priyanka

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ऐ भाई जरा देख के चलो...!!!

Posted On: 28 Apr, 2011 Others में

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……….ऐ भाई जरा देख के चलो , आगे ही नहीं पीछे भी, दाए ही नहीं बाए भी, ऊपर ही नहीं नीचे भी, ऐ भाई……………..दिल्ली की सडको पर निकलने वाला हर एक शख्स को ये गाना जरुर ध्यान से सुनना चाहिए और सिर्फ सुनना ही नहीं चाहिए बल्कि उसे अमल में भी लाना चाहिए , ये बात मै यूँ ही नहीं कह रही ……..हुआ यूँ की आज सुबह सुबह हम अपनी गाड़ी से ऐ.टी.म मशीन से पैसे निकालने के लिए गए और जब घर की ओर लौट रहे थे तो सामने रास्ता बंद था एक गाडी वाला ठेले वाले को पकड़ के उसपर बरसने में लगा हुआ था ………..उस ठेले वाले ने लगता है उसकी गाडी ठोंक दी थी ……और वो जनाब तो इतने गुस्से में थे की पूछिए मत ……बगल में उनकी बीवी भी खड़ी हुई थी, वो बिचारा ठेले वाला अपने हाथ पाँव जोड़ कर माफ़ी मांगे जा रहा था पर वो कुछ सुनने को तैयार ही नहीं और उसे जबरदस्ती अपने गाडी में घास-फूस के गट्ठे की तरह डाल कर ले गए …………..अब मै डर गयी मैंने अपने पतिदेव से कहा की क्या करे, इन्होने कहा की गाड़ी का नंबर नोट कर लेते है पुलिस को फोन कर देंगे, फिर हमने ये भी सोचा की बीवी भी बैठी थी बगल में हो सकता है सिर्फ डराने के लिए या कुछ बात करने के लिए बिठा लिया हो …………………. खैर मै जबसे दिल्ली आई हूँ यहाँ पर सड़क पर कई बार ये हाल देखा है ……………..लेकिन मैं घर आकर यही सोच रही थी लोग मजबूरो की मज़बूरी का कितना फ़ायदा उठाते है …….वो बिचारा गरीब था इसलिए उसकी कोई इज्ज़त ही नहीं थी ………..अगर यही गलती कोई और बड़ी गाडी वाला करता तब भी क्या वो जनाब ऐसे ही उस बड़ी गाड़ी वाले से बात करते , और वैसे भी ये भी तो सोचना चाहिए की वो बिचारा आपकी गाडी को ठीक कराने के लिए पैसे कहाँ से लाएगा और आप उससे अपनी अकड़ या पुलिस का डर दिखा कर पैसे ले भी ले लेते हो तो ये तो सोचो की उसका पूरा दिन कैसे गुजरेगा , और सिर्फ पूरा दिन ही नहीं महीने भर का बजट भी गड़बड़ हो जाएगा हो सकता है की उसके बच्चो को उस दिन खाना ही न मिले ……………और वैसे भी गाडी का बीमा तो होता ही है आपके लिए इतनी कोई बड़ी बात नहीं होगी गाडी में लगी खरोंच तो ठीक हो जाएगी पर उस बिचारे गरीब हाथ ठेले वाले को जो मानसिक पीड़ा आप के व्यवहार से पहुंचेगी वो कभी ठीक नहीं होगी ……………………… और सोचने वाली बात ये भी है की सुबह सुबह नौ बजे भी वो जनाब इतने गुस्से में थे……….. जबकि सुबह सुबह तो लोगो को तरो-ताज़ा और शांत चित्त रहना चाहिए क्योंकि सुबह तो हमारी दिन की शुरुआत होती है और अगर शुरुआत ही ऐसी होगी तो पूरा दिन कैसा निकलेगा ……………..अभी कुछ दिनों पहले मैंने निशाजी की एक रचना पढ़ी थी “सबसे सस्ता मानव जीवन” आज इस घटना को देखने के बाद मन ये सोचने को मजबूर हो गया की ये सच ही है ………..जिस तरह उस गाडी वाले जनाब ने हाथ ठेले वाले को धकिया के ठेल के गाडी में डाला था उसे देख के तो यही लग रहा था की आज उस महँगी गाडी की खरोंच से भी ज्यादा सस्ता हो गया है मानव जीवन……………….इंसान के मन में स्वयम की जाती के लिए कोई सम्मान नहीं रह गया है ……………..अगर हमें सम्मान चाहिए तो हमारे पास पैसा होना चाहिए , रिश्ते नाते झूठ बन कर रह जाते है अगर आपके पास पैसे न हो तो ………आज इंसान सबसे ज्यादा महत्व पैसे को और सिर्फ पैसे को ही देता है ………….. गली के कुत्ते को दुत्कार कर भगा दिया जाता है लेकिन वही कुत्ता जब किसी अमीर के घर में सोफे में बैठा होता है तो उसके बगल में बैठने से कोई परहेज़ नहीं किया जाता ……………खैर जब इंसान के मन इंसान के लिए ही इतनी संवेदनहीनता आ गयी है तो जानवरों की तो बात ही क्या करे ………………..पर इस पैसे की अंधी दौड़ में अंत में हमें कहाँ ले जाएगी ……..इस दौड़ में जीतेगा तो वही जो अंत तक इंसान बना रहेगा ………खैर और चाहे जो हो पर आज के बाद से वो हाथ ठेला वाला भूल के भी किसी बड़ी गाडी के बगल से निकलने की हिम्मत नहीं करेगा और निकलेगा भी तो ये गाना जरुर गुनगुनाएगा ” ऐ भाई जरा देख के चलो ” ……………….. आप सबको शुभ संध्या ……..

