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बचपन के दिन भी क्या दिन थे...

Posted On: 24 May, 2011 Others में

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एक दिन रजिया जी की रचना पढ़ते ही मन भाव-विभोर हो गया ………..उनकी लिखी पंक्तियों में वो अपने घर का रास्ता बयान कर रही थी और मुझे ऐसा लगा जैसे मै अपने बचपन में पहुँच गयी हूँ अपने गाँव पहुँच गयी हूँ ……………..मुझे हमेशा से ऐसा महसूस होता है की जिसने भी गाँव नहीं देखा उसने जीवन को करीब से नहीं देखा ……… पहले मै इस बात को कभी इतने दिल से महसूस नहीं करती थी पर आज दिल्ली जैसे महानगर की भागदौड़ वाली ज़िन्दगी में आकर इस बात को कहने को मजबूर हो गयी हूँ….. वो गाँव की सुकून भरी ज़िन्दगी ……उफ़ उन पलो को याद करते ही कितनी ख़ुशी मिल रही है ………डैडी की नौकरी की वजह से हमने मध्यप्रदेश के कई शहरो की सैर की है ……. और अब शादी के बाद दिल्ली और भी कई शहरो की …………लेकिन दिल में आज भी गाँव में बिताये हुए दिनों की याद ताज़ा है ………जैसे ही परीक्षा ख़त्म होती थी मई और जून दो महीने की छुट्टिया बिताने हम अपने गाँव पहुँच जाया करते थे …….उस वक्त डैडी के ऊपर बड़ा गुस्सा आया करता था की लोग गर्मी की छुट्टियों में कहीं बाहर किसी अच्छी जगह घुमने जाया करते है और डैडी छुट्टिया शुरू होते ही हमें गाँव छोड़ आया करते थे ………लेकिन अब लगता है की अच्छा ही था जो हम गाँव जाया करते थे ………. हमारे साथ साथ चाचा जी और उनके बच्चे, फुआ जी और उनके बच्चे सब लोग इक्कट्ठे हो जाया करते थे , सबके आ जाने से हम भाई बहनों की अच्छी खासी मंडली बन जाया करती थी …………और फिर हमारी धमाचौकड़ी शुरू हो जाया करती थी ……..फिर वो चाहे गर्मी की जलती हुई दोपहर ही क्यों न हो हर वक़्त बस खेलना घूमना ………..और खाना ………..क्या गर्मी क्या धुप कोई भी बात हमारे खेल कूद में अंकुश नहीं लगा पाती थी…हमारा गाँव का घर बहुत बड़ा है ………और उसका आँगन और भी बड़ा …..आँगन के बीच में छोटा सा मंदीर बना हुआ है और उसी मंदीर से सटा हुआ रातरानी का पेड़ ……….उस रातरानी की खुशबू आज भी मन में बसी हुई है ………उस वक़्त गाँव में न तो कूलर न ही ए. सी., रात को आँगन में एक लाइन से चारपाई लग जाती थी और वहीँ पर सारे लोग सोते थे मम्मी लोगो की चारपाई मंदिर के पीछे लगाई जाती थी बब्बा जी लोगो से परदे की वजह से …….. फिर रात के आठ बजते ही हम सारे बच्चे चारपाई में नानी (अपने डैडी की दादी को हम नानी कहते थे) को घेर लेते थे फिर वो हमें या तो कहानी सुनाया करती थी या फिर पहेलियाँ बूझा करती थी , कभी अपने जमाने की बाते भी बताने लगती थी ………और चाचाजी लोग आकर भूतो की कहानिया सुनाने लगते थे जिसे वो सत्य घटना बताया करते थे , जैसे की फलां आम के पेड़ में चुडेल है बगीचे के बरगद के पेड़ में चुडेल रहती है , वगैरह वगैरह ……..ये सब सुनते सुनते रात की बियारी( डिनर) का समय हो जाता था और फिर चिडियों की चहचाहाहट से नींद खुलती थी लेकिन फिर भी उठते नहीं थे जब तक दादी चिल्ला चिल्ला कर थक नहीं जाती थी ….फिर कुँए में जाकर मंजन होता था लाल दन्त मंजन ……..दादी लोग तो नीम की दातौन करती है जिसकी वजह से आज भी उनके दांत सही है और हमें हर छः महीने में दातो के डाक्टर के पास जाना पड़ता है…….उसके बाद हम लोग बतियाते हुए दुआरे(घर के बाहर) बैठे रहते थे , फिर कलेवा खाने के लिए बुलाया जाता था जिसमे अक्सर बटुए में बनी हुई खिचड़ी, होती थी वो भी इतनी स्वाद होती थी की बार बार लेकर खाते थे ……….