priyanka

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दुखद आश्चर्य ...कैसे कैसे विचार......

Posted On: 5 May, 2012 Others में

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जागरण जंक्शन से दूर हुए इतने दिन हो गए है लकिन आज यहाँ कुछ ऐसा पढ़ा की विवश हो गयी कुछ लिखने के लिए वैसे दुरी से मेरा अभिप्राय यहाँ कुछ न लिखने से था लेकिन यहाँ पर उपस्तिथ मै हमेशा रही सबकी रचनाये पढती रही कुछ कवितायों ने मन को छु लिया कुछ रचनायो को पढ़कर नयी जानकारी मिली तो कुछ रचनायो ने आँखे खोली परन्तु कल अचानक एक रचना के शीर्षक को पढ़कर मन चौंक गया और उसे पढ़कर तो शब्द ही नहीं सूझ रहे है की क्या कहू कैसे कहू ………………दुःख निराशा वैसे ही हमारे जीवन में भरपूर है जीवन वैसे ही कई नकारात्मक विचारों और परेशानियों से भरा होता है और ऊपर से किसी की लेखनी से निकले ऐसे शब्द मन को झिंझोड़ देते है रोम रोम तड़प उठता है ………………………”माँ” ये शब्द अपने आप में इतनी गरिमा लिए हुए है की इसे कहने के पहले और न ही बाद में प्रशंशनीय या उपमा अलंकारो से सजे शब्दों की जरुरत ही नहीं है ……………….परन्तु हमारे देश में भी कुछ विदेशी बसते है जो है तो इसी मिटटी के परन्तु मन से विदेशी …..जिस तरह विदेशी इस देश की गरीबी, दुःख, बीमारी ,गन्दगी देखते है उसी तरह से ये कथित विदेशी लोग भी “माँ” का सिर्फ एक ही रूप देखते है ……….”माँ” जो वृद्ध है अशक्त है कमजोर है जो अपने लिए दो वक़्त की रोटी प्यार या स्नेह न दिए जाने पर अपने बेटे को उलाहना देती है तो उसे “माँ” से नर्स बना दिया जाता है और उसके कुछ मांगे जाने को उसका स्वार्थ कहा जाता है ये कहा जाता है की वह अपने लालन पालन का प्रतिदान मांग रही है और ऐसे कथित बुद्धिमान लोग अपनी बुद्धिमानी और समझदारी का परिचय देते हुए कहते है की ऐसी औरत “माँ” नहीं नर्स है क्योंकि अगर वो हमसे प्यार करती तो वो कतई ऐसा नहीं करती उसने हमें खिला पिला कर पढ़ा लिखा कर बड़ा कर दिया तो कौन सा बड़ा काम कर दिया वो तो कोई भी नर्स कर देती अरे हमें तो पता ही नहीं था की जब हम बड़े हो जायेंगे काबिल और समझदार हो जायेंगे तो वो हमसे अपना मेहनताना मांगेगी वो कहेगी तुम मुझे बुढ़ापे में संभालो ……अरे मै क्यों संभालू ये तो “माँ” नहीं है इसने मुझे निःस्वार्थ नहीं बड़ा किया है मुझे बड़ा करने के पीछे इसका कितना बड़ा स्वार्थ था ये मुझे अपने बुढ़ापे का सहारा बनाना चाहती थी ये तो नालायक है और क्योंकि ये नालायक है तो मेरी सारी गलतियों बुराई की वजह भी वही है इसलिए ही मै नालायक हूँ………यह है आज के युवा वर्ग की गर्वित सोच ………………….क्या कहू कैसे कहू ……………….मन द्रवित हो उठा है “माँ” ये सिर्फ एक शब्द नहीं पूरा जीवन है मेरे लिए…………….इस शब्द के साथ कोई नालायक जैसा अशब्द कैसे लिख सकता है और अपने इस विचार को सही कहने लिए तमाम तरह के कुतर्क भी है इतना ही नहीं कई संत और गुरुओ की कही हुई बाते भी बड़ी आसानी से जोड़ कर अपने विचार को सही कहने पर तुले हुए है………ये शब्द सिर्फ एक नारी प्रतीक शब्द नहीं है जो एक नारी होने या स्वयम माँ होने के कारण मै इतना व्यथित हूँ ………………..व्यथित हूँ इस विचार की सहमती में कई लोगो को सर हिलाते हुए देख कर ……………….. सबके विचार पढने के बाद ये भी समझ में आ गया है की इन्हें कुछ भी कहने या समझाने का फायदा भी नहीं………… भैंस के आगे बीन बजाय भैंस खड़ी पगुराए………….. विचारों की लेखन की स्वतंत्रता सबको है कोई रोक नहीं है पर स्वयम ही मनन करिए जो आप कह रहे है जो आप लिख रहे है उसका क्या आशय है क्या अभिप्राय है …………. यहीं पर अपने आप को रोकती हूँ क्योंकि इस शब्द के मायने समझाने के लिए शब्दकोश से कोई शब्द ही नहीं मिल रहे है ………………वैसे भी जिसका पेट भरा होता है वो भूख क्या होती है महसूस नहीं कर सकता है ………..आप सबको शुभ संध्या …………………..