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26 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yamunapathak के द्वारा
May 26, 2012

priyajee,ऐसे लोग ये भूल जाते हैं की वक्त की मार उन पर भी पद सकती है.ऐसा होता भी है दयाहीन और मदांध व्यक्ति को जब इश्वर की चोट लगती है तो आंसू भी उस पर मेहरबान नहीं होते. पैसे का क्या हाथ की मेल है.पर इंसानियत स्थायी पूंजी है.आज मैं आपके ब्लॉग को ही पढ़ रही हूँ नए पुराने सब . शुक्रिया.

supriyo के द्वारा
May 2, 2011

आदरणीया प्रिया दीदी प्रणाम बहुत ३ उत्क्रिस्ट और ह्रदय स्पर्शी रचना ऐसी रचना के लिए आपका आभार प्रिय प्रिया दीदी हम अगर बाइक धीरे भी चलते है तो कोई तेज वाला ही हमें मार दे बहु ही बढ़िया blog धन्यवाद आपका भाई सुप्रिय

Mrityunjay के द्वारा
April 29, 2011

प्रिया जी, सादर प्रणाम। आजकल दिल्‍ली ही नहीं, सभी शहरों की प्राय: यही स्थिति है। आपने शायद देखा न हो, ट्रकों के पीछे लिखा रहता है- लटकल त गईल बेटा..। यानी देखकर चलो नहीं तो…।

    priyasingh के द्वारा
    April 29, 2011

    ट्रको के पीछे कई कई बार छोटी लेकिन बहुत गहरी बात लिखी हुई होती है ………….. लेकिन खुद वही ट्रक वाले ट्रेफिक नियमो की सबसे ज्यादा अनदेखी करते है ………..