और अब तो ये हाल है की किसी को खिचड़ी के लिए पूछो तो कहते है की खिचड़ी तो बीमारों का खाना है, कोई भला चंगा इंसान भी क्या उसे खाता है………और उसके बाद मंदिर के पीछे वाले दक्खिन घर में पहुँच जाते थे आम खाने……गाँव के घर में कई कमरों के नाम दिशाओं के हिसाब से बोले जाते थे जैसे दक्षिण दिशा में दो कमरे थे जिनमे अनाज वगैरह रखा जाता था उसे दक्खिन घर और एक पश्चिम घर था जिसमे मम्मा(दादी) घी, दूध,मट्ठा, अचार, और मिठाई वगैरह रखती थी पर उसमे जाने की मनाही थी वो ही निकाल के दे सकती थी किसी को भी इजाज़त नहीं थी उनके पश्चिम घर में जाने की……….इन कमरों के बारे में बताते बताते मुख्य बात तो रह गयी …आमो की बात …..उफ़ वो रसीले मीठे आम ….और सबसे बड़ी बात, कितने सारे आम कितने भी खाओ कोई गिनती नहीं, कोई चिंता नहीं….. हमारे घर के पीछे पूरा बगीचा ही आम का था दुसरे फलो के भी पेड़ थे पर सबसे ज्यादा आम के ही पेड़ थे……सुबह भी आम खाते थे फिर पूरी दोपहर आम खाते थे . ….एक बार में चार पांच आम तो खा ही लेते थे …..अब वो आम खाने में कहाँ मज़ा आता है एक तो इतने महंगे है आम ……और फिर कैसे भी करके खरीदो तो वो गाँव के आमो जैसा स्वाद उनमे कहाँ आता है …….और अमावट जिसे शहर की भाषा में आम पापड कहते है उसका स्वाद भी कहाँ दुकानों से ख़रीदे आम पापड़ में आता है ……… इन दुकानों की चका चौंध में दिखावे में हर चीज़ का स्वाद गुम होता जा रहा है……बस दिखाई देता है चमकते हुए कागजों में बंद सामान जिसमे सब कुछ बनावटी …स्वाद भी ………… हमने तो फिर भी कुछ असली चीजों का स्वाद चखा है ……लेकिन हमसे आगे आने वाली पीढ़ी तो पिज्जा बर्गर में ही गुम होकर रह जाएगी क्या उन्हें कभी हमारी देसी चीजों का स्वाद पता चल जाएगा ……….फिशर प्राइज़ के खिलोने क्या कभी अपने खुद के हाथो से बने मीट्टी के खिलोनो का मुकाबला कर पायेंगे …………जिस गाय के गोबर से हमारे गाँव के घरो को लिपा जाता था उसी गाय के गोबर को देखते ही आज की पीढ़ी मुह बना कर नाक बंद कर लेती है….. हम लोग बरगद के पेड़ की सबसे ऊँची डाल पर झूला बाँध कर झूलते थे, गाँव के तालाब के किनारे और खेतो में दौड़ दौड़ कर जो खेल खेला करते थे उन खेलो का, बंद कमरों में बैठ कर कम्पूटर के सामने खेले जाने वाले खेलो से क्या कोई मुकाबला है …….पर क्या इसमें आज की पीढ़ी की गलती है नहीं इसमें गलती तो हमारी है ……….उनकी छुट्टिया होते ही हम उन्हें समर कैंप में भेज देते है या फिर किसी हिल स्टेशन में घुमाने लेकर चले जाते है ……….क्योंकि अब हम खुद ही बिना सुविधाओं के नहीं रह पाते है ………..और गाँव में भला शहर जैसी सुविधाए कहाँ बस ये सोचकर गाँव जाने का प्रोग्राम बनाते ही नहीं …….जबकि गाँव जाकर हम वो सीख सकते है जो हमें कोई समर केम्प नहीं सीखा सकता ………….. सादगी, भोलापन , बड़ो का सम्मान, अपनों से प्यार, प्रकृति से लगाव ये सब हम वहाँ से सीख सकते है……….गाँव में बीताये हुए वो बचपन की यादे अभी भी मेरे ज़ेहन में यं ताज़ा है जैसे कल ही की बात हो ………चूल्हे में बने हुए खाने का स्वाद , वो कुँए का मीठा पानी सब कुछ मन में बसा हुआ है ……….. आज भी जब जगजीत सिंह की इस ग़ज़ल को सुनती हूँ तो आँखे नम हो जाती है …..“ये दौलत भी ले लो ये शोहरत भी ले लो, भले छिन लो मुझसे मेरी जवानी, मगर मुझको लुटा दो वो बचपन का सावन, वो कागज़ की कश्ती वो बारिश का पानी……….कड़ी धुप में अपने घर से निकलना, वो चिड़िया वो बुलबुल वो तितली पकड़ना, वो गुडिया की शादी में लड़ना झगड़ना, वो झूलो से गिरना वो गिर कर संभलना, ना दनिया का ग़म था न रिश्तों का बंधन, बड़ी खूबसूरत थी वो जिंदगानी…….. सच बड़ी खूबसूरत थी वो जिंदगानी ……….. “