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25 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

चन्दन राय के द्वारा
May 17, 2012

प्रिया जी , सचमुच माँ जन्हा प्रयुक्त हो हर चीज खुबसूरत हो जाती है , आपने माँ की सुन्दर व्याख्या की है सुन्दर भाव

abhilasha shivhare gupta के द्वारा
May 7, 2012

प्रिय जी… आपका लेख पढ़कर, आपके मन की उथल-पुथल का एक साफ़ चित्र उभर कर सामने आ रहा है. जब मैंने वह लेख पढ़ा था, थे मेरी भी मनः स्थिति कुछ ऐसी ही थी…. माँ शब्द से पवित्र शब्द तो इस संसार में है ही नहीं…जो इसका अर्थ ही नहीं समझता, वो स्वर्थी, व् घिनौनी सोच वाला इन्साह है…. माँ के योगदान, प्यार, ममता को तो एक पशु भी भली-भांति समझता है….. एक चोर दुसरे लोगो को चोर ही समझता है…उसी प्रकार एक स्वर्थी इंसान, माँ के प्यार को एक व्यापार समझता है…… ये यथार्थ है….. बहुत अच्छा लेख …बधाई…

    priyasingh के द्वारा
    May 7, 2012

    आपको मेरे विचार पसंद आये शुक्रिया आपका……………इतनी दूर अमेरिका में भी रहकर आप आज भी गाँव की मिटटी को याद करती है ये बहुत बड़ी बात है नहीं तो कई भारतीय अमेरिकी लोगो से भी ज्यादा अमेरिकी हो जाता है ………..बचपन ऐसा वक़्त होता है जिसका हर एक पल मन में बसा रहता है ………

alkargupta1 के द्वारा
May 7, 2012

प्रिया जी , एक लम्बे अन्तराल के पश्चात् मंच पर आपका आना अति सुखद लगा विकृत मानसिकता वाले लोगों के विचार हैं जिनकी इतनी इतनी घटिया सोच है बहुत ही बढ़िया तरह से अपने भाव व्यक्त किये हैं……..

    priyasingh के द्वारा
    May 7, 2012

    ये भाव तो मन की तड़प थे जिस भाषा में वो लेख लिखा गया था की अब क्या कहू ………. मुझे भी इतने अंतराल पश्चात् आप सब से मिल कर अच्छा लगा…….

div81 के द्वारा
May 7, 2012

ये दुखद ही है मगर जब किसी को सिर्फ बुराई ढूंड के निकलने कि आदत हो उसके लिए क्या कहा जाए माँ की महानता पर कुछ कह सके अभी सच मे वो शब्द नहीं बने और ना ही बन पाए जिस तरह गूंगे से पूछा जाए कि गुड का स्वाद कैसा है वैसे ही भाव हो जाते है जब माँ की महानता को शब्दों मे कहने को कहा जाए ये सिर्फ महसूस करने का भाव है | .जिस तरह विदेशी इस देश की गरीबी, दुःख, बीमारी ,गन्दगी देखते है उसी तरह से ये कथित विदेशी लोग भी “माँ” का सिर्फ एक ही रूप देखते है | पूरी तरह से सहमत हूँ आप कि कही बात से | आँखे खोल के सोने वालो को जगाया नहीं जा सकता | मंच मे आप का फिर से स्वागत है प्रिया जी

    priyasingh के द्वारा
    May 7, 2012

    d…बिलकुल सही कहा आपने की आँख खोल के सोने वालो को कैसे कर नींद से जगा सकता है कोई ……आपके स्वागत के लिए आभारी हूँ आपकी..

rekhafbd के द्वारा
May 7, 2012

प्रिय जी ,आपकी व्यथा उचित है ,माँ शब्द के मायने समझाने के लिए शब्दकोश में कोई शब्द ही नही है |आपके विचार जान कर यूँ महसूस हुआ जैसे मै अपने ही विचारों से रूबरू हो रही हूँ ,धन्यवाद

    priyasingh के द्वारा
    May 7, 2012

    ..हर वो व्यक्ति जो रिश्तो के मायने समझता है उसे ऐसा ही महसूस होगा और वैसे भी माँ का रिश्ता तो हर रिश्ते से ही नहीं व्यक्ति के जीवन से भी बड़ा होता है………………शुक्रिया आपका…

चन्दन राय के द्वारा
May 7, 2012

Dear Priyaa ji , Your article shows that your love for your other is unmatchable, i respect your thoughts

    priyasingh के द्वारा
    May 7, 2012

    शुक्रिया आपका……………….