Alka Gupta के द्वारा
April 29, 2011

प्रिया जी, आज जीवन की आपाधापी में अपने अन्दर की इंसानियत न जाने कहाँ लुप्त हो गयी है हर कोई अपने तक ही सीमित रह गया है भावनाओं की कोई कद्र नहीं है….गरीब हर तरह से कमज़ोर होता है और उसका शोषण भी….आज इंसान अपने इंसानियत के फ़र्ज़ से बिलकुल मुक्त सा होता जा रहा है….! उत्तम पोस्ट !

    priyasingh के द्वारा
    April 29, 2011

    यही सबसे बड़ी चिंता का विषय है की आज इंसान इंसान नहीं कुछ और होता जा रहा है ………….

    priyasingh के द्वारा
    April 29, 2011

    आपने पोस्ट को सराहा इसके लिए शुक्रिया आपका…………….

    yamunapathak के द्वारा
    May 26, 2012

    अल्काजी,नमस्कार आजकल आप हैं कहाँ?मैं तकनीक समस्या की वज़ह से किसी पोस्ट पर प्रतिक्रिया नहीं दे प् रही थी.आप की रचना की प्रतीक्षा में हूँ.

संदीप कौशिक के द्वारा
April 29, 2011

प्रिया जी, सादर अभिवादन | आपने जिस तरह से आज के समाज के \"कथित\" ऊपरी तबके की सोच को दर्शाया है, उसके लिए बधाई स्वीकारें | आज ज़िंदगी का मतलब सिर्फ खुद तक ही सिमट कर रह गया है, मानवता से इसका कोई सरोकार नहीं रह गया है | मुझे खुशी है कि एक बेहतरीन आलेख पढ़ने के साथ आज के दिन कि शुरुआत हुई |

    priyasingh के द्वारा
    April 29, 2011

    आपको आलेख अच्छा लगा इसके लिए शुक्रिया……………..

baijnathpandey के द्वारा
April 29, 2011

प्रिया जी, सादर नमस्कार सचमुच दिल्ली की आज ऐसी हीं हालत है ……सड़क पर सुरक्षित चलने के लिए चार ऑंखें चाहिए ……..साँझ ढले घर पहुँचने पर जी में जी आता है कि बच गए ………तिस पर औरों की मजबूरी न समझ कर लोग झगड़ते रहते है जितना जाम गाड़ियों कि भीड़ से होता है उससे कहीं ज्यादा आपस में लगे होड़ से होता है साथ ही नब्बे प्रतिशत लोंगो को ट्राफिक के नियम भी ठीक से पता नहीं होता एवं जिन्हें पता होता है उनके लिए वो मायने नहीं रखता | शायद, ऐसी बातों का समाधान सरकार के पास न हो, यह तो हर सभ्य सामाज को खुद हीं सीखना पड़ता है |

    priyasingh के द्वारा
    April 29, 2011

    बिलकुल सही कहा आपने यह तो हमें खुद ही सीखना होगा और शुरुआत हमें स्वयं से ही करनी होगी …………

rachna varma के द्वारा
April 29, 2011

प्रिया जी , दरअसल सडको पर इस तरह की घटनाये आम हो चुकी है यहाँ सच में हर अमीर आदमी किसी न किसी तरह गरीबो का शोषण करता ही रहता उसमे आप को जितना बन पड़ा आपने किया ही | बेहतरीन आलेख | धन्यवाद |

surendrashuklabhramar5 के द्वारा
April 28, 2011

प्रिय जी सुन्दर लेख पढने को मिला मानव जीवन सच में बहुत सस्ता है ये सिद्ध हो जाता है हर गली नुक्कड़ बस स्टैंड रेलवे प्लेटफार्म पर -आप ने भी देखा होगा -दिल दर्द से रो पड़ता है कुत्ते और गाय बैल जो रोटी छोड़ बढ़ जाते हैं उसे कुछ अभागे बेचारे उठा खाते हैं लोगों की दुत्कार गालियाँ सहते हैं किसी बड़ी दुकान के आस पास अपनी जीविका चलने के लिए अगर ठेला या जमीं पर ही बैठ गए तो पैर की ठोकर तक पा जाते हैं -बड़े लोग बड़े ही होते हैं जबान बड़ी कद बड़ा गाड़ी बड़ी -उनकी पहुँच बड़ी जेब में पैसे होते तो शायद वह उसे भी लूट ही लेता -न मिला तो डरा धमाका मार इज्जत ही कमा लेगा -पता नहीं कब ये हमारा पढ़ा लिखा सभी समाज अपनी राह पर आएगा ? सुन्दर लेख के लिए बधाई सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५