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37 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

abhilasha shivhare gupta के द्वारा
May 7, 2012

प्रिय जी…बधाई…बहुत सुन्दर लेख के लिए…आपका लेख पढ़कर मैं कब आपने बचपन में पहुँच गयी मुज्झे पता ही नहीं चला…. आपका एक-एक शब्द जसे मेरे मन के भावो की व्याख्या कर रहा है..मेरा बचपन भी ऐसा ही था… पिता के जॉब के कारन, पूरे मध्य प्रदेश का भ्रमण….वो नानी का गाँव …गर्मियों की छुट्टिय…. वही आँगन, वही मकान, वही कहानिया, वही आँगन में चारपाई… सब कुछ वैसा ही…सच ये बचपन….. ऐसा मन करता है, की काश वो दिन कुछ दिनों के लिए ही सही, लौट आते…. मै अम्रेरिका में रहती हूँ…फिर भी, जब कभी भी इंडिया आती हूँ,. एक हफ्ते के लिए, नानी गॉव ज़रूर जाती हूँ… सच , जिसने गॉव नहीं देखे ..उसने बचपन नहीं देखा….आपका लेख पढ़कर साड़ी यादे ताज़ा हो गयी..धन्यवाद..

Sumit के द्वारा
January 13, 2012
rajkamal के द्वारा
June 4, 2011

आज बहुत ही मुश्किल से आपके ब्लाग पर पहुंचना हुआ …… कांटेस्ट में आपकी चयनित पोस्ट द्वारा यहाँ पहुँच पाना संभव हुआ ….. आप की लेखनी में दिनोदिन आ रहे सुधार तथा उन्नति की तरफ यह लेख साफ़ -२ इशारा कर रहा है …… लेकिन इस लेख में एक बात खटकी आप कभी मंदिर के भीतर नहीं गए , पूजा पाठ नहीं किया या फिर उन सब बातो का जिक्र ही नहीं किया इस एक बात के इलावा बाकि सब कुछ ही बेतरीन बन पड़ा है बधाई

    priyasingh के द्वारा
    June 6, 2011

    आजकल जागरण में मुश्किलें ही मुश्किलें है एक तो किसी का ब्लॉग पेज भी मुश्किल से खुलता है और फिर उसमे कमेन्ट देना तो और मुश्किल है ……………..मंदिर की पूजा ही नहीं और भी कई बातो का जिक्र भूल गयी हूँ ……….हम लोग अक्सर मंदिर में तभी जाते थे जब दादी अपनी पूजा खत्म कर प्रसाद बांटने वाली होती थी …….उस प्रसाद को पाने के लिए हाथ पसार कर खड़े हो जाते थे ………..वैसे अगर दादी कहती थी तो शाम का दीपक भी जला देती थी और अक्सर मंदिर की सफाई भी करती थी …………आपको अच्छा लगा इसके लिए शुक्रिया…………आप लोगो के प्रोत्साहन से ही लेखनी में सुधार हो रहा है ………….

