priyanka

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ज़िन्दगी कट ही जाती है ...!!!

Posted On: 18 Oct, 2011 Others में

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836454-1024x600-lonliness………..ज़िन्दगी के बारे में जब भी सोचती हूँ कुछ अजीब से ही अहसास होते है ……..हम कितना कुछ करना चाहते है अपने जीवन में ……पर कई बार सिर्फ वो सब हमारी सोच तक ही सिमित रह जाता है …….जीवन के हर पड़ाव पर हमारी सोच ज़िन्दगी के बारे में कितनी अलग होती है ……जब हम बच्चे होते है तब हमारा इस भारी भरकम शब्द से कोई वास्ता नहीं होता ……हम निष्फिक्र होकर बस अपनी ही उड़ान में उड़ते रहते है खेलना स्कूल जाना सहेलियों से मिलना कोई त्यौहार आये और नए कपडे मिल जाये तो बस उसी में खुश हो जाना ……..लेकिन जीवन हमेशा यूँ बचपन सा खुशनुमा तो नही रहता धीरे धीरे समय बीतने के साथ साथ जैसे मौसम के मिजाज़ बदलते है वैसे ही हमारी ज़िन्दगी भी बदलती है कभी तो वो जीवन बसंत सा खिल जाता है तो कभी कुछ ऐसा होता है की उसमे सुनामी आ जाती है इसी तरह समय हमारे जीवन से खेलता रहता है …….कभी कभी सोचती हूँ तो लगता है की हम सिवा एक कठपुतली के कुछ नही हमारी डोर के हाथ बदलते रहते है लेकिन सिर्फ हाथ ही बदलते है बाकी उसे चलाते सब अपनी इच्छा से है कठपुतली की भी भला क्या इच्छा अनिच्छा …..वो तो काठ की पुतली होती है ………जीवन के खेल निराले होते है और इसे जीना बड़ा मुश्किल काम होता है ………जीवन के हर पड़ाव पर जो मौसम बदलते है उनके साथ अपने आपको बदलना कितना मुश्किल होता है ….कुछ लोग आसानी से समय की धार के साथ बहते चले जाते है वो जीवन रूपी नदी में अपने आपको उन्मुक्त बहने के लीये स्वतन्त्र छोड़ देते है उनका जीवन आसान हो जाता है …….लेकिन जो लोग जीवन के हर मौसम को स्वीकार नही पाते उनका जीवन मुश्किलों से भर जाता है स्वयं के लिए भी और दुसरो के लिए भी ……लेकिन वो लोग करे क्या हर किसी के लिए यूँ आसान नही होता जीवन के हर पहलु को स्वीकार पाना …………उन्हें तो अपना जीवन वैसा ही चाहिए होता है जैसा किसी तूफ़ान के पहले था ………लेकिन ज़िन्दगी उनके पास पहले सी कहां लौट कर आती है वो तो अपनी गति से चलती ही रहती है न ही किसी के लिए रूकती है और न ही पीछे लौटती है …… हम बस अपने मन में अपने उस बसंती जीवन की यादो को याद कर पाते है और उन्ही यादो में जीकर अपने आपको खुश कर लेते है ………लेकिन तब भी वो जीवन क्या उतना खुश और सुकून देने वाला हो पता है ……वो बस एक काम बन कर रह जाता है …..एक ऐसा काम जिसे करने के सिवा और कोई राह नज़र ही नही आती हम अपनी ज़िन्दगी के सफ़र पर चलते ही रहते है उस तूफ़ान के आने के बाद भी अपनी ज़िन्दगी के कई कडवी यादो को समेटे हुए…….अपनी ज़िन्दगी के बारे में हमे कई खुशफहमिया भी होती है की हमारे बिना कई लोगो का जीवन दुखी हो जाए गा पर कहीं अंतर्मन में हम ये जानते है की ये सिवा एक भ्रम के और कुछ भी नही है …….हम भी तो ऐसा ही सोचते थे और कई लोगो के बारे में की यदि ये हमारे जीवन से चला गया तो हम क्या करेंगे हमारा जीवन तितर बितर हो जाये गा और फिर एक दिन ऐसा आता है की सच में वो हमारे जीवन से चला जाता है और उसके जाने के बाद भी हमारा जीवन चलता रहता है वो जीवन जिसके बारे में हम उसके बिना कल्पना भी नही कर सकते थे वो यूँ चलता रहता है………….. पर कहीं न कहीं वो एक कमी तो रह जाती है और जीवन के हर छोटे बड़े अवसर पर वो कमी हमे खलती है हम ऊपर से तो अपने आपको संभाल लेते है पर क्या हम अपने अंतस मन को संभाल पाते है वो तो वैसा ही सब कुछ चाहता है जैसा जीवन उनके साथ था …………..पर हमारी चाह हमारी इच्छा का क्या मोल है ……………..और धीरे धीरे हम अपनी यादो से ही खेलने लगते है हमारे जीवन पर इस समय पर हमारा कोई बस नही होता है लेकिन हमारे मन में तो हमारा ही राज है अपने मन में हम उसे अपने पास ही रखते है और जीवन के हर छोटे बड़े पल पर सोचते रहते है की आज आप होते तो ऐसा हुआ होता …….और इस तरह अपने मन में हम जीवन से खेलने लग जाते है ….लुका छिपी का खेल …….क्या हुआ जो हमारे जीवन में तुमने उसे छिपा दिया अपने मन में हमने उसे छुपा लिया ………….हमारे मन से उसे कैसे ले जाओगे …………..और फिर अपनी इस झूठी जीत पर कितना खुश होते है ……..लेकिन ये जीवन चाहे जैसा भी हो हम जिंदगी के इस सफ़र पर चलते ही रहते है ……..और धीरे धीरे ये ज़िन्दगी कट ही जाती है …………………………
……………………………….बहुत दिनों बाद आप सबसे मिल रही हूँ, शुभ संध्या………………..