    priyasingh के द्वारा
    April 28, 2011

    ये बहुत बड़े सोच का विषय है की पढ़े लिखे होकर भी हम कितना गैर जिम्मेदाराना व्यवहार करते है ………किसी के पास तो लक्ष्मी जी की अपार कृपा है तो किसी के पास थोड़ी सी भी नहीं यही नियति का खेल है ………..आपने लेख को सराहा धन्यवाद आपका…………

Rajkamal Sharma के द्वारा
April 28, 2011

प्रियांका जी ….नमस्कार ! इस घटना से भी कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण आपके द्वारा उसको ब्यान करने का ढंग तथा अपना नजरिया ऊँचे दर्जे के विचारों के रूप में रखने के कारण यह लेख बढ़िया बन पड़ा है ….. बाकि जब मैंने आज तक खुद किसी कारनामे को पुरुष होकर अंजाम नहीं दिया है तो आदरणीय सिद्दीकी की तरह आपको दोष नहीं दिया जा सकता …. धन्यवाद

    Rajkamal Sharma के द्वारा
    April 28, 2011

    किरपा करके आदरणीय सिद्दीकी जी पढ़े

    priyasingh के द्वारा
    April 28, 2011

    आपने मेरी मजबूरी को समझा इसलिए आपकी शुक्रगुजार हूँ……… जब मै ये पोस्ट लिख रही थी तब मुझे लगा था की पढने वालो को लगेगा की लिखने वाले को कुछ करना चाहिए था .. …………. पर अपने कुछ न कर पाने की बैचनी को ही इस पोस्ट पर उतारा है……….आपकी बधाई के लिए आभार आपका…………..

Tufail A. Siddequi के द्वारा
April 28, 2011

प्रिया जी अभिवादन, बहुत सुन्दर पोस्ट है. मानव संवेदनाओं की घटती सीमाओं का सचित्र वर्णन किया है आपने. लेकिन आप गाड़ी वाली होते हुए भी उस गरीब के लिए शायद कुछ नहीं कर पायीं. केवल सोचने तक ही सीमित रह गयीं. इन सबसे उमड़ी भावनाओं को पोस्ट के रूप में व्यक्त कर आपने एक जागरूक समाज की इतिश्री कर दी. अमूमन हम लोग ऐसा ही करते हैं. उस गाडी वाले से यदि आप लोग आगे आ कर बात करते तो शायद मामला वही पर सुलट जाता और उस गरीब को एक संबल भी मिल जाता. घर आ कर सुखद अनुभव भी होता और फिर इन सब को पोस्ट के रूप में व्यक्त करतीं तो बात कुछ और ही होती. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. खैर…… पोस्ट पर बधाई.

    priyasingh के द्वारा
    April 28, 2011

    हाँ ये बात तो है………..घर आ कर मै भी यही सोच रही थी की मुझे गाड़ी से उतर कर कुछ करना चाहिए था ……पर मै थोड़ी झेंप गयी क्योंकि सुबह सुबह घर के कपड़ो में ही गाडी में बैठ कर चली गयी थी असल में मै जा नहीं रही थी पर मेरा सोलह महीने का बच्चा अपने पापा के साथ में जाने की जिद करने लगा, और ये घटना इतनी जल्दी में घटी और बीच बाज़ार में बच्चे को लेकर गाडी से उतरना ठीक नहीं लगा ……….और मेरे पतिदेव थोडा शांति पसंद व्यक्ति है …………..इसलिए आप कह सकते है की मैंने अपनी जागरूकता की इतिश्री इसी प्रकार की …………..लेकिन हाँ स्त्रीत्व सामाजिकता निभाने के चक्कर में सुखद अनुभव से जरुर वंचित रह गयी….