शिवेंद्र मोहन सिंह के द्वारा
June 3, 2011

एक जीवंत सी तस्वीर खीच दी आपने, अभी दो तीन दिन पहले ही सुबह के वक्त ये पूरी पिक्चर मेरे दिमाग में घूम रही थी, मैं सोच रहा था मेरे बाद की पीढ़ी ने तो गाँव को खो दिया, शायद मैं बहुत भाग्य शाली था जो मुझे गाँव का आँचल मिला. बहुत बहुत बधाई एक जीवंत पिक्चर के लिए. सादर

    priyasingh के द्वारा
    June 6, 2011

    आपको अच्छा लगा इसलिए शुक्रिया…………..

allrounder के द्वारा
June 1, 2011

प्रिया जी, नमस्कार अपनी बचपन की यादें यहाँ साझा करके आपने लगभग सभी को अपने बचपन मैं पहुंचा दिया और मैं भी उनमे से एक हूँ ! बेहतरीन आलेख पर हार्दिक बधाई !

    priyasingh के द्वारा
    June 6, 2011

    बचपन होता ही ऐसा है की हर कोई मुड़ मुड़ कर उन यादों में झंकाना चाहता है …………शुक्रिया आपका

वाहिद काशीवासी के द्वारा
June 1, 2011

प्रिया जी, जड़ों से जोड़ती आपकी ये रचना सोचने पर मजबूर कर देती है| जिस अंदाज़ में आपने पेशगी की है और ठेठ शब्दों को वाक्यों की लड़ियों में पिरोया है वो सचमुच बहुत पसंद आया| एक बात जो मुझे सबसे ज़्यादा पसंद आई वो ये कि हम सब बचपन में सोचते थे कि क्यूँ पापा हर छुट्टियों में हमें कहीं और न ले जाकर गाँव क्यूँ ले जाते हैं| आज सोचता हूँ तो समझ आता है कि अगर ऐसा न हुआ होता तो अपनी मिट्टी की सौंधी खुशबू मैं कभी महसूस ही नहीं कर पाता|आज जिस तरह से हम अपने मूल से ही कटते चले जा रहे हैं जो हमारी परम्पराएँ हमें सिखाती हैं| अत्यधिक व्यस्त हूँ पर आपके लेख का शीर्षक देख कर फिर उसे पढ़ कर कमेन्ट किये बिना नहीं रह पाया| वो बचपन जो कहीं पीछे छूट गया है मगर सीने में आज भी उसी ताज़गी के साथ ज़िंदा है उस पर चढ़ी धूल की परतें उतारने के लिए हार्दिक आभार आपको,

    priyasingh के द्वारा
    June 6, 2011

    आपकी रचनायो के साथ साथ आपकी आवाज़ की कमी भी खल रही है …………आशा है अपनी व्यस्तता से कुछ समय निकाल कर हमारे लिए जरुर कुछ लेकर आयेंगे ………….आपको मेरी यादे अछि लगी इसके लिए शुक्रिया…………

narayani के द्वारा
May 26, 2011

नमस्कार प्रिया जी आपने गाँव का चित्र जीवंत कर दिया ,आपका लेख पढ़ते पढ़ते में भी अपने दादा के घर गाँव की सैर कर आई सचमुच गाँव की जिन्दगी का मजा ही कुछ और है धन्यवाद नारायणी

    priyasingh के द्वारा
    May 27, 2011

    मेरी यादे आपको अछि लगी इसके लिए शक्रिया………….

