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"एक वाकया"

Posted On: 13 May, 2011 Others में

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साहिर जी की एक ग़ज़ल आप सबके लिए…………… कालेज के दिनों में नोट की थी अपनी डायरी में ……..नोट करते वक्त उर्दू के शब्दों को मैंने हिंदी के समझ आने वाले शब्दों में नोट किया था इसलिए जिन्होंने साहिरजी को पढ़ा होगा उन्हें कुछ अलग ग़ज़ल लगेगी……………


अंधियारी रात के आँगन में ये, सुबह के कदमो की आहट


ये भीगी भीगी सर्द हवा, ये हलकी हलकी धुंधलाहट


गाडी में हूँ तनहा, यात्रा मगन और नींद नहीं है आँखों में


भूले बिसरे रूमानो के, ख्वाबो की ज़मीं आँखों में


अगले दिन हाथ हिलाते है, पिछली पीतें याद आती है


ख़ोई हुई खुशिया आँखों में, आंसू बनकर लहराती है


सीने के वीरान कोनो में, एक टीस सी करवट लेती है


नाकाम उमंगें रोती है, उम्मीद सहारे देती है


वो राहे ज़हन में घूमती है, जिन राहो से मै आज आया हूँ


कितनी उम्मीद से पहुंचा था कितनी मायूसी लाया हूँ ….

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13 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

nishamittal के द्वारा
May 16, 2011

सुन्दर ग़ज़ल से परिचित करने के लिए आभार.

Dayal Singh Bhandari के द्वारा
May 14, 2011

साहंब जी फिसलने वालौ के सात पले बडे है फिसलेगे ही अब ऊनका गरीबो के वहा खाना खाने का सीजन आ रहा है कययो की चुनाव आ रहे है  लेकिन इनको  इतना सर पर    किसने चडाया हमारी ही गलती है नही तो ये पूरे देस मै सबसे काबील है.  धनयवाद  

    Dayal Singh Bhandari के द्वारा
    May 14, 2011

    sir can i rely any body, any organisation any government weather it is state or centre they are happy bcz they won the election. please change the system to live every body free and fair. How common man are live these days. Thanking You

Tufail A. Siddequi के द्वारा
May 14, 2011

प्रिया जी अभिवादन, अंधियारी रात के आँगन में ये, सुबह के कदमो की आहट ये भीगी भीगी सर्द हवा, ये हलकी हलकी धुंधलाहट…………… बहुत सुन्दर ग़ज़ल. http://siddequi.jagranjunction.com

वाहिद काशीवासी के द्वारा
May 14, 2011

प्रिया जी , इतने सुन्दर गीत का पुनः स्मरण करवाने के लिए आपको हार्दिक धन्यवाद| साहिर साहिब की अपनी एक अलग ही हस्त एक अलग ही मुक़ाम था| किसी पुराने वक़्त में पहुंचा दिया आपने मुझे भी अपने साथ-साथ, शुक्रिया फिर से,

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    May 14, 2011

    कृपया हस्त को हस्ती पढ़ें..।

    kraant के द्वारा
    May 14, 2011

    प्रिया जी बेहद उम्दा तरीके से साहिर साहब ने अपने जज़्बात रखे हैं इस कविता में जो की हर पंक्ति में अलग अनुभूति लिए हैं और उन्हें बहुत ही अच्छी तरह से आपने सामने रखा है, समक्ष रखने के लिए बहुत धन्यवाद

Rajkamal Sharma के द्वारा
May 13, 2011

प्रियांका जी ….नमस्कार ! आज साहिर जी के नाम से कौन परिचित नहीं है , लेकिन मेरे समेत ज्यादातर लोगों ने उनके लिखे हुए बोलो पर गाये हुए गीत ही सुने है …..उम्मीद और मायूसी का अनोखा संगम ….. वाकई में आपने इस नज्म के द्वारा सराहनीय कार्य किया है और उससे भी कहीं ज्यादा डायरी लिखने की उपियोगिता की सिद्द करके बधाई

Alka Gupta के द्वारा
May 13, 2011

प्रिया जी, बहुत बढ़िया ग़ज़ल है मंच पर प्रस्तुत करने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया !

संदीप कौशिक के द्वारा
May 13, 2011

प्रिया जी, साहिर जी को मैंने ज्यादा तो नहीं पढ़ा लेकिन उनकी इस रचना को आपने यहाँ रखकर निश्चय ही एक सराहनीय काम किया है | शब्द-दर-शब्द एवं पंक्ति-दर-पंक्ति अंदर तक चुभती हुई सी प्रतीत होती यह ग़ज़ल वास्तव में बहुत गहरे अर्थ लिए हुए है | निम्न पंक्तियाँ तो बस….. . अगले दिन हाथ हिलाते है, पिछली पीतें याद आती है ख़ोई हुई खुशिया आँखों में, आंसू बनकर लहराती है… . . साभार… http://sandeepkaushik.jagranjunction.com/

    संदीप कौशिक के द्वारा
    May 21, 2011

    प्रिया जी, ये तो मुझ नादान का का अहो-भाग्य है कि मेरे प्रयास आपके दिल को छू जाते हैं | बस यही कोशिश रहती है कि जिंदगी में जो महसूस करूँ उसी को शब्दों में ढाल दूँ | हाँ, आपकी बातों से मैं भी इत्तेफाक़ रखता हूँ कि रिश्तों में न बोलना निश्चय ही उनकी बलि ले लेता है | एक बात और….मेरी हर रचना पर आपकी प्रतिक्रियाएँ भी गहराई से लिखी हुई-सी प्रतीत होती हैं | कुछ प्रतिक्रियाओं के जवाब में भी मैंने आपसे प्रतिक्रिया मांगी है, अगर आप कृप्या कुछ समय निकाल कर…. आभार सहित पुनश्च धन्यवाद !!

surendrashuklabhramar5 के द्वारा
May 13, 2011

प्रिया जी बहुत सुन्दर भाव -साहिर लुधियानवी की गजल है क्या आप ने रूपांतर किया ? गुन गुनाने का मन करता है – नाकाम उमंगें रोती है, उम्मीद सहारे देती है लेकिन निम्न नहीं समझ आया कृपया समझाएं – पिछली पीतें याद आती है सुन्दर रचना के लिए धन्यवाद

Aakash Tiwaari के द्वारा
May 13, 2011

प्रिय जी बहुत ही खूबसूरत रचना hai … कितनी उम्मीद से पहुंचा था कितनी मायूसी लाया हूँ …. kya baat kahi hai … Aakash


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