April 23, 2011

    आपकी ढेर साडी बधाईयो के लिए ढेर सारा शुक्रिया……………..

nishamittal के द्वारा
April 22, 2011

प्रिया जी ,अच्छा आलेख आपका,माता पिता को बच्चे को प्रोत्साहित करना चाहिए ऐसे बच्चों के साथ मानवीय भावना रखने के लिए.सम्मान की बधाई .

    priyasingh के द्वारा
    April 22, 2011

    बच्चे होते ही है इतने मासूम की उन्हें देख कर प्यार आ ही जाता है ………….. आपकी बधाई का शुक्रिया……..

rachna varma के द्वारा
April 21, 2011

प्रिया जी , ब्लॉगर ऑफ़ द वीक बनने पर ढेर सारी बधाइयाँ ! धन्यवाद |

    priyasingh के द्वारा
    April 22, 2011

    धन्यवाद रचनाजी………….

Harish Bhatt के द्वारा
April 21, 2011

प्रिया जी, सादर प्रणाम.. ब्लॉगर ऑफ़ द वीक चुने जाने पर आपको हार्दिक बधाई

    priyasingh के द्वारा
    April 22, 2011

    आपकी बधाई का शुक्रिया……………

Rajesh के द्वारा
April 21, 2011

प्रिया जी, सादर प्रणाम. ब्लॉगर ऑफ़ द वीक चुने जाने पर आपको हार्दिक बधाई !

    priyasingh के द्वारा
    April 22, 2011

    शुक्रिया …………

allrounder के द्वारा
April 21, 2011

प्रिया जी, एक सशक्त लेख के लिए ब्लॉगर ऑफ़ द वीक चुने जाने पर आपको हार्दिक बधाई !

    priyasingh के द्वारा
    April 22, 2011

    बधाई के लिए शुक्रिया……………वैसे इस लेख पर पहली प्रतिक्रिया भी आपकी थी और अब बधाई भी पहली आपकी ही है ………..

    allrounder के द्वारा
    April 23, 2011

    नमस्कार प्रिया जी, इसे एक इत्तेफाक ही समझिये जो इस पोस्ट पर पहली प्रतिक्रिया मेरी रही, और इस लेख के लिए आपको ब्लोगर ऑफ़ द वीक चुना गया तब भी पहली बधाई भी मेरी ओर से ही थी, मगर मुझे बड़ी प्रसन्नता है की इस प्रशंशनीय आलेख पर इत्तेफाक से दोनों बार पहुँचने वाला मैं ही था ! एक बार फिर से आपको एक अच्छे आलेख पर बधाई, और आगे भी ऐसे ही सार्थक लेखन के लिए शुभकामनाये ….

rita singh \'sarjana\' के द्वारा
April 16, 2011

प्रिया जी , सही कहा जिसके पास जो सुविधा उपलब्ध नहीं रहता वो उसके पीछे भागता हैं और जिसके पास सुविधा हैं उसे उससे कोई मतलब नहीं रखता ,अच्छी रचना बधाई ……………

    priyasingh के द्वारा
    April 22, 2011

    सही कहा आपने इंसान यही व्यवहार करता है और बाद में पछताता है ………… शुक्रिया आपका…..