Abdul rashid के द्वारा
May 26, 2011

बेहतरीन लेख लेकिन आने वाले समय में कहीं आधुनिकता का रोग गांव मे भी न फैल जाए। http://singrauli.jagranjunction.com/

    priyasingh के द्वारा
    May 27, 2011

    हाँ ये बात तो है ………धीरे धीरे गाँव भी आधुनिक होते जा रहे है लेकिन फिर भी वहाँ की हवा में थोड़ी तो ताज़गी है ……….

RaJ के द्वारा
May 26, 2011

प्रिया जी , मध्य प्रदेश के जिलों सागर , टीकमगढ़ , दमोह , शिवपुरी, आदि से मैं भी बहुत परिचित रहा हूँ खुद उत्तर प्रदेश के गाँव से दादाजी के समय निकल आने पर उस समय के हिसाब से बड़ी छोटी फॅमिली होने कारन गाँव तो छुट गया पर आपकी तरह ही सर्विसे वाले परिवार का हिस्सा होने कारण दर्जनों उत्तर प्रदेश व् मध्य प्रदेशों में रहा और शिक्षा भी हर दो साल बाद नए नए छोटे मझोले शहरों से लेकर लखनऊ आगरा सब जगह हुई बचपन की यादें बड़ी मीठी होती है और जो ग़ज़ल आपने रचना के अंत में शामिल की वह दिल को जाने कैसा कर देती है | मैं अपनी टूटी फूटी रचनाओं में अक्सर अपना पुराना समय ढूंढता रहता हूँ | श्रेष्ठ रचना के लिए बधाई

    RaJ के द्वारा
    May 26, 2011

    for my poems kindly visit http://www.jrajeev.jagranjunction.com

    priyasingh के द्वारा
    May 27, 2011

    आप भी इन शहरो की सैर कर चके है जान कर अच्छा लगा …………….बधाई के लिए शुक्रिया ……..

roshni के द्वारा
May 25, 2011

प्रिय जी बचपन के वोह दिन तो भुलाये से नहीं भूले जा स्क्कते .. जिन्दगी का सबसे अच्छा समय होता है ये बचपन बचपन के दिन याद krata hua sunder आलेख बधाई

    priyasingh के द्वारा
    May 26, 2011

    आपको आलेख अच्छा लगा इसके लिए शुक्रिया आपका……….

alkargupta1 के द्वारा
May 25, 2011

प्रिया जी, आपके इस लेख को पढ़ते-पढ़ते अपने बचपन की यादों में खो गयी…… कभी-कभी ऐसा लगता है हमने आज बहुत कुछ अपने पीछे छोड़ दिया है……! उस समय का अपनापन , रिश्ते की मधुरता आपसी प्यार की भावना में एक अलग ही सुखानुभूति थी जो आज के बदलते परिवेश में कदापि संभव ही नहीं है ! बहुत बढ़िया आलेख के लिए बधाई !

    priyasingh के द्वारा
    May 26, 2011

    जब तक आप आर हम अपनी यादो में इन भावनायो को समेटे है तब तक ये सुखानुभूति नहीं खत्म होगी ………. आपको आलेख अच्छा लगा इसलिए शुक्रिया ………..

संदीप कौशिक के द्वारा
May 25, 2011

प्रिया जी, एक बेहतरीन आलेख !! आपका हार्दिक धन्यवाद !! पढ़कर मानो बचपन की यादें ताज़ा हो गयी | हालांकि मेरी उम्र अभी इतनी नहीं है कि मैं जमानों पहले की बात करूँ, लेकिन पिछले दस सालों में लोगों के दृष्टिकोण एवं जीवन शैली में इतना बदलाव आ गया है कि बस…..!! मुझे भी ग्रामीण जीवन-शैली बहुत पसंद है | अभी कुछ दिनों पहले ही हम भी सपरिवार शहर में आए हैं, लेकिन मेरा आने का मन नहीं था | तो इस बात पर घर वालों का तर्क था कि आज नहीं तो कल….बाहर तो जाना ही पड़ेगा, और तुमने तो इंजीनियरिंग की है तो तुम्हें घर पे कौन रहने देगा | :( अब भी मन अनमना-सा ही रहता है | शायद इन सब चीजों के पीछे भौतिकतावादी सोच एवं एकाकी परिवारों के प्रति बढ़ता रुझान है | :(

    priyasingh के द्वारा
    May 26, 2011

    कुछ बाते ऐसी हो ही जाती है की हमें गाँव को छोड़ना ही पड़ता है बेहतर पढ़ाई, बेहतर नौकरी के लिए …….. लेकिन जब तक हमारा बचपन हमारे यादो में है तब तक गाँव भी हमारे मन में बसा हुआ है ………..आपको आलेख अच्छा लगा इसके लिए शुक्रिया……….