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32 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yamunapathak के द्वारा
May 26, 2012

मैं एक बात जानती हूँ की जब जिस भी हालत में हो इश्वर का धन्यवाद करो क्योंकि उस स्तिथि से ज्यादा पीड़ादायक भी क्षण हो सकते हैं. आपने बहुत अच्छी अभिव्यक्ति दी है.

deepak singh के द्वारा
April 24, 2012

आप ने बहुत अच्हा लेखा

Sumit के द्वारा
January 7, 2012

आपने तो मेरा मन पसंद गीत याद दिला दिया – ज़िन्दगी कैसी पहेली है http://sumitnaithani23.jagranjunction.com/2012/01/05/वो-पव्वा-चढ़ा-के-आई/

Lahar के द्वारा
October 21, 2011

प्रिया जी सप्रेम नमस्कार जिंदगी क्या है ये समझना उसी प्रकार मुश्किल है जिस प्रकार नारी को समझना | वैसे भी जिंदगी इतनी छोटी होती है की जब इसे समझने की कोशिश करते है तब तक उम्र ही बीत जाती है | जिंदगी एक खुबसूरत तोहफा है शायद खुदा का जिसे हमे प्रेम से को दुसरो से बाटने की कोशिश करनी चाहिए | आज जगजीत जी बहुत याद आ रहे है उन्हों ने निजा फाजली की लिखी एक गजल गायी थी — होश वालो को खबर क्या बेखुदी क्या चीज़ है | इश्क कीजिये फिर समझिये जिंदगी क्या चीज़ है | आपने बहुत अच्छा लिखा है | धन्यवाद

alkargupta1 के द्वारा
October 20, 2011

प्रिय जी , पुनः स्वागत है ! बहुत अच्छा लिखा है…यह ज़िन्दगी का सफ़र ऐसा ही है सब कुछ पीछे छोड़ते जाते हैं चलते ही रहते हैं .आगे बहुत कुछ बदलता सा प्रतीत होता है ……और सफ़र पूरा हो जाता है….जीवन के सत्य से परिचय कराती श्रेष्ठ रचना !

    priyasingh के द्वारा
    October 21, 2011

    आपको रचना अछि लगी आभार आपका………………………..

Santosh Kumar के द्वारा
October 19, 2011

आदरणीय प्रिया जी,…पहली बार आपकी पोस्ट पढ़ रहा हूँ ,..बहुत सच्ची ,.सरल,…. प्रवाहमय…….हम भी बह रहे हैं ,..

    priyasingh के द्वारा
    October 21, 2011

    आपकी प्रथम प्रतिक्रया के लिए शुक्रिया और स्वागत है मेरे ब्लॉग पर……..

    santosh kumar के द्वारा
    October 21, 2011

    आदरणीय प्रिया जी ,..मेरे ब्लाग पर आने का आमंत्रण कृपया स्वीकार करें ,…आपकी रचना ” प्रेस वाली बच्ची “..पढ़ी बहुत ही अच्छी लगी ,… इसका सीक्वल लिखने की प्रेरणा भी मिली ,..यदि आप इजाजत दें तो कभी जरूर लिखूंगा ,…साभार

sadhana thakur के द्वारा
October 19, 2011

प्रिया जी ,जिंदिगी क्या है ?ये समझ पाना तो बहुत ही कठिन है ..हा आपने जो लिखा है वो ठीक है की इसकी रफ़्तार में खुद को बस बहता छोड़ दो ..अच्छा आलेख ……..

    priyasingh के द्वारा
    October 21, 2011

    शुक्रिया आपका…………………

abodhbaalak के द्वारा
October 19, 2011

हेलो सिस, या ये कहूँ प्रिय बहना….. और सुनाएँ, कहाँ हैं आप? एक बहुत ही लम्बे समय के बाद आपकी कोई पोस्ट आई और भी …….. एक अलग रस में लिखी है, जहाँ अपने अतीत के रंग को ………. समय अपने अन्दर कितनी बातो को छिपा कर रखता है, क्या क्या होता रहता है और हम सब उसे छोड़ कर आगे बढ़ते रहते हैं, कभी लगता है की हम सिकंदर हैं और कभी लगता है की हम कठपुतली…… एक सोचने पर विवश करती रचना, …………… अगली के लिए कम प्रतीक्षा कराएं तो आभारी रहूँगा :) http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    priyasingh के द्वारा
    October 21, 2011

    कुछ भी कहे आप सिस या बहना……दोनों ही अछे है ……………..बस यहीं थी कुछ कामो में उलझ गयी थी……..आपको रचना पसंद आई ये जान कर अच्छा लगा …………पर भ्राताश्री गलतिया भी जरुर बताईगा…..

Abdul Rashid के द्वारा
October 19, 2011

और धीरे धीरे ये ज़िन्दगी कट ही जाती है…. अच्छा लगा मन को सुकून मिला दीपावली की हार्दिक सुभकामनाओ के साथ अब्दुल रशीद http://singrauli.jagranjunction.com

    priyasingh के द्वारा
    October 21, 2011

    आपको अच्छा लगा इसके लिए शुक्रिया……..आपको भी दिवाली की शुभकामनाये……..

jlsingh के द्वारा
October 19, 2011

बार बार आती है मुझको मधुर याद बचपन तेरी——– —– लेकिन ये जीवन चाहे जैसा भी हो हम जिंदगी के इस सफ़र पर चलते ही रहते है ……..और धीरे धीरे ये ज़िन्दगी कट ही जाती है ………………………… संवेदनाओं से भड़ी, आत्मकथ्य शैली में लिखा गया जीवन की सच्चाइयों से परिचित कराता लेख! धन्यवाद एवं बधाई! स्वागत है आपका.– जवाहर!

    priyasingh के द्वारा
    October 19, 2011

    जो लिखा मैंने आपको पसंद आया ………..शुक्रिया आपका……..

राही अंजान के द्वारा
October 18, 2011

प्रिया जी, सादर नमस्कार ! लगभग पाँच महीने बाद ही सही…….लेकिन हमेशा की तरह….बहुत ही खूबसूरत रचना । हर आमजन को अपनी सी कहानी लगती हुई और शायद कहीं न कहीं श्रीमदभगवद्गीता के बहुत ही करीब से होकर गुजरती हुई । “……..लेकिन ये जीवन चाहे जैसा भी हो हम जिंदगी के इस सफ़र पर चलते ही रहते है ……..और धीरे धीरे ये ज़िन्दगी कट ही जाती है …………………………” !!! . आशा करता हूँ कि अब आप मंच पर…… बहुत बहुत आभार । :)

    priyasingh के द्वारा
    October 19, 2011

    ओह इतना समय गुजर गया …………….अब लग रहा है की यहाँ इस मंच पर कितना कुछ पीछे छुट गया होगा………आपका नया नाम उर्दू में शायद तकलुफ्फ़ कहते है ना…अच्छा है ……………..अब तो मिलना होता ही रहेगा …………….आपकी रचनाये पढने आती हूँ……..आपको अच्छा लगा इसके लिए shukriyaa

    राही अंजान के द्वारा
    October 23, 2011

    तख़ल्लुस कहते हैं….! ब्लॉग पर पुनः स्वागत है आपका…..अवश्य पधारिएगा । :)

akraktale के द्वारा
October 18, 2011

आदरणीय प्रिया जी नमस्कार, बहुत ही अच्छा लिखा है आपने जिंदगी के सफ़र पर, साथी बिछड़ने का डर फिर बिछड़ने का डर मगर कारवाँ चलता ही रहता है.सच यही जीवन है.बहुत बधाई. कुछ इन्ही बातों को मैंने अपनी कविता “जीवन एक …..” में लिखा है कभी वक्त हो तो अवश्य पढियेगा.

    priyasingh के द्वारा
    October 19, 2011

    आपकी कविता अवश्य पढूंगी………आपने रचना को पसंद किया इसके लिए शुक्रिया…………….

Rajkamal Sharma के द्वारा
October 18, 2011

आदरणीय प्रियांका जी ….सादर अभिवादन ! क्या हुआ जो हमारे जीवन में तुमने उसे छिपा दिया अपने मन में हमने उसे छुपा लिया बहुत ही ज्यादा दिल कि गहराइयों में कहीं यह लाइन भीतर तक उतर गई ….. अब आप यह मत कहना कि आपको ज्यादा इज्जत वाला सम्बोधन नहीं चाहिए आपके जाने के बाद हमने इस मंच का माहौल कुछ इस तरह का बना दिया है कि अब आपको ज्यादातर ब्लागरों से “ज्यादा इज्जत” ही मिलेगी ….. अभी आपने एक लंबे गैप के बाद दुबारा लिखा है यह भी कबीले तारीफ है लेकिन जब आप अपनी पूरी रवानी में आकर लिखेंगी तो फिर से कोई प्रैस वाली बच्ची सरीखी रचना का जन्म होगा ….. आपको + आपके शरारती बच्चे + सपरिवार दीपावली कि मुबारकबाद

    priyasingh के द्वारा
    October 19, 2011

    यह सब आप सबके हौसला अफजाई का ही असर है की लौट कर दोबारा आ ही जाती हूँ ……………इस मंच में दुबारा आने पर कई नाम नए तो दिख ही रहे है पर सबसे भयानक तो कमेन्ट कोड का रूप है …..इतने भयानक है की उनके चेहरे समझ ही नही आते …………………मेरा शरारती बच्चा अब और शरारती हो गया है ……किसी दिन उसकी शरारते आप सबके साथ जरुर बाटूंगी………आपको भी दीपोत्सव की शुभ कामनाये…….

वाहिद काशीवासी के द्वारा
October 18, 2011

प्रिया जी बहुत दिनों बाद आपकी कलम से निकला कुछ पढ़ने को मिल रहा है जो हमेशा की तरह ही लाजवाब है। जीवन के यथार्थ को कितनी सुगमता से चित्रित कर दिया है आपने। आपने सही कहा कि गुज़रा हुआ वक़्त लौट कर नहीं आता (एक शेर याद आ गया कि - झूट है सब तारीख़ हमेशा अपने को दोहराती है, अच्छा मेरा ख़्वाबे जवानी थोड़ा सा दोहराए तो;) फिर भी मेरा मानना है कि अगर हम सबकुछ होने पर भी अपनी सोच को सकारात्मक बनाये रखने की कोशिश करें तो सब ठीक हो जाता है। दुःख-सुख, हानि-लाभ तो जीवन पर्यंत लगा रहता है मगर हम अपने विचारों से अपने भविष्य का निर्माण कर सकते हैं। अगर हम नकारात्मकता को सीने से लगाये बैठे रहेंगे तो आगे भी वैसा ही होगा। तो यह हम पर भी निर्भर है कि अपने जीवन में हम क्या चाहते हैं और कैसे चाहते हैं। इस विषय पर एक लेख पर कार्य कर रहा हूँ जब पूरा हुआ तो आपको अवश्य उसका ड्राफ़्ट भेजूंगा। आभार सहित,

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    October 18, 2011

    ५/५ तो देना ही भूल गया। :)

    priyasingh के द्वारा
    October 19, 2011

    आपसे ५/५ पाकर तो मन बाग़ बाग़ हो गया …..पूरे के पूरे नंबर तो मुझे कभी स्कूल में भी नही मिले ……अगर ऐसे ज़िन्दगी के इम्तिहान में भी हम पूरे नंबर लेकर पास हो जाये तो परेशानी ही खतम………

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    October 19, 2011

    प्रिया जी, मैंने अपने सम्पूर्ण जीवन में केवल एक ही विषय में पूर्णांक प्राप्त किये हैं और वह था सामान्य ज्ञान। ख़ैर, किसी और को चाहे जैसा भी लगा हो पर मुझे आपका यह लेख बहुत ही अच्छा लगा, बीती ज़िंदगी के अनेकानेक वाक़ियात नज़रों के आगे चलचित्र की भांति घूमने लगे थे इसलिए पूरे ५/५ तो बनते ही थे (वैसे इस मामले में थोड़ा कंजूस हूँ मीन-मेख निकालने की आदत सी है)। ज़िंदगी के इम्तिहान में पूर्णांक प्राप्त करने से ज़्यादा आवश्यक विषय की जटिलता को समझ लेना है और आपने अपने लेख में इसे सकुशल सिद्ध कर दिया है। पुनश्चः आभार आपका,

sdvajpayee के द्वारा
October 18, 2011

 जो भी मिला ( ?) लगता है, वह छूटने -जाने के लिए ही होता है। स्‍वयं अपना होना भी,अपनी सांसें भी।रिश्‍ते-नाते, दोस्‍त-दुश्‍मन सब आने के साथ अनिवार्य रूप से जाने वाले हैं। हमारा शरीर भी प्रतिपल बदलता -जाता ही रहता है। पकड में कुछ भी नहीं आता।जिंदगी के सफर पर चलते-नाचते ही रहना कदाचित हमारी विवशता है। इस लिए कि हम कठपुतली हैं। सबहिं नचावत राम गोसांई………।

    priyasingh के द्वारा
    October 19, 2011

    …………और कभी कभी ये विवशता मन को बड़ा तडपाती है …..कई सवाल मन पूछने लगता है …….लेकिन सही कहा आपने “सबही नचाये राम गोसाई “……………….आपने पढ़ा और सराहा आपका आभार ……………

nishamittal के द्वारा
October 18, 2011

बहुत अन्तराल के पश्चात आज आपकी गम्भीर परन्तु सत्य विचारों से युक्त पोस्ट देखी.” पर कहीं न कहीं वो एक कमी तो रह जाती है और जीवन के हर छोटे बड़े अवसर पर वो कमी हमे खलती है हम ऊपर से तो अपने आपको संभाल लेते है पर क्या हम अपने अंतस मन को संभाल पाते है वो तो वैसा ही सब कुछ चाहता है जैसा जीवन उनके साथ था …………..पर” एक यथार्थ. निरंतरता बनाये रखें कृपया.

    priyasingh के द्वारा
    October 19, 2011

    आपकी सराहना के लिए आभारी हूँ ……………..निरंतरता बनाये रखना चाहती हूँ पर लेकिन…….किन्तु परन्तु सब बीच में आ जाते है ………..अब क्रम न टूटे कोशिश करुँगी……………


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