surendrashuklabhramar5 के द्वारा
April 15, 2011

..उसे और उस जैसे कई बच्चो को देखते ही मन में पीड़ा के साथ साथ टीस भी उठती है , टीस कुछ न कर पाने की …………हमारी ज़िन्दगी में ऐसे कई काम है जिन्हें हम करना चाहते है पर कर नहीं पाते है कभी कोई मजबूरी होती है और कभी ये की आखिर वो काम कैसे किया जाए …………….. लेकिन कुछ पल ही सही उन किराये के खिलोनो से खेल कर वो बच्ची खुश हो लेती है ……………ठीक उसी तरह जिस तरह हम किराए के घरो में रह कर अपने घर का सुख पा लेते है ………………. प्रिया जी बधाई हो सुन्दर लेख के लिए -आप ने इसमें सारा दर्द , संवेदनाये डाल दी हैं , उधर किराये का घर , एक तरफ प्रेस वाले की बच्ची की बचपन की तस्वीर -सच है जिसके पास जो होता है वह उसे भाता नहीं इन्सान की मनोवृत्ति ही ऐसी होती है -हम उसकी ज्यादा अहमियत देते हैं जो दूसरों के पास होती है बड़े हों या बच्चे -हमारी यही शुभ कामनाएं है की अपना देश भी केवल कानून न बनाये कानून लागू करे -अन्य देश सा बच्चों को पढने लिखने का पैसा छात्रवृत्ति मिले, उनको खाने जीने का अधिकार मिले, आज भी ढाबों होटलों में बच्चे पलते धो रहे कोई बोझ ढो रहा कोई कूड़े में पड़ा है शायद आप ने हमारी कविताओं में भी ये दर्द पढ़ा होगा , शायद ये खयाली पुलाव हमारा कभी सच हो जाये ??? सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर५

    priyasingh के द्वारा
    April 16, 2011

    आपकी और हम, सब, मिलकर अपनी कवितायों और लेखो के माध्यम से सरकार को जगाने की ही कोशिश कर रहे है देखिये कब हमारा ये ख्याली पुलाव सरकार सच में पकाती है …………..

abodhbaalak के द्वारा
April 15, 2011

प्रिया जी कुछ समय पहले किसी कामेडी के प्रोग्राम में सुना था की 1992 के बाद देश में बच्चे नाहे पैदा हो रहे बल्कि अपने बाप के बाप पैदा हो रहे हैं , शायद ये सच ही है…. सुन्दर रचना…. http://abodhbaalak.jagranjunction.com

    priyasingh के द्वारा
    April 16, 2011

    हाँ ये तो है पहले के बच्चो की तुलना में आज के बच्चे कुछ अलग ही है …………. मेरे दादी तो कहती है की ये मोबाइल और कम्पूटर युग के बच्चे है तो अलग तो होंगे ही ………… शुक्रिया………….

aftab azmat के द्वारा
April 15, 2011

बहुत अच्छी रचना…

    priyasingh के द्वारा
    April 16, 2011

    शुक्रिया आपका………..

Dr,Manoj Rastogi के द्वारा
April 15, 2011

सुंदर प्रस्तुति | बधाई |

    priyasingh के द्वारा
    April 16, 2011

    आभार आपका………..

alkargupta1 के द्वारा
April 14, 2011

प्रिया जी, ये बच्चे समय से पहले ही बड़े हो जाते हैं व अपनी जिम्मेदारी समझने लगते हैं बड़ी ही सुन्दरता से इस बाल मन का चित्रण किया है……संवेदना प्रधान अति सुन्दर पोस्ट !

    priyasingh के द्वारा
    April 16, 2011

    आपने लेख को सराहा इसलिए धन्यवाद आपका………………..

baijnathpandey के द्वारा
April 14, 2011

आदरणीया प्रिया जी बचपन इसी का नाम है ……….अगर मिटटी का पुतला पसंद आ जाय तो सोने का पुतला पड़ा रह जाय | शायद इसीलिए उन्हें भगवान का रूप कहा जाता है | इंसान जिस दिन बड़ा हो हो जाता है उसी रोज इश्वर से दूर हो जाता है | वह हरेक चीज की कीमत लगाने लगता है और इसीलिए तमाम प्रसाधनों के बीच भी ख़ुशी ढूंढ़ नहीं पता | बचपन की उन्मुक्त स्मृतियों को जीवंत करता हुआ सार्थक आलेख | बधाई |

    baijnathpandey के द्वारा
    April 14, 2011

    कृपया पता को पाता पढ़ें | धन्यवाद |

    priyasingh के द्वारा
    April 16, 2011

    सही कहा आपने बचपन हर आडम्बर से दूर होता है जैसे जैसे हम बड़े होते जाते है तमाम बातो में उलझ कर रह जाते है …………………..आभार आपका ……