    संदीप कौशिक के द्वारा
    May 26, 2011

    बिल्कुल सही कहा आपने…..कुछ कारणवश हमें गाँव छोडना ही पड़ता है….लेकिन वहाँ की यादें ज़हन से नहीं मिटानी चाहिए….और न ही गाँव के प्रति हीन-भावना रखनी चाहिए |

surendra shukla bhramar 5 के द्वारा
May 25, 2011

प्रिया जी बहुत सुन्दर -देवी की कृपा से या आप की कृपा कहिये आनंद आ गया हम भी बचपन से किशोरावस्था के बीच खो गए जब हम गाँव में रहते थे- सच लोग छुट्टियों में आम खाने आते थे जमावड़ा -मजा मस्ती -बच्चों के साथ -आम बीनते बीनते बोरी भर हम थक- ऊब जाते थे- पीपल की छाँव बगिया कोयल की कूक -और वही सब जो आप ने ग्राम दर्शन कराया -वो रिश्ते प्यार अब कहाँ -बदल जा रहा सब कुछ – हम आभारी है आप के बहुत बहुत धन्यवाद आपका ,निम्न बहुत प्रिय लगा .आँगन के बीच में छोटा सा मंदीर बना हुआ है और उसी मंदीर से सटा हुआ रातरानी का पेड़ ……….उस रातरानी की खुशबू आज भी मन में बसी शुक्ल भ्रमर ५

    priyasingh के द्वारा
    May 25, 2011

    सही कहा आपने अब सब कुछ बदल रहा है रिश्तो पर पैसो की चमक हावी हो रही है ……….लेकिन उम्मीद है की जब तक बड़े-बुजुर्गो के दिए संस्कार जीवित रहेंगे हमारे मन में तब तक सब कुछ नहीं बदलेगा कुछ तो वही पुरानी यादो सा रहेगा ……………आपको अच्छा लगा इसके लिए शुक्रिया………

Tufail A. Siddequi के द्वारा
May 25, 2011

प्रिया जी सादर अभिवादन, बहुत सुन्दर संस्मरण. यादें ताज़ा हो गयी. शहरों से दूर भागने का मन हो रहा है. बधाई. http://siddequi.jagranjunction.com

    priyasingh के द्वारा
    May 25, 2011

    गाँव की मिटटी की सोंधी महक में है ही इतना असर की शहर की चका चौंध उसे रोक ही नहीं सकती …… प्रतिक्रया के लिए शुक्रिया आपका………….

Nikhil के द्वारा
May 25, 2011

बचपन के दिनों कि याद ताज़ा करती एक सुन्दर रचना के लिए बधाई.

    priyasingh के द्वारा
    May 25, 2011

    शुक्रिया आपका….

Aakash Tiwaari के द्वारा
May 25, 2011

प्रिया जी, मै भले ही आपसे बहुत ही छोटा हूँ..लेकिन आपने अभी जो भी लिखा बस यही सोच रहा था की आपकी उस मंडली में मै भी रहा था..जो आज बहुत पछता रहा है इस शहर की भागदौड़ की ज़िन्दगी से….मेरा गाँव जहा मेरे दादा दादी रहते है वो घर 200 लोगों का सम्मिलित परिवार है आज भी वहा सब एक है आप समझ सकती होंगी की इतने बड़े परिवार में सबके बीच कितना प्यार होगा और ऐसी जगह रहना कितना सुखद..मेरे ननिहाल में हम अपने नाना -नानी-मामा-मामी के इकलौते भांजे थे बहुत प्यार मिलता था मिलता है.. मगर अफ़सोस आज आपका ये लेख पढ़कर मै रो पड़ा पिछले 8 -10 सालो में ज़िन्दगी बहुत बदल गयी..मेरी ज़िन्दगी में एक ऐसा तूफ़ान आया की …….अब कुछ भी नहीं लिख सकता….. बहुत अकेला हूँ.. आपके लेख को सलाम.. ***************************** एक अकेला आकाश तिवारी *****************************