chaatak के द्वारा
April 28, 2011

प्रिया जी, उपरोक्त घटना मन में कई तरह के सवाल भी पैदा करती है और इंसान की ख़त्म हो रही संवेदनशीलता की ओर भी इशारा करती है. ये एक ऐसी घटना है जिसकी हर व्यक्ति भर्त्सना करेगा. एक और संस्मरण है- कुछ दिन पहले मैंने एक पोस्ट लिखी थी ‘लोकतंत्र पर हावी धनपशु’ ये उन्ही इलेक्शन हार चुकी महिला के साथ हुई घटना है. उनके पति एक ठेकेदार है और मेरे मित्र भी और उनका घर मेरे घर से ५० मीटर की दूरी पर है. बीच में एक ऐसा मकान है जिसमे कई कमरों में रिक्शे, ठेलेवाले और मजदूर रहते है. एक रिक्शे वाला हर रोज शराब पी कर शाम को आता है और वह उनके घर के पास पहुँच कर भद्दी बाते और गालियाँ देता है और सुबह उनसे प्रणाम करता है यानी शराब की मदहोशी का शुद्ध बहाना! परेशान होकर एक दिन उन्होंने रिक्शे वाले को शाम को रोका और और उनके ड्राइवर ने बाकायदा उसकी आरती उतार दी. बस तबसे उसे एक नया बहाना मिल गया अब शराब पी कर वह रास्ते भर अनर्गल तिप्प्दियाँ करता चलता है. पुलिस में कम्प्लेन का कोई फायदा नहीं क्योंकि पुलिस भी उसी शराबी को पकडती है जिसके जेब में नोट हों. मेरे कहने का मतलब संवेदनहीनता हर तबके में मौजूद है इसका पैसे या रुतबे से बहुत कम सम्बन्ध है. अच्छी पोस्ट पर एक बार फिर बधाई!

    priyasingh के द्वारा
    April 28, 2011

    सही कहा आपने चातक जी ………..संवेदनहीनता हर तबके में मौजूद है लेकिन पैसे वाले हर प्रकार से सुखी संपन्न होते है और इसलिए जब ऐसी कुछ घटना होती है तो उनसे ये उम्मीद की ही जती है की पैसे के नुक्सान से वो इतना न परेशान हो ………..बधाई के लिए शुक्रिया आपका…………

Vivekinay के द्वारा
April 28, 2011

प्रियाजी नमस्कार, हम इंसानों के बीच खो रही इंसानियत, संवेदना को जाग्रत करने के लिए आपका बहुत बहुत आभार

    priyasingh के द्वारा
    April 28, 2011

    शुक्रिया आपका…………

allrounder के द्वारा
April 28, 2011

प्रिया जी नमस्कार , संवेदनहीन होती मानवता का एक और जीता – जागता उदाहरण आपके इस आलेख से मिलता है ! हो सकता है जो शख्स उस गरीब ठेले वाले को घसीट कर गाडी मैं डाल कर ले गया वह शाम को मौज मस्ती के नाम पर हजारों खर्च कर देता हो किन्तु यदि किसी गरीव से कोई गलती हो गई तो मानवता के नाते दरियादिली दिखाते हुए चंद रुपये माफ़ नहीं कर सकता ! सचमुच कठोर से कठोरतम होती जा रही मानवता को उजागर करती ये घटना कई प्रश्न छोड़ जाती है जो की मन मैं वेदना उत्पन्न करते हैं !

    priyasingh के द्वारा
    April 28, 2011

    हाँ वही तो सबसे बड़ी बात है इंसान अपनी अकड़ में की मेरी गाडी को छुआ कैसे इस भाव में आकर हर चीज़ भूल जाता है …………..हम और आप यह वेदना महसूस कर लेते है पर कोई और क्यों नहीं कर पाता…….


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