वाहिद काशीवासी के द्वारा
April 14, 2011

प्रिया जी, मानवीय संवेदनाओं के ह्रास पर प्रकाश डालता आपका यह लेख वास्तव में सराहनीय है| अपने आसपास की गतिविधियों में इस तरह की समस्याओं को महसूस करना किसी सवेंदनशील व्यक्तित्व के ही सामर्थ्य का है| साधुवाद,

    Rajkamal Sharma के द्वारा
    April 14, 2011

    प्रियांका जी ….नमस्कार ! आपका यह लेख बहुत ही सुन्दर बन पड़ा है ….. शायद मेरी पिछली टिप्पणी इसका आधार बनी है …. उसका नतीजा इस लेख के रूप में देख कर बहुत ही अच्छा लगा …..ab agle lekh ka adhaar नहीं दूँगा , उसका विषय आपको खुद ही चुनना और ढूंडना होगा …… वैसे जिस बात के लिए ब्लाग कम पड़ जाए मेरा ख्याल है कि सभी उसी को जानना चाहेंगे … आभार

    priyasingh के द्वारा
    April 16, 2011

    वाहिदजी आपने लेख को सराहा इसके लिए शुक्रिया………………. मानवीय संवेदनाये की कमी की वजह से ही आज हमारे समाज में तरह तरह की कुरीतियों ने अपने पाँव पसार लिए है ………….लेकिन बच्चे जो हमारे समाज का भविष्य है उनको हम सारी बातो को सीखा कर एक कोशिश तो कर ही सकते है ………….

    priyasingh के द्वारा
    April 16, 2011

    राजकमलजी ……. उसकी बदमाशियों को पढने से ज्यादा देखने में मज़ा आता है और उसकी शैतानियाँ लिखूंगी तो पढने वालो को लगेगा की अरे ये तो हमारा बच्चा भी करता था इसमें नया क्या है मुझे वो अनोखा इसलिए लगता है क्योंकि वो मेरा है …………. लेख की तारीफ़ के लिए शुक्रिया……….

allrounder के द्वारा
April 14, 2011

प्रिया जी, नमस्कार ! बेहद सम्बेदना जगाता और सच बातों से भरा है आपका आलेख ” जिन के पास जो चीज होती है, उसका मूल्य वह नहीं समझता वह समझता है जिसके पास उक्त बस्तु उपलब्ध नहीं होती, और ये आदत बच्चों मैं ही नहीं बड़ों मैं भी होती है मानव स्वाभाव ही ऐसा है ! अपने रोजमर्रा की जिन्दगी मैं हम अपने आस – पास कुछ ऐसा देखते हैं जिसमे मन मैं कुछ करने की इक्षा तो होती है, किन्तु क्या और किस प्रकार करें ये तय करना बड़ा मुश्किल हो जाता है ! भगवान उस बच्ची जिसका अपने यहाँ जिक्र किया है उसका बचपन खुशियों से भरे यही कामना कर सकते हैं !

    priyasingh के द्वारा
    April 16, 2011

    आप सबकी दुआओं से जरुर उस बच्ची का भविष्य उज्जवल होगा ……………….बड़े भी बच्चो की तरह कभी कभी नादानी भरा व्यवहार करते है …………. सराहना के लिए शुक्रिया…………..

    sampat kataria के द्वारा
    April 22, 2011

    this blog is very nice but dukh is bat ka hai ki now a days koe bhi ye nhi samjta ki jarurat walo ki madat kerna hi sabse bada sukh hai waise bhi subh kuch mil jata es dunia me per ma nhi milti

    priyasingh के द्वारा
    April 23, 2011

    सही कहा आपने संपत जी जरुरत मंदों की मदद करना सबसे पुण्य का काम है ……………शुक्रिया आपका……


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