    priyasingh के द्वारा
    May 25, 2011

    आप ने स्वयं ही कहा की आपके परिवार में दो सौ लोग है और सबके बीच बहुत प्यार है फिर भी आप अपने आपको अकेला क्यों समझ रहे है …………जब तक आप अपने दुःख अपने गम में डूबे रहते है तब तक आप यही सोचते है की आपसे ज्यादा दुखी कोई नहीं है आपका दुःख ही सबसे बड़ा है, जो भगवान् ने आपसे छीना वो उसे नहीं करना चाहिए था ………. लेकिन आप जैसे ही थोड़ी देर के लिए ही नज़र उठा कर देखते है तो आप पाते है की दुनिया में ऐसा बहुत कुछ हुआ है जिससे हर कोई आहत है दुखी है ………और जैसे ही आप उनके आंसू पोंछ देंगे आपको लगेगा की धीरे धीरे आपका दुःख कम हो रहा है ………..दुखी रहना पछताते हुए रहना, अकेले रहना बहुत आसान है ………..मुश्किल है उस दुःख को अपने में समेट के सबके साथ खुश रहना ………..ऐसा मत सोचियेगा की मई आपको प्रवचन सूना रही हूँ स्वयं के अनुभव से कह रही हूँ …….यहाँ हर किसी ने अपनी ज़िन्दगी में कुछ न कुछ अनमोल खोया है ………..लेकिन ज़िन्दगी में जैसे हम अपने दुःख को भुला कर आगे बढते है ज़िन्दगी हमें कुछ और ख़ास चीज़ दे देती है ……….आशा करती हूँ आगे आप रोये तो वो आपके ख़ुशी के आंसू हो …………………

    Aakash Tiwaari के द्वारा
    May 26, 2011

    प्रिया जी, मैं इस ब्लॉग से जुड़ा हूँ सिर्फ इसलिए ताकि जो बाते मै किसी से नहीं कह पाता यहाँ शेयर कर लेता हूँ…. मै अपनों के बीच बहुत ही हंसने और हसाने वाला लड़का हूँ…कभी किसी के सामने मै आंसू नहीं बहाता..बस सबके लिए ही जिए जा रहा हूँ,….मुझे बहुत डाक्टरों ने बहुत समझाया लेकिन कुछ नहीं बदल पाया/…..अगर आप मुझे कुछ समझा रही है तो मुझे बहुत अच्छा लग रहा है क्योंकि कोई भी किसी गैर को सलाह नहीं देता…. *********************** एक अकेला आकाश तिवारी ***********************

rachna varma के द्वारा
May 25, 2011

प्रिया जी , बचपन को इस तरह से यद् करना अच्छा लगता है धन्यवाद

    priyasingh के द्वारा
    May 25, 2011

    प्रतिक्रया के लिए शुक्रिया आपका ….

nishamittal के द्वारा
May 25, 2011

प्रिया जी,बहुत ही मर्मस्पर्शी,भावुक यादों में पहुंचा दिया आपने,सच आने वाली पीढियां तो उस सुख की कल्पना भी नहीं कर सकतीं.वैसे भी हमने नयी पीढी को इतना सुविधाभोगी बना डाला की शायद वो उस जिन दगी का चारपाई पर सोना बिना पंखे,कूलर ,फ्रिज के रह सकें.धन्यवाद.

    priyasingh के द्वारा
    May 25, 2011

    सही कहा आपने हम अपने बच्चो को सुकुमार बना देते है ज्यादा लाड देने के चक्कर में ……….और फिर बाद में पछताते है …………आपकी मेरी यादे अच्छी लगी इसके लिए शुक्रिया…………


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