dhirendra के द्वारा
May 7, 2012

I am glad, and happy that you have expressed, and started to write again, hope will see more of it….. it’s a great manch…….. my best wishes to all of the participants.

chaatak के द्वारा
May 6, 2012

प्रिया जी, सादर अभिवादन, मैं अभी ‘माँ’ पर एक ब्लॉग लिखने की नीयत से ही ऑनलाइन हुआ और आपकी पोस्ट दिखाई दी| मैं जो बातें लिखना चाहता हूँ उसपर काफी कुछ प्रकाश आपने डाल दिया है और बहुत ही सरल शब्दों में अपनी बात हम तक पहुंचाई है| इस पोस्ट के लिए मैं आपको हार्दिक बधाई भी देता हूँ कि आपने माँ पर सही और तथ्यपरक विचार रखे हैं|

    priyasingh के द्वारा
    May 6, 2012

    …………विचार तो बहुत सारे मन में उमड़-घुमड़ रहे पर मन को रोक लिया ……अब आपकी ब्लॉग का इंतज़ार रहेगा……..

Rajkamal Sharma के द्वारा
May 6, 2012

इतने दिनों के बाद आपका इस मंच को याद करना एक सुखद अनुभूति कही जायेगी और उस रचना पर आपकी नजर पड़ना एक आश्चर्यजनक एहसास ही कहा जाना चाहिए अब वोह महाशय इस मंच को बाय -२ + टाटा -२ कह गए है – अगर नहीं जाते तो जागरण जंक्शन द्वारा उनको भगा दिया जाता बोरिया बिस्तरे समेत ….. इस खुशखबरी पर कुछ मुंह मीठा तो आपको कर ही लेना चाहिए

    priyasingh के द्वारा
    May 6, 2012

    सुखद अनुभति मेरे लिए भी है दोबारा आप लोगो से संवाद कर रही हूँ……..समाचार तो आपने बहुत अच्छा सुनाया है वैसे ये आपकी कोशिश का ही नतीजा है तो मिठाई तो आपको भी अवश्य खानी चाहिए…………………..

dineshaastik के द्वारा
May 6, 2012

प्रिया जी ऐसे लोग  मानसिक  रूप से बीमार  होते हैं। ऐसे लोग  घृणा के नहीं अपितु दया के पात्र  होते हैं। उन्हें शीघ्र ही अपना इलाज  कराना चाहिये। यह  भी शोध  का विषय  है कि लोगों की ऐसी सोच  कैसे बनती है? क्या  परिस्थितियाँ उनकी ऐसी सोच  बनाती हैं या उनके साथ  हुये हादसे??????

    priyasingh के द्वारा
    May 6, 2012

    सही कहा आपने ये शोध करने का विषय है की कैसे ये सोच विकसित होती जा रही है……….. शुक्रिया आपका……

nishamittal के द्वारा
May 5, 2012

प्रिय जी आज बहुत दिन बाद आपको मंच पर देखना तो अच्छा लगा परन्तु जो दुःख आपको वो सभी जुड़ाव महसूस करने वाले ब्लोगर्स को है.

    priyasingh के द्वारा
    May 6, 2012

    जिनके मन में संवेदनाये जिन्दा है वो सब एक दुसरे से जुड़े है ……..आपका आभार…….

Piyush Kumar Pant के द्वारा
May 5, 2012

मुझे नहीं लगता कि इसमे इनका कोई दोष है…….. वास्तव मे इसमे किसी का कोई दोष नहीं है…….. हमारे देश मे कुछ माहौल बदल चुका है….. यहाँ प्रचार के लिए लोग राखी सावंत भी बनने को तैयार है….. लिखने के नाम पर कुछ भी लिख देना……बोलने के लिए कुछ भी बोल देना….. भी एक प्रचार का तरीका बन चुका है……. और इसमे दोष उनका नहीं है जो ये सब कर रहे हैं……… अपितु उनका है जो इसे समर्थन दे कर पुष्ट कर रहे हैं……..

    shashibhushan1959 के द्वारा
    May 6, 2012

    आदरणीय प्रिया जी एवं आदरणीय पन्त जी, सादर ! मई भी आपकी बातों का पूर्ण समर्थन करता हूँ … “”और इसमे दोष उनका नहीं है जो ये सब कर रहे हैं……… अपितु उनका है जो इसे समर्थन दे कर पुष्ट कर रहे हैं……..”" यही दुखद रहा !

    priyasingh के द्वारा
    May 6, 2012

    प्रसिद्धि पाने की अंधी दौड़ हमें और हमारी सोच को और न जाने कहाँ तक ले जाएगी ……….. सही कह रहे है आप उन्हें समर्थन दे कर लोग उनका मनोबल ही बढ़ा रहे है ……..

    priyasingh के द्वारा
    May 6, 2012

    शशिभूषण जी आपने समर्थन किया हमारी सोच का इसके लिए आपका आभार